अंतर्व्यथा
व्यथित मन के घेराव से, न कहीं पर ठाँव,
थमते क्यों नहीं हमारे, दोनों हाथ पाँव।
आशा रूपी बाणों से, ले कपोत उड़ाय,
धुँधली सपन को देखकर, मन ही मन मुस्काय।
यथार्थ से अनभिज्ञ होय , बनते क्यों अज्ञान,
ना सोचें ना ही समझे, चकित अंतर्ज्ञान ।
अंतर्जाल में फंस पड़े, इसका नहीं भान,
काल से जीत पाया हैं, लिप्त हो अभिमान ।
हम केवल दिये हैं तुझे, जीवन भर विलाप,
अन्तस की पीड़ाओं को, सह लेती चुपचाप।
सहृदय कल्पना सँजोकर, गाये सुखद गान,
मधुरता भरे लहरों से, होता नित विहान।
(रचना विधान-रूपमाला/मदन छंद) [सम मात्रिक]
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