जीवन की अंतरवीणा

मन की अंतरवीणा
कोलाहल को भेद
उमंग तरंग के छंदों से
कुछ कहती
कुछ गाती
प्रतिबिंबित करती
मधुर रागों को
तेरा सूनापन भी
मैं हर लूँगी
दूँगी तुझको
जीवन के राग सभी
पर
तुम कब जानोगे
कब समझोगे
कब पहचानोगे
निश्चछल स्नेह के
आवेगों को
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