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लघु कथा
Home›साहित्य›लघु कथा›कटोरी

कटोरी

By श्याम नारायण श्रीवास्तव
February 5, 2018
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कटोरी

“ वह कटोरी टूट गई है | पुरानी हो चली है | उसे फेंक दो | कभी भी हाथ में लग जायेगी |” उसने पत्नी से कहा | लेकिन पत्नी ने नहीं फेका | उसने एक दिन फिर टोका | तो उसकी पत्नी बोली , “ये हाथ में लग नहीं जायेगी बल्कि ये कहिये , ऐसा हाथ में लग गई है कि फेंकने की इच्छा ही नहीं करती | मोह सा हो गया है इस कटोरी से | आप भूल जाते हैं | लेकिन मुझे याद है | दस साल पहले कुछ परेशानी थी | हम लोग तब उस शहर में थे | जब तीन माह से वेतन नहीं मिला था | उस साल हम लोगों ने धनतेरस में कोई वर्तन नहीं लिया था | एक चम्मच और यही कटोरी ली गई थी |” उसे सचमुच ये सब याद नहीं रहता | स्कूल में गर्मी की छुट्टी हुई | पत्नी बच्चों के साथ गाँव चली गई | अब रसोई भी उसे ही संभालना था | एक दिन उसने कुकर में दाल डाल रखी थी | सोचा तब तक चावल साफ करके रख लेते हैं | चावल जिन दस किलो के डिब्बों में रखे थे , उनका मुंह छोटा था | चावल निकालने के लिए उसे वही कटोरी सामने दिख गई | छोटी थी इसलिए आसानी से काम में आ गई | इतनी ही देर में उसे लगा कि वह कटोरी कह रही है , “ देखो मुझे फेकने को कह रहे थे न | आख़िरकार मै काम आ ही गई | माना शरीर से थोड़ा निर्बल हूँ लेकिन कहीं न कहीं घर के बुजुर्ग की तरह समय पर तुम्हारे काम अवश्य आऊँगी |” चावल निकालने के बाद अब वह इतना शर्मिंदा था कि जैसे उस कटोरी को फेकने के लिए कह कर , सचमुच उसने घर के किसी बड़े-बूढ़े का अपमान कर दिया हो | उसने सम्मान जनक दृष्टि से देखते हुए , उस कटोरी को रसोई में एक उचित स्थान पर रख दिया |

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