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Home›साहित्य›कहानी›अपनी–अपनी संतुष्टि

अपनी–अपनी संतुष्टि

By श्याम नारायण श्रीवास्तव
April 11, 2020
314
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अपनी–अपनी संतुष्टि

उस दिन जब घंटी बजी तो मैंने ही दरवाजा खोला था | बाहर अखबार वाला था | उसने नमस्ते करते हुए उस माह का बिल पकड़ा दिया | हाथ में बिल लेकर मैं देख ही रहा था कि उसने कहा , “ अंकल मेरे पास बहुत अच्छी अगरबत्ती है , आपको चाहिए क्या ?” मैंने कहा, “अरे वाह , अखबार के साथ अगरबत्ती भी बेचने लगे क्या ?” ये तो बहुत अच्छा किया …. आ जाओ … अंदर आ जाओ | वह एक बड़ा सा झोला लिए अंदर आ गया | सोफे की एक कुर्सी पर बैठते हुए उसने झोले से अगरबत्ती की दो-तीन पैकेट भी निकाल ली |

बात होली के तीसरे दिन की है | उसने अखबार देने के साथ ही बेल भी बजा दी थी | अमूमन प्रतिदिन वह अखबार बाहर ही फेंक कर चला जाता है | लेकिन महीने के प्रथम सप्ताह में वह किसी एक दिन बेल बजाता है | फाटक खोलते ही वह अख़बार का बिल पकड़ाता है | और फिर मैं या मेरी पत्नी उसके बिल का पेमेंट कर देते हैं |  इस दौरान आदतन मेरी पत्नी उसे कभी चाय के लिए , कभी एक गिलास पानी के लिए भीतर बुला लेती है | उसके पास समय होता है तो वह भीतर आकर बैठ जाता है | नहीं तो , “ आंटी आज देर हो रही है फिर किसी दिन चाय पी लेंगे |” कह कर चला जाता है |

और फिर पूरे महीने ऐसा दिन नहीं आता, जिस दिन बैठकर वह इत्मिनान से किसी के यहाँ चाय पी ले | उसे कई सौ लोगों के यहाँ सुबह – सुबह अखबार देना होता है | देना क्या होता है , सच कहा जाय तो फेंकना होता है | हमारी छह-सात मंजिला कालोनी में तो वह पहले लिफ्ट से सबसे ऊपरी मंजिल पर पहुँच जाता है और फिर जिन – जिन घरों में अखबार देना होता है वह घर के सामने फेंकता चला जाता है | फिर खटखट – खटखट सीढ़ी से उतर कर दूसरी पर पहुँच जाता है | ऐसे ही हर मंजिल पर घर के सामने अखबार फेंकता हुआ नीचे पहुँच जाता है | फिर दूसरे टावर में वहाँ की लिफ्ट से चढ़ जायेगा | कालोनी के दो सौ से अधिक घरों में ऐसा झटपट अख़बार बांटकर निकल जाता है | जैसे कोई रोबोट आया हो और करतब दिखा कर निकल गया |

लेकिन महीने के प्रथम सप्ताह में वह रिमोट मोड में कार्य नहीं रहता | पूरे सप्ताह भर वह लोकल मोड में कार्य करता है यानि अपनी मर्जी से और थोड़ा आराम-आराम से | आराम तो खैर जैसे उसके तकदीर में नहीं है , भागता ही रहता है उस सप्ताह भी | किन्तु इन दिनों वह माह भर दिए गये अख़बार का बिल देकर पैसे एकत्र करता है | इसलिए थोड़ा आराम से काम करता है | उसी में यदि किसी ने प्यार से बिठा लिया तो वहाँ चाय- वाय भी चल जाती है |

एक दिन इसी ने बताया था | ज्यादा नहीं अभी दो-तीन महीने पहले की बात है | खूब ठंड पड़ रही थी | रविवार का दिन था | मैं भी आराम से बैठा चाय पी रहा था | इसने ही बेल बजायी थी | मैंने देखते ही कहा , “ अंदर आ जाओ भाई एक कप चाय पी लो | आज ठंडक ज्यादा है | तो बोला , “नहीं अंकल मैं ज्यादा चाय नहीं पीता | मैंने कहा , अरे भाई अभी तो सुबह के आठ ही बजे हैं , ज्यादा चाय कहाँ से हो गयी |” तो उसने बताया था , “अंकल मैं सुबह चार बजे ही उठ जाता हूँ | जब तक तैयार होता हूँ मेरी घरवाली मेरे लिए चाय बना देती है | घर से चाय पीकर चलता हूँ तो दस बजे तक कहीं चाय नहीं पीता |”

फिर दस बजे तक तुम कुछ खाते-पीते भी नहीं ? ऐसे ही जिज्ञासावस मैं पूछ बैठा तो बोला , “नहीं अंकल  … वो क्या है न अंकल  …. घरवाली बोलती है , रास्ते में कुछ चटर – पटर मत खाया करो | सेहत खराब हो जाएगी | और पैसे भी तो बर्बाद होंगे | मैं भी सोचता हूँ अंकल, सेहत ख़राब हो जाएगी तो अखबार कैसे बाटूंगा | यही तो हमारी रोजी- रोटी है | क्या है अंकल , मेरी घरवाली रात में चना भिगोकर रखती है और जब तक मैं चाय पीता रहता हूँ एक टिफिन में साफ़ करके रख देती है | मैं मौका निकाल कर रास्ते में खा लेता हूँ |” ये अच्छा काम करते हो तुम |

इसी के साथ मैंने फिर एक प्रश्न उछाल दिया | चार बजे घर से निकलते हो तो ठंडक नहीं लगती | “काहे की ठंडक अंकल , पचीस किलोमीटर साईकिल चलाने में पसीना आ जाता है, आप ठंडक की बात कर रहे हैं | कितने ग्राहक तो मेरे पहुँचने के पहले अख़बार की प्रतीक्षा करते रहते हैं | एक जज साहब हैं सक्सेना जी , रिटायर हो गये हैं | सत्तर – पचहत्तर से कम नहीं होगें | सुबह कितने टाइम भी जाता हूँ बाहर लान में घूमते दिख जाते हैं | मुझे देखते ही गेट की ओर अख़बार लेने आ जाते हैं |”

धीरे – धीरे उसे सभी ग्राहकों का व्यवहार भी ज्ञात हो गया है | एक बार कालोनी के ही किसी मैडम के बारे में बता रहा था , “अंकल इस महीने से दो घरों में अख़बार देना बंद कर दूंगा |”

क्यों ? क्या हुआ ? मैंने पूछा |

“अरे अंकल महीने भर अख़बार देता हूँ | जब हिसाब करना होता है तो बोलते हैं कि इस महीने चार दिन अख़बार नहीं आया | …….. एक मैडम हर बार बोलती है | इस माह दो हफ्ते का सन्डे वाला परिशिष्ट गायब था | मैं बोलता हूँ , लेकिन मैंने तो प्रतिदिन अखबार दिया है | कई बार आपके यहाँ ताला बंद होता है तो भी बाहर अखबार डाल जाता हूँ |”

वह बोलीं , “वही तो ….. मुझे मिलता ही नहीं , कौन उठा के ले जाता है ….. पता ही नहीं चलता | फिर बोलती हैं लेकिन जब मुझे नहीं मिला तो पैसे तो कटने चाहिए न | अंकल इसी तरह दो तीन लोग और हैं जो कभी पूरे पैसे नहीं देते |”

ये तो बहुत गलत बात है | बीच में मेरे बोलते ही वह फिर शुरू हो गया |

“और अंकल कितने लोग तो गर्मी की छुट्टी में घर चले जाते हैं | मैं अख़बार देता रहता हूँ | लौट कर आयेंगे तो बोलेंगे , मैंने तो मना किया था | बाद में पता चलता है पड़ोसी को बता कर चले गये थे | पड़ोसी से मेरी मुलाकात ही नहीं होती | वो जब तक सो के उठते हैं , मैं अख़बार बाँट कर निकल जाता हूँ | फिर वो लोग भी पैसे देने में बहुत आनाकानी करते हैं |”

“क्या है अंकल , अखबार कोई साग सब्जी तो है नहीं , कि नहीं बिका तो पानी का छींटा मार रख दिया | और दूसरे दिन बेच लिया | ये तो शाम होते – होते बासी हो जाता है | और अंकल हमलोगों को कोई पगार तो मिलती नहीं | महीने भर में जितने अखबार का हिसाब देता हूँ | उसी पर कमीशन मिल जाता है | जाड़ा , गर्मी तो नहीं हाँ बरसात में अखबार को बचाना बहुत मुश्किल काम हो जाता है | हम लोग खुद भीग जाते हैं , लेकिन अखबार नहीं भीगने देते | सोचता हूँ अंकल इसके साथ कुछ और काम करूँ |” इस तरह वह जब भी मिलता है थोड़ी ही देर में ढेर सारी बातें कह जाता है | मैं भी चुपचाप सुनता हूँ | और उसका मन हल्का हो जाता है |

आज वह बिल के साथ अगरबत्ती का पैकेट भी लेकर आया तो ख़ुशी हुई | मैं अगरबत्ती का पैकेट देख रहा था | और इस बीच मेरी पत्नी उसके खाने के लिए होली में बनाये कुछ व्यंजन रख कर चाय बनाने चली गई | उसने एक गुझिया खाई , पानी पिया | चाय भी थोड़ी देर में बन कर आ गई | चाय रखते हुए पत्नी ने कहा, “अरे भईया , आप कुछ खा ही नहीं रहे हो , क्या बात है ?”

उसने कहा , “खा लिया आंटी | आप बहुत अच्छा बनाती है |”

“अरे अच्छा लगा तो और खा लो |”

“नहीं आंटी मन नहीं है |”

वह जल्दी – जल्दी चाय पीने लगा | चेहरे से लगा वह कुछ सोच रहा है | मेरी पत्नी ने पढ़ लिया, उसका चेहरा |

“क्या सोच रहे हो भईया ?”

“कुछ नहीं आंटी , आज रविवार है न | रोज सबेरे आने पर मेरा बच्चा सोता रहता है | घर पहुँचने पर वह स्कूल चला जाता है | अभी दूसरी कक्षा में पढ़ता है | स्कूल से लौट कर आता है तो मैं सोता रहता हूँ | ज्यादातर शाम को मुलाकात होती है | आज स्कूल में छुट्टी है तो जाते ही मिलेगा |”

उसने इसी के साथ जेब में रखे पर्स को निकालकर एक प्यारे से बच्चे की फोटो दिखाई | साथ में बच्चे के माँ की फोटो भी लगी थी | उस पर ऊँगली रखते हुए कहा , “और ये मेरी घरवाली है | मुझको बहुत प्यार करती है | मैं भी इसे बहुत चाहता हूँ |”

फिर चुप हो गया जैसे कोई पहेली बुझाकर बोलता है | बूझो तो जानें | और उत्तर की प्रतीक्षा में चुप हो जाता है | वैसे ही वह भी चुप हो गया | लेकिन वह देर तक चुप नहीं रह सका | क्योंकि उसकी पहेली को बूझना बहुत आसान नहीं था | वह तुरंत ही बोला , “आंटी ये गुझिया – पापड़ मैं घर ले जाना चाहता हूँ | अगर एक पन्नी में भरकर दे देंगी तो घर जाकर सबके साथ खाऊंगा | मेरा बच्चा और घरवाली गुझिया पापड़ पाकर बहुत खुश हो जायेगें | अकेले यहाँ खाने का मन नहीं कर रहा है |”

अचानक एक सन्नाटा सा छा गया | इस बार इस चुप्पी को तोड़ने में मेरी पत्नी ने देर नहीं की , “ओह ! तो इसलिए नहीं खा रहे थे | रुको मै यही नहीं और भी गुझिया – पापड़ रख देती हूँ , घर ले जाने के लिए |”

मेरी पत्नी ने उस प्लेट में रखे गुझिया पापड़ के संग और सामग्री कायदे से अखबार में रखकर एक बड़े से पालीथीन बैग में उसे दे दिया | उसने वह पालीथीन अपने झोले में डाल ली | वह बहुत खुश था | उठा और चल दिया | भूल ही गया कि अगरबत्ती भी बेचने आया था | परिवार के प्रति उसका प्यार अदभुत था | वह जा चुका था और उसे गुझिया – पापड़ देकर हम दोनों ऐसा महसूस कर रहे थे जैसे अभी – अभी मन्दिर में भगवान को भोग लगाकर लौटे हों |

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