एक दर्द की बात न पूछो
अगणित दर्द छुपाए बैठा
एक दर्द की बात न पूछो
दिन तो गिन गिन कट जाएंगे
किंतु रात की बात न पूछो
शब्द नहीं है कुछ कहने को
इतनी पीर समाई मन में
पूछ रहा तुमसे ही बोलो
किस ने आग लगाई तन में
जो प्रतिक्षण घायल कर जाती
उस चितवन की बात न पूछो
अगणित दर्द छुपाए बैठा
एक दर्द की बात न पूछो
बंदनवार सजे आशा के
पर मंदिर के द्वार बंद हैं
संपुट वाचन में तेरी ही
स्मृतियों के नवल छंद है
पनघट पर भी प्यासा बैठा
रीते घट की बात न पूछो
अगणित दर्द छुपाए बैठा
एक दर्द की बात न पूछो
पाती ही साथी बन आती
रूप तुम्हारा अंकित जिसमें
आंखें सावन घन बन जाती
बरसे बूंद प्रीति की जिसमें
स्वाति बूंद का ही याचक जो
उस चातक की बात न पूछो
अगणित दर्द छुपाए बैठा
एक दर्द की बात न पूछो
अपलक दृष्टि लगाए बैठा
दीपक भी उस डेहरी पर
लगे महावर पांव पड़े थे
सर्वप्रथम तेरे ही जिस पर
बदला लिया समय ने कैसे
तुम उस घात की बात न पूछो
अगणित दर्द छुपाए बैठा
एक दर्द की बात न पूछो











