कूटनीति

दोपहर का समय था | एक दुकानदार के पास उसका साथी दूसरा दुकानदार भी बैठा था | दूसरे की दूकान उसकी दूकान से थोड़ी दूर पर थी | गर्मी का दिन था | दोपहर में ग्राहकों की आवाजाही कम थी | तो आपस में एक दूसरे के सुख –दुःख को साझा करने , दूसरा भी यहाँ आ गया था |
बस ऐसे ही बातचीत का सिलसिला चला तो पहले ने कहा , “बहुत प्राब्लम है यार , कोई नौकर एक दो महीने से ज्यादा टिकता ही नहीं | अभी एक महीने से जो काम कर रहा था , तीन दिन से गायब है |”
“क्यों ?” दूसरे ने पूछा |
“ पता नहीं क्यों भाग जाते हैं यार ? जबकि हर महीने पहली तारीख को उनकी पेमेंट दे देता हूँ | दिन में दो बार चाय भी पिला देता हूँ |” पहले ने बड़ी विनम्रता से बताया |
“ यही गड़बड़ है | तू समझता नहीं , नौकरों से कैसे पेश आते हैं | देख मैं बताता हूँ , चाय-वाय तो ठीक है पिला दिया कर | लेकिन पेमेंट कभी भी पहली तारीख को मत दिया कर |” दूसरे ने परामर्श दिया |
“क्यों ?” इस बार पहले ने आश्चर्य से पूछा |
“ देख यही तो व्यापार नीति है | इन लोगों को पहले से बता दे कि पगार महीने की पन्द्रह तारीख को मिलेगा और पैसा दिया कर खीँच-खांचकर बीस – पचीस तारीख के बाद | इससे हमेशा तेरे पास उसका लगभग एक महीने का पैसा बकाया रहेगा |”
“बस फिर वह कभी नहीं भागेगा | जायेगा तो उसी का नुकसान है |”
पहला अभी भी समझ नहीं पा रहा था कि यह व्यापार नीति है या इन बेचारे श्रमिकों के प्रति छल – कपट की कूटनीति |














