एक समय पश्चात्
नव निर्मित भवन को
भीतर – बाहर
खूब सजाया उसने
पहले तो भरा
तमाम अत्याधुनिक संसाधनों से
फ्रिज , ए .सी , वाशिंग मशीन से
माइक्रो ओवन , गीजर व हीटर
एल सी डी टीवी कम्प्यूटर से
फिर कीमती लकड़ी के फर्नीचर से
सोफे के नीचे दबा मोटा कालीन
छोटे – बड़े अनगिनत सामान
और फिर लगाया
दीवारों पर बड़े-बड़े पोस्टर
प्राकृतिक दृश्य के
कल – कल , कुल – कुल की ध्वनि
का आभास कराते झरनों का
कुछ विचार मंत्रणा करते
पेड़ों की शाखाओं पर
चिड़ियों के झुण्ड का
तो आपस में गुटुर गूं करते
कपोत युगल
कान खड़े किये चौकन्ने
हरी दूब घास पर
मखमली श्वेत लिबास में
दो खरगोश
कुछ चिकबरी गिलहरियाँ
एक दीवार पर
धान की रोपाई करती औरतों का
पेड़ों की डालों पर झूलों के चित्र
तो दूसरे पर खलिहान में
गेहूं की मड़ाई करते बैल
बैलों को हांकता
एक हाथ में चपकी लिए किसान
बिजली की चकाचौंध में
टांग दिया एक चित्र
लैम्पपोस्ट के भीतर
जलती लालटेन का
गाँव के ही चित्र में है
ताल से मछली पकड़ते लोग
उगते सूरज के संग
खेतों की ओर जाती बैलों की जोड़ियाँ
गोधूलि बेला में लौटते
गाय और बकरियों के झुण्ड
इसी तरह और भी
टांग दिए गये
विकास की आँधी में
ध्वस्त हुए प्रकृति के
संस्कृति के , सभ्यता के
तो परंपरा के कुछ चित्र
और ये सब
वैसे ही टांग दिए गये
जैसे बड़े हाल की दीवार में
टांग दिया गया पिता को
एक चित्र के माध्यम से
उनके न रहने पर
कभी न सूखने वाले
नकली पुष्पहार के साथ
कभी-कभी उसे लगता है
पोस्टर के पंछी घूरते हैं
उन चमकते फर्नीचरों को
जो तमाम उन पेड़ों को काटकर
बने हैं जो कभी उनके बसेरे थे
ताल के उस चित्र का
एक टांग पर खड़ा बगुला तो
हमेशा निहारता रहता है
ड्राइंग रूम के उस कोने में
रखे एक्युवेरियम को
जिसमें कैद हैं कुछ रंगीन मछलियां
कुछ नहीं बोलता वह
जैसे पिता नही बोलते
दीवार पर टंगे हुए
देखते हैं सब कुछ अपलक
धन के लिए लड़ते बच्चों को
लुप्त होती परम्परा को
लुप्त होते मान – सम्मान को
कहते हैं लोग चित्र भी बोलते हैं
और सुनते हैं दीवार भी
जरुर बोल उठेंगे एक दिन पिता
ये पक्षी , ये जानवर , ये बगुले
सब बोलेंगे एक साथ
पर्यावरण के लिए
पर्यावरण के समर्थन में










