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कविता
Home›साहित्य›कविता›कैसी व्यथा

कैसी व्यथा

By आनंद सिंघनपुरी
April 11, 2020
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सुन  प्रभो हर  लो दुख त्रासरे।

फिर कभी न दिखे यह घाव रे।।

यह सभी जन की बहती दशा।

कर  सके हल  ना यह  दुर्दशा।।

***************

दुख  जहां सब  ओर विराजते।

सुख वहाँ  अपना पग  बांधते ।।

जग   बढ़े सत कारज  साधते।

व्यथित जीवन   पाँव  पखारते।।

******************

गुजरते   पल   खोकर  सोचते।

कर न पाय  यही जग  कोसते।।

उमर बीत  चला  अब  ताकते।

कुछ  खुशी कुछ चाहत बाँटते।।

(द्रुतविलम्बित छन्द-

विधान-हर चरण में 12 वर्ण,एक नगण,दो भगण और  एक सगण।)

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