आक्रोश का मंथन हुआ है

देखता हूँ आज फिर , आक्रोश का मंथन हुआ है ।
शहर, गाँव, गली-गली, जिसका अभिनंदन हुआ है।।
फिर कहूँगा आँच ये, पिघलेगी या पिघलायेगी ।
बस इसी उत्ताप से, यह. लौह भी कुंदन हुआ है।।
ढूँढती स्वातंत्रता फिर , विकल-दृग के नए सपने ।
सीमित रहा इतिहास ,वर्जित, पुनः वह क्रंदन हुआ है।।
कल्पना के द्वार पर, फिर से, सजी कुछ कामनाएं ।
जय पराजय से विमुख, मन आज भी ,चंदन हुआ है।।
जब – जब, अधर्मी दे रहा था, स्वर नए अन्याय को ।
बस उसी क्षण अवतरित, जग में वो यदुनंदन हुआ है।।
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