उस शख़्स को बाग़ से देखकर

उस शख़्स को बाग़ से देखकर जाते हुए,
रोने लगते हैं वहाँ के फूल मुरझाते हुए।
उसे छू कर देखने का तज़ुर्बा नहीं है मगर,
मेरे हाथ काँपे तस्वीर को हाथ लगाते हुए।
नए पत्ते निकलते ही फड़फड़ाने लगते हैं,
जड़ों को कभी नहीं देखा शोर मचाते हुए।
ज़िंदा हैं उन्हीं के मोहब्बत की कहानियाँ,
जो लोग मर जाते हैं किरदार निभाते हुए।
उस जनाज़े पर रोने वाले बहुत रोए,इतना
कि श्मशान से वापस आए मुस्कुराते हुए।
किसी भी रिश्ते में लचक जरूरी है रखना,
टूट जाते हैं धागे अक्सर गाँठें लगाते हुए।
हर्षराज हर्ष
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