कल्पनाओं के
कल्पनाओं के अनगिनत डगर पर,
साक्षी बन फिरते रहेंगे बन हमसफ़र।
भूत और प्रारब्ध में मिलते रहेंगे यूँही
करते अदाकारी बन सपनों का सौदागर
पग-पग पे काँटे ही काँटे बिछे हुये हैं,
कोमल पगडंडियों की चाह लिये फिरे हैं।
कभी यहाँ तो कभी वहाँ ढूँढते चले हैं,
पथिक हैं अनेक जो सम्भले और गिरे हैं।
बना ढाल उसी को मिला हैं हरमंजर।
कुछ तमन्ना हैं चाँद तारों को छू लूँ,
पिरोकर माल मनकों सँग गूँथ लूँ।
छू लूँ जुगनू बन उमड़कर उस उमंग से,
बुन लूँ धागा सँग बंधता डोर पतंग से।
उड़ जाऊं मैं पैरों में लगाकर पर ।
आनन्द सिंघनपुरी, छत्तीसगढ़
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