कैसी व्यथा
सुन प्रभो हर लो दुख त्रासरे।
फिर कभी न दिखे यह घाव रे।।
यह सभी जन की बहती दशा।
कर सके हल ना यह दुर्दशा।।
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दुख जहां सब ओर विराजते।
सुख वहाँ अपना पग बांधते ।।
जग बढ़े सत कारज साधते।
व्यथित जीवन पाँव पखारते।।
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गुजरते पल खोकर सोचते।
कर न पाय यही जग कोसते।।
उमर बीत चला अब ताकते।
कुछ खुशी कुछ चाहत बाँटते।।
(द्रुतविलम्बित छन्द-
विधान-हर चरण में 12 वर्ण,एक नगण,दो भगण और एक सगण।)
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