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Home›साहित्य›कविता›बेटी बचावा, बेटी पढ़ावा

बेटी बचावा, बेटी पढ़ावा

By मिलन मलरिहा
February 5, 2022
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बेटी बचावा बेटी पढ़ावा

नोनी बाबू एक हे, झिन कर संगी भेद !
रुढ़ीवादी बिचार ला, लउहा तैहा खेद !!
लउहा तैहा खेद, समाज म सुधार आही!
पढ़ही बेटी एक, दुई घर सिक्छा लाही !!
मान मिलनके गोठ, भ्रुणहत्या कर काबू !
भेज दुनो ल एकसंग, इसकुल नोनी बाबू!!
–
पुस्तक डरेस लानदे, बिसादे अउ सिलेट !
बरतन चउका झिनकरा, पढ़ाई ल झिन मेट !!
पढ़ाई ल झिन मेट, सिक्छा के अधिकार दे!
बेटी बने पढ़ाव, अउ चरित सन्सकार दे !!
आही सिक्छा काम, दुख-दरद देही दस्तक !
मनुस छोड़थे संग, फेर नइछोड़य पुस्तक !!
–
बेटी पढ़के बाँटही, गांव गांव म गियान !
परकेधन झिन मान रे, इही देस के जान !!
इही देस के जान, पढ़लिख नवाजुग लाही !
रुकही अतियाचार, कुकरमी दूर हटाही !!
मलरिहा कहत रोज, पुस्तक धरादे बेटी !
अबतो जाग समाज, सिक्छित बनादे बेटी !!
–
कहाँले  बहूँ  लानबो, परगे  हवय  अकाल   ।
बेटा बेटा सब गुनय,  इही  जगत  के हाल  ।।
इही  जगत के हाल,  कोख भितरी मरवाथे  ।
गुनले  अपन  बिचार,  बेटी  रोटी  खवाथे  ।।
कहत मलरिहा गोठ , मति मा तोरे बसाले  ।
छोड़  देहि  सनसार,  दाई   पाबे   कहाँले  ।।
–
नोनी  बहनी  नोहय ग,  ए जिनगी के बोझ   ।
टूरा  होथे   मनचला,  कोनो  रहिथे  सोझ   ।।
कोनो  रहिथे सोझ, दाई – ददा  ल  सताथे  ।
काम  बुता  ढेचराय , मुड़ी  धरके  रोवाथे  ।।
मलरिहा  कहत गोठ,  कानले  निकाल पोनी  ।
कब समझबे मनूस, भविस्य हमर हे नोनी  ।।

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