क्या लिखूं,कैसे लिखूं ?

हो गया हूं फिर अपरिचित ,
क्या लिखूं,कैसे लिखूं ,
रत्नगर्भा ,रक्तरंजित !
क्या लिखूं ,कैसे लिखूं ?
सी रही है हवा फिर से ,
उस गगन का कोना कोना,
ढूंढता फिरता सदा जग ,
धरती का कोमल बिछौना ।
कल्पना की वेदियों पर,
कांपता यह मन सशंकित!
क्या लिखूं,कैसे लिखूं ?
धूप से डरता रहा पर ,
आज छाया से है डरना ,
बादलों के बीच चमकी ,
बिजलियों से है उबरना।
घुप्प अंधियारों की राहें ,
दीप पुनि-पुनि है प्रकम्पित!
क्या लिखूं,कैसे लिखूं ?
पूर्व परिचित का कोई,
संदेश,फिर मुझको बुलाता ,
व्यथा,पीड़ा का समुंदर ,
राह में कांटे बिछाता।
उठने वाली उर्मियां भी,
हो गई हैं,काल कवलित!
क्या लिखूं,कैसे लिखूं ?
आदित्य प्रकाश दुबे
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