आँधी

ठाकुर रघुराज सिंह को रमेसरा का रंग-ढंग जरा भी न सुहाता था। ऐसा भी क्या हलवाहा, कि बस काम
से काम। बात-व्यवहार की दमड़ी भर अकल नहीं। ठाकुर अपनी तरफ से खेती-बाड़ी की चर्चा छेड़ते तो भी उस
चढ़ती उम्र के लौंडे के चेहरे का भकुआपन न दरकता, जबकि रघुराज सिंह इस मौके पर उसके मुहासों भरे
साँवले चेहरे पर पालतूपन की तरलता देखने का प्रयास करते थे… ठाकुर साहब अपना मन समझाने के लिए
सोच लेते…. ‘‘अभी जल्दी ही बाप मरा है। गम भूलते ही रास्ते पर आ जायेगा।’’
मगर रमेसरा ठहरा पक्का बागी। उस दिन हल-बैल खूँटे से लगा, पनपियाव की तैयारी कर रहा था कि
सामने से रघुराज सिंह आ गये। उसने छोटी सी डली दिखाते हुए उज्र किया- ‘‘बाबू साहेब! ठकुराइन बखरी के
अन्दर से इतना-सा गुड़ भेजकर बगदा देती हैं। इससे मुंह भी नहीं मिठाता…….।’’
ठाकुर अवाक् रह गए। ऐसा कभी नहीं हुआ था। खुद इसका बाप जगेसरा पूरे बीस बरस इसी देहरी की
गुलामी करके मर गया। ले-देकर फसल के निपटारे पर अनाज की वसूली के बखत जबान खोलता था, वह भी
लल्लो-चप्पो भरी…. ‘‘बाबू साहेब ! कुछ ले लें। बाकी की फिकर न करें। मेरे पीछे भी आपका अनाज मारा नहीं
जायेगा। रमेसरा भरेगा। बिन्दी की शादी में लिए थे। आखिर वह उसकी सगी बहन….’’
वही रमेसरा ……. कल का छोकरा, कैसी आँखे तरेरे ताक रहा है ? लिहाज का नाम नहीं। मन की
कड़वाहट चेहरे की इक्का-दुक्का झुर्रियों को गहराती, त्योरियाँ तान गईं। मन हुआ आज कर ही दें, मनहूस का
पनहिया सराध। पर जमाने की हवा ….. जरा-सी बात गम्भीर मसले में बदल सकती है….।
अभी जगेसरा के ‘काम-किरिया’ के लेन-देन और छमाही सवाई की बदौलत पुराना बीस मन का हिसाब
तीस मन हो चुका है। ऐसे ही चलता जाए तो….. मगर अब किसी के दीन-ईमार पर ऐतबार का जमाना नहीं
रहा, सब हड़पने की नियत बनाए बैठे हैं। तिस पर रमेसरा ठहरा अकेला, न बीवी न बच्चे। माँ का क्या भरोसा,
चालीस-बयालीस साल की चमारिन कहाँ रड़ापा भोगने यहाँ बैठी रहेगी? किसी का घर-चैखट करेगी ही। ज्यादा से
ज्यादा बेटे के घर बसने के इंतजार में होगी। ऐसे में यह कहीं गुस्सा के भाग-वाग गया तो ….
अचानक ही सवाई दर सवाई निरन्तर बड़ा होता अनाज का ढेर और बदले में मिला मजबूत हलवाड़ा
उन्हें गायब होता दिखने लगता है…. वे क्षण भर में सँभल गये। बनावटी प्रेम से बोले- ‘‘देख बेटा! गुड़ की
थोड़ाई पर न जा। इसकी मिठास का ख्याल कर, ऐसी चीजें कहीं भरपेट खाई जाती हैं।’’
रमेसरा खून का घूँट पीकर रह गया। दूसरी बेला में वह हल लेकर खेत में पहुँचा और हर एक कूड़ में
कई-कई मर्तबा हल चला खूब गहरी जुताई करने लगा। शाम को टहलते हुए ठाकुर साहब खेत में पहुँचे। वहाँ का
माजरा देख, मन में दबी गुस्से की आग शोला बनकर लपक उठी- ‘‘अबे यह क्या तमाशा है ? अब तक सारा
खेत जुत जाता, मगर तू सिर्फ पन्द्रह-बीस कूड़……’’
‘‘बाबू साहेब, कूड़ काहें गिनते हैं, इसकी गहराई देखें, गहराई……’’ रमेसरा ने निडर भाव से उनकी आँखों
में झांकते हुए जवाब दिया था…..और रघुराज सिंह सन्न रह गये थे- जमाने की हवा एकबारगी उन्हें आँधी में
परिवर्तित होती दिख रही थी।










