एक और द्रोणाचार्य

चिन्मय आज एक बड़ी प्राइवेट कंपनी में असिस्टेंट सी.ई.ओ.के पद के लिए इंटरव्यू देने आया था। अभी वो रिसेप्शन हॉल में बैठने ही वाला था कि किसी ने उसे उसके नाम से पुकारा। उसने देखा कि सामने उसके प्रायमरी स्कूल के टीचर खड़े थे।
चिन्मय ने खुश होते हुए उन्हें प्रणाम किया और पूछा-“सर आप यहां कैसे?”
सर ने उससे रहस्यमयी आवाज में कहा-“बेटे, तुमसे मैं कुछ कहने आया हूँ। आज तुमसे मैं कुछ मांगना चाहता हूं।इसे तुम गुरुदक्षिणा समझो।”
सर को आश्चर्य से देखते हुए चिन्मय ने कहा-“जी सर, जरूर मांगिये। आप तो मेरे गुरु हैं।आपसे ही तो ज्ञान प्राप्त कर मैं यहां तक पहुंचा हूँ । आप तो मेरी प्रेरणा हैं।”
सर ने कहा-“देखो चिन्मय, तुम्हें मालूम ही होगा कि इस पद हेतु लिखित परीक्षा में सिर्फ दो लोगों का चयन हुआ है चूंकि एक ही पद है तो मैं चाहता हूं कि तुम यह इंटरव्यू न दो। यहां से चले जाओ क्यों कि वह दूसरा उम्मीदवार मेरा बेटा है। मैं अपने बेटे को कोई सुख सुविधा या महँगे गिफ्ट तो दे न सका पर उसे अच्छी शिक्षा जरूर दिया और आज अगर वह इस पद पर बैठ जाता है तो मेरी तपस्या पूरी हो जाएगी।”
यह सुनकर चिन्मय को रक्त से लथपथ कटी उंगली को थामे हुए एकलव्य की याद आ गई।
Click to rate this post!
[Total: 6 Average: 5]