गाँव बड़ा है प्यारा
गाँव बड़ा है प्यारा, बीता बचपन हमारा।
खेले है उस आँगन, तालों का घाट पावन।
पुरवाई गीत सुनाए, भौरें है गुनगुनाये।
पंछी है चहचहाये, पेड़ पौधे सरसराये।
थिरके न पाँव हमारा, बैठते न एक किनारा।
गाँव बड़ा है………
बीते पल मितों सँग,उड़ाते कभी पतंग।
गिल्ली डंडा खेलें, लूट झपटो के रेले।
गुलेलों की कंकरिया, फोड़े कई गगरियां।
बांटते हर पल खुशियां,लेते कई गुलाटिया।
चौराह लगे न्यारा, तरसे मिलते दुबारा।
गाँव बड़ा है………
महानदी में तैरते,ढालों पर है चढ़ते।
डुबकी लेते संवेरा, मछुआरों का डेरा।
नावों से आना जाना,खुद ही खेंते जाना।
रेतों से घर बनाना, उछलकर रंग जमाना।
लहरों की तेज धारा, बह जाता घर हमारा।
गाँव बड़ा है………
गाँव की उड़ती महक, बुलबुलों की चहक।
खेतों में लहराते धान, मुस्काते नित किसान।
बैलों की घन्टी बजते, सुनकर उसे उछलते।
रिमझिम बारिशों के सँग,अनोखे अपने रंग।
ले छातो का सहारा, गीली मिट्टी का गारा।
गाँव बड़ा है………
दादा-दादी संग खेलना,बाँहो संग झूलना।
जिद कर खरीदवाना, वो रूठना,मनाना।
लगे गाँव मेले जाना, खूब खिलौने खरीदना।
ऊँचे झूले झूलना, कहीं बातों को भूलना।
रातों में चमकता तारा, दिखाते कर इशारा।
गाँव बड़ा है………….













