आसमाँ पानी हवा आग और ज़मीं है

आसमाँ पानी हवा आग और ज़मीं है
एक मुश्त-ए-ख़ाक में क्या-क्या नहीं है
एक बुत पर कुल-जमा इतना यक़ीं है
“वह ख़ुदा है ठीक है अपने तईं है”
रूह के दावे बड़े हैं जिस्म के और
कौन किसका है मकाँ किसका मकीं है
राहों की क़िस्मत में पत्थर है यहाँ तो
पाँवों के हिस्से सताइश भी यहीं है
दो जहाँ की हरकतें हैं मुझमें यानी
एक दुनिया तो मैं हूँ इक और कहीं है
Click to rate this post!
[Total: 1 Average: 5]













