जिंदगी में आलू और आलू सी जिंदगी

आलू को सब्जियों का राजा माना जाता है,अब खुद ही देख लो कभी आलू-टमाटर तो कभी आलू-गोभी तो कभी आलू-परवल तो कभी और कुछ। मतलब जिंदगी में हर तरफ आलू ही आलू। सीधे – सीधे बोलूँ तो जो भी सब्जी अकेली पकने को तैयार नहीं है, उन्हें आलू के साथ ही पकाया जाएगा। तो फिर राजा तो है ही आलू। आलू भी गज़ब है जो कि सिर्फ आलू नही है।
आप गौर करिये तो आलू और इंसान की जिंदगी में काफी समानता दिखाई देती है। उधर आलू बिना जिंदगी की कल्पना भी अकल्पनीय सी है तो इधर कुछ लोग ही आलू जैसे होते हैं जिन्हें बाकी सब्जी रूपी इंसानी जिंदगियों के साथ मिला दो तो जिन्दगी के स्वाद में मजा दोगुना हो जाता है। कुछ की जिंदगी तो आलू के अनेक रूपों सी गुजरती है। मतलब जैसा आलू पर गुजरती है कुछ वैसा ही जिंदगी पर भी। कोई दूसरों को स्वाद देने में भरता सा हो जाता है तो कोई खुद की जिंदगी चलाने में भरता हो जाता है।
जिंदगी के अनेक रूप हैं कोई बाटी के साथ खाने वाले चोखे सा तो कोई इस कदर छीला जाता है कि उसकी जिंदगी टुकड़े – टुकड़े चिप्स सी हो जाती है। जीवन की चढ़ाई में कुछ के पीठ में रगड़ कर बनाई गई चिप्स सी रिघारियाँ देखने को मिलती हैं तो कोई जिंदगी के बोझ तले पापड़ सा हो जाता है। और जिंदगी की दौड़ में ऐसे पापड़ हुए लोग भी बख्शे नही जाते उन्हें कभी तल के तो कभी भून के खा लेते हैं खाने वाले। उन खाने वालों में कभी बॉस तो कभी समाज भी शामिल रहता है।
जिंदगी को बहुत गंभीरता से लेने वाले और आदत से मजबूर नैतिकता की चक्की में खुद को पीसने वाले लोग अक्सर दमालू बन जाते हैं,मतलब उन्हें इतना कोंचा जाता है कि पूरे शरीर मे छेद ही छेद हो जाता है। पर मजे और ताज्जुब की बात ये है कि वो छेद कभी शरीर के आर पार नही होने देते लिहाजा दूसरे सिर्फ उनमें रसा लगाकर अपना स्वाद ही बढ़ाते हैं। किसी – किसी की जिंदगी कचालू माफिक होती है, जिसे सिर्फ कूचा जाता है। अपनी दिलफेंक हरकतों से कभी सरेराह बाजार में या फिर बच गए तो बीबी कचालू बना देती है। फिर ऊपर से मसालों की वो बौछार मय खटाई मिर्चा पड़ता है कि चटखारे लेने वाले गली मोहल्लों में चटखारे लेते पाए जाते हैं।
इन चटखारों के बीच किसी के आँख का पानी मर जाता है तो किसी के आँख में पानी आ जाता है।कोई पानी छोड़ देता है तो कोई पानी पी-पी स्वाद लेता है और कोई पानी पी – पी गरियाता भी है। तो साहब ये जिंदगी एक आलू के माफिक है। जैसे आलू के अनेक रूप रंग हैं वैसे ही जिंदगी के भी।कभी जिंदगी की जद्दोजहद में कूच कर टिकिया बना दिये जाओगे दूसरों के स्वाद की खातिर या फिर एक आलू की तरह एक ही जिंदगी में इतने टुकड़े कर के अंकल चिप्स बना दिये जाओगे कि छोटे छोटे बच्चों को भी तुम्हारे दर्द का अहसास नहीं होगा और निगल लिए जाओगे। भले ही तुम अपनी टुकड़ों में बँटी जिंदगी के साथ खूबसूरत धरती नुमा रंगीन लिफाफे में सिर्फ कृतिम हवाओं के साथ रहते आ रहे हो | पर एक बार भी किसी ने सुई चुभाई या लिफाफा फाड़ा तो टुकड़ों टुकड़ों में भी बचने की उम्मीद न रहेगी। कुछ दमदार दम तो भरते हैं पर आलू दम बन के बेदम से रह जाते हैं। कइयों की तो जिंदगी में छिलका भी नही उतरता भले ही अनुभवों के गर्म पानी में उबालकर निकाले गए हों, छिलके समेत कभी समोसे में तो कभी छोले में डाल दिये जाते हैं। उनका अपना कुछ नही बचता बस दूसरों का निवाला ही बन के रह जाते हैं।
इन सबके बीच कुछ लोग न आलू बनने को तैयार दिखते हैं और न कचालू,वो जिंदगी को ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया की तरह धर के और बच के निकलना चाहते हैं। उनकी इस कोशिश में एकाद बच भी गए तो उनमें से अधिकतर सड़ ही जाते हैं जिनसे सिर्फ बदबू ही बाहर आती है।वो न खाने लायक रह पाते हैं और न बहाने लायक | मतलब इंसानी दुनिया में उन्हें अबंडण्ड सी मतलब बहिष्कृत सी जिंदगी जीने को मजबूर होते हैं। तो जिंदगी आलू है साहब कभी पसेरी में भी कोई नही पूछता तो कभी किलो में ही इतराते फिरते हो। अपने स्वाभिमान का भाव चढ़ा कर रखोगे तो भी शान से बिकोगे मतलब इज्जत बरकरार रहेगी। गर इज्जत गँवा दी और सड़ गए तो नाक सिकोड़ कर वो लोग भी बगल से निकल जाएंगे जिनकी शामें बिना आपके कभी कटती न थीं।
जिंदगी स्मूथ है , सब कुछ बेहतर है तो सुबह के आलू के पराठे सी है जिंदगी वरना लोग शामें भी बिना फिंगर चिप्स के गुजार देते हैं। कहते हैं चावल और आलू के भाव से मंहगाई का आंकलन होता है। मतलब सरकार को भी महंगाई का आभास तुम्हारे ही इतराने पर होता है, पेट्रोल की क्या मजाल जो मंहगाई का एहसास कराये।यूँ तो इंसानी जिंदगी भी कभी बेमतलब हो जाती है उन्हें मरना ही पड़ता है राजनीति की चक्की में पिसकर बस वैसे ही जैसे तुम कभी बिखरा दिए जाते हो , राजधानी की सड़कों पर | ये बताकर कि किसान नाराज है,उसे आलू के भी भाव सही नहीं मिल रहे।
वैसे भी आप आज के समय में आलू को ऐसा वैसा तो बिल्कुल समझिये भी मत,क्योंकि एक तो ये आलू वैसे भी कभी राजनीति से दूर नही रहा दूसरे ये इतराये न तो करे क्या?क्योंकि क्या पता कौन सा आलू कब सोना बन जाए। बस वैसे ही जैसे कइयों की किस्मत रातोंरात बदल जाती है गर कभी अपने ही पुराने घर में गड़ा हुआ सोना मिल जाता है तो।अब आगे से कहीं ऐसा सोना मिले तो पता करना तो बनता है कि क्या पता वो कभी आलू ही रहा हो।क्योंकि सुना है कि कुछ लोग ऐसी मशीन की तलाश में लगे हैं जो आलू को सोना बनाती हो।
लिहाजा ऐ इंसान ऐ जिंदगी ऐ आलू भाव चढ़ने या फिर अच्छे दिनों की जरा सी भी उम्मीद और तुम्हारे अंदर का उत्साह तुम्हे आगे ले जाएगा वरना कोल्ड स्टोरेज में पड़ा आलू भी कभी – कभी बाजार का मुँह नही देख पाता और खत्म हो जाती है उस आलू सी जिंदगी भी जिसे इतना सजा और संवार कर रखने की जद्दोजहद में खपा दी तुमने अपनी सांसें।..सो जिंदगी में आलू और आलू सी हो चुकी जिंदगी का मर्म सही सा समझिए तभी महसूस करेंगे खुद में आलू सी पीड़ा या फिर आलू के पराठे में आनंद। तो इसीलिये कहता हूँ साहब कि जिंदगी में आलू तो है ही और गर आलू है तो आलू सी जिंदगी भी है।