त्रिलोचन को जाकर देखा मैंने उनके गाँव में

त्रिलोचन जी के गाँव की ओर-
पूर्व योजना के अनुसार उस दिन सुबह-सुबह सुलतानपुर से पहले मैं जासापारा गया । मुलाकात का समय रात में ही तय हो गया था । तो वहाँ साहित्यकार साथी चित्रेश जी पहले से ही तैयार मिले । जासापारा से कादीपुर और कादीपुर से त्रिलोचन के गाँव ‘चिरानी पट्टी’ तक आज की यात्रा करनी थी । कादीपुर पहुँचने के पहले ही चित्रेश जी ने कहा, “यहीं कादीपुर में संकठा प्रसाद सिंह ‘देव’ जी रहते हैं । वे उधर के ही रहने वाले हैं । चलिए पहले उनसे मिल लेते हैं । चिरानी पट्टी का रास्ता भी बता देगें और खाली होंगे तो शायद साथ चलने को भी तैयार हो जांय ।”
हम लोग कादीपुर बाजार में देव जी के यहाँ पहुँच गये । वे कहीं और जाने को तैयार थे । लेकिन उन्होंने चिरानी पट्टी जाने का हमें सुगम रास्ता बताया । फिर तो मैं चित्रेश जी के साथ प्रगतिशील विचार धारा के कवि त्रिलोचन शास्त्री जी के गाँव को देखने चल पड़ा । मंशा थी कि वहाँ जाकर देखते हैं । उनकी कविता के पात्रों का गाँव अब कैसा है ? नगई महरा, लखमनी, बैरागी, महजी, भोरई केवट, सुन्दर ग्वाला और उसकी लड़की चम्पा, फेरु, अमरेथू, घेवरा बुआ आदि-आदि ।
त्रिलोचन जी के दर्शन उनके जीते जी मैं नहीं कर सका था । जबकि मेरा गृह जनपद भी सुलतानपुर ही है । मेरे और त्रिलोचन जी के गाँव के बीच की दूरी साठ-सत्तर किलोमीटर से अधिक नहीं है । कादीपुर तक तो जाने कितनी बार मेरा आना-जाना हुआ । सुलतानपुर में रहते जनवादी कवि स्व० मानबहादुर सिंह जी से मिलने कई बार उनके गाँव बरवारीपुर (कादीपुर) तक गया था । कई गोष्ठियों में भी मिला था मानबहादुर सिंह जी से । अवधी के वरिष्ठ साहित्यकार डा आद्या प्रसाद सिह, डा सुशील कुमार पाण्डेय, मथुरा प्रसाद सिह ‘जटायु’, डॉ राम प्यारे प्रजापति आदि से मिलने तो प्राय: कादीपुर तक अभी भी चला जाता हूँ और कादीपुर से तो दस-बारह किमी से ज्यादा नहीं है चिरानी पट्टी । लेकिन संयोग ही है कि मैं कादीपुर से चिरानी पट्टी की एक छोटी सी दूरी तय करके त्रिलोचन जी के गाँव न जा सका ।
उनके जन्म शताब्दी के अवसर पर चिरानी पट्टी में आयोजित कार्यक्रम में जाना भी चाहा तो फैक्ट्री से अवकाश न प्राप्त हो सका था । साहित्य मनीषियों का मानना है कि आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी में बाबा नागार्जुन और शमशेर बहादुर सिंह के साथ तीसरे कवि त्रिलोचन थे । जिन्होंने तमाम विषमताओं, संघर्षों व देशकाल परिस्थिति को पैनी निगाह से देखते हुए साहित्य में जनसामान्य को साहित्य का हिस्सा बनाया ।
जिन्दल स्टील में कार्यरत होने से रायगढ़ (छत्तीसगढ़) में रहते एक दिन मैंने भाई चित्रेश जी से फोन पर कहा कि इस बार घर आने पर मैं चिरानी पट्टी त्रिलोचन जी के गांव जाना चाहता हूँ और आपको भी साथ चलना होगा । उधर से उत्तर आया । “ठीक तो अहै । जब भी सुलतानपुर आइये तो दिन भर का प्रोग्राम बनाइये, चला जाय चिरानी पट्टी । कौन दूर अहै हियाँ से चिरानी पट्टी ।”
उन्होंने आगे कहा, “मेरी मुलाक़ात तो त्रिलोचन जी से है । उनके द्वारा दी गई पुस्तक ‘तुम्हें सौंपता हूँ’ मेरे पास आज भी सुरक्षित है । लेकिन नजदीक ही रहकर उनके गाँव ‘चिरानी पट्टी’ मैं भी कभी नहीं गया । हो सकता है आपके ही साथ उनके घर जाने का बदा हो ।”
मैंने कहा, “बस यही बात है, इसलिए इस बार अवश्य चलना है । ”
उन्होंने कहा, “आइये अब यही सब करना है । आप भी रिटायर हो गये हैं, हम भी । अब तो घूमना ही है । चाहे जब आइये ।”
“ठीक है, मैं शीघ्र ही आ रहा हूँ आप तैयार रहिएगा ।” कहते हुए मैंने फोन काट दिया ।
मुझमें एक अजीब उत्साह था । लगा जैसे रायगढ़ से सुलतानपुर छह-सात सौ किमी दूर नहीं मुझे कहीं एकाध किलोमीटर ही जाना है और अभी चित्रेश जी वहाँ तैयार खड़े मिल जायेंगे । खैर..
चित्रेश जी के साथ–
बात तय हो गयी चित्रेश जी के साथ जाने की । ‘चित्रेश’ जी अर्थात दिनेश प्रताप सिंह ‘चित्रेश’, जो स्वयं एक सशक्त रचनाकार हैं । मैं जब भी सुलतानपुर जाता हूँ उनसे मुलाकात करके ही आता हूँ । यों भी मुझे उनका साथ दो कारणों से चाहिए था । एक तो ये कि वे जासापारा के रहने वाले हैं । कादीपुर के आसपास के भौगोलिक परिदृश्य से भली-भांति परिचित हैं । दूसरा रास्ते में चलते-चलते उनसे त्रिलोचन जी के विषय में अतिरिक्त जानकारी हासिल हो जाएगी ।
तो अब हम कादीपुर से दोस्तपुर मार्ग पर जा रहे थे । यों तो अपने उत्कृष्ट रचना कर्म के कारण एक वरिष्ठ साहित्यकार मात्र अपने गाँव व जनपद का नहीं रह जाता बल्कि वह पूरे साहित्यिक विरादरी की धरोहर हो जाता है । लेकिन जब भी उसके जीवन वृत्त को लेकर बात उठती है तो फिर उसमें माता-पिता से लेकर जनपद, गाँव, नहर, तालाब, पोखर, जंगल, खेत से खलिहान तक व शिक्षा-दीक्षा से लेकर आजीविका के साधन तक, सब कुछ दर्ज होता चला जाता है । ऐसे ही जब भी त्रिलोचन जी की बात उठेगी तो सुलतानपुर व चिरानी पट्टी की चर्चा किये बिना भला कोई आगे कैसे बढ़ सकता है ।
उत्तर प्रदेश के जनपद सुलतानपुर के चिरानी पट्टी में श्री जगरदेव सिंह के घर 20 अगस्त 1917 को जन्मे बालक वासुदेव सिंह का नाम ही आगे चलकर त्रिलोचन शास्त्री हो गया । कहते हैं कोई भी साहित्यकार जिस परिवेश में निवास करता है । उसके प्रति उसका अपना जो भी दृष्टिबोध है । वह उसकी रचनाओं में आ ही जाता है । उसका अपना जीता जागता समाज, भौगोलिक सन्दर्भ, तत्कालीन इतिहास, तमाम पीड़ित शोषित वर्ग की संवेदनायें, उसकी क्षेत्रीय भाषा, घटनाएँ, रीति-रिवाज, परम्परा, यहाँ तक कि मित्र मंडली की छवि रचनाओं में स्वत: अपना स्थान बना ही लेती हैं । साथ–साथ रहने वाले लोग अनजाने ही पात्र बन जाते हैं रचनाकार की रचना के ।
तभी तो उनकी रचनायें अपने समय की चिंता व जिन्दगी के संघर्ष को भी स्पष्ट बयान करती नजर आती हैं । तमाम भोगा हुआ यथार्थ रचना दर रचना चित्र की भांति उभर कर अपनी उपस्थिति को महसूस करा देता है । और ये सब त्रिलोचन के साहित्य में दिखा । यही कारण है एक सजग समीक्षक बड़े सरल शब्दों में कहता है कि एक रचनाकार का गाँव उनकी रचनाओं में बसता है । त्रिलोचन का बचपन भी ठेठ गाँव में बीता था । मैंने उनकी बहुत सी रचनाएँ पढ़ी हैं । रचनाओं में गाँव का परिदृश्य भी देखा है, किन्तु आज गाँव देखकर उनकी रचनाओं में उतरना चाहता था ।
त्रिलोचन का गाँव चिरानी पट्टी–
ज्यों–ज्यों हम चिरानी पट्टी के नजदीक आ रहे थे । त्रिलोचन की कविता के एक–एक पात्र हमारे मानस पटल पर अंकित होते जा रहे थे । वे सभी पात्र जिनसे मिला हूँ मैं, त्रिलोचन की कविता से गुजरते हुए । प्रतीत हो रहा था । वे सब हम दोनों की अगवानी में खड़े प्रतीक्षारत हैं । नगई महरा, भोरई केवट, अमरेथू, महजी, तो चरवाही करती चम्पा जैसे पात्र । त्रिलोचन हमें वहाँ नही मिलेंगे ये तो हमें पता था । लेकिन ये पात्र तो जरुर किसी न किसी रूप में मिल जायेंगे । ऐसा हमारा विश्वास था । वैसे भी मैं साहित्यकार के गाँव को साहित्य का तीर्थ स्थल मानता हूँ । यही सोचकर पिछले वर्ष रायगढ़ से तीस किलोमीटर दूर बालपुर गाँव भी गया था । जो छायावाद के कवि पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय जी का गाँव था । वह भी बहुत रोचक यात्रा थी ।
इधर कुछ किलोमीटर यात्रा के पश्चात् जब एक मील के पत्थर पर लिखा मिला कि दोस्तपुर दस किमी तो वहीं से सरैया बाजार शुरू हो गया, सरैया मुस्तफाबाद पूरा नाम था उस बाजार का । एक अच्छी बड़ी बाजार पार करते ही एक छोटी नहर मिली । बस यहीं से हमें चिरानी पट्टी के लिए दाहिने मुड़ जाना था । लिहाजा बिना किसी से पूछे मैंने मोटर साईकिल को दाहिनी ओर मोड़ दिया । और ऐसा चले जा रहे थे जैसे पहले कई बार इस रास्ते पर आये हों ।
त्रिलोचन शास्त्री इंटर कालेज
तभी चित्रेश जी ने पीछे से कहा, “बस एही रास्ता म थोरिन दुरिया पै त्रिलोचन जी के नाम से एक ठो इंटर कालेज अहे, अउर वहीं बगले चिरानी पट्टीव अहे ।”… और मिल गया इंटर कालेज भी ।

त्रिलोचन शास्त्री इंटर कालेज
मैंने चित्रेश जी से जानकारी चाही तो उन्होंने बताया कि भगौती बाबू त्रिलोचन जी के छोटे भाई हैं । ये पहले मिलिट्री में थे । इन्होंने ही अपने बड़े भाई त्रिलोचन जी के नाम से इस कालेज की स्थापना की है । कालेज परिसर में हम अधिक देर तो नहीं रहे । लेकिन बाहर निकल कर हमने कुछ फोटो लिए । पता नहीं क्यों ऐसा आभास हो रहा था । इस परिसर में त्रिलोचन जी का आभा मंडल हमें सम्मोहित कर रहा है ।
मैंने उस विद्यालय को हाथ जोड़कर प्रणाम किया । प्रतीत हुआ मैंने त्रिलोचन जी को प्रणाम किया । आँखे स्वत: बंद हो गई और अहसास हुआ कि त्रिलोचन जी ने हमें आशीर्वाद दिया । पानी नहीं बरसा था । लेकिन कुछ देर पहले आसमान में जो थोड़े से बादल आ गये थे, हट रहे थे । लगा त्रिलोचन अपनी कविता दोहरा रहे हैं-
बना बना कर चित्र सलोने यह सूना आकाश सजाया राग दिखाया रंग दिखाया क्षण-क्षण छवि से चित्त चुराया बादल चले गए वे
स्कूल परिसर से चिरानी पट्टी गाँव किधर है । बिना किसी से पूछे हम लोग सीधी सड़क पर आगे बढ़ गये । दाहिनी ओर मैदान की तरफ से कुछ चरवाहे जानवरों को लेकर आ रहे थे । ठंड में बेतरतीव ढंग से कपड़े पहने । एक छोटा सा बच्चा जिसकी बनियान इतनी बड़ी कि घुटनों तक पहुँच रही थी । अजीब सा सम्मोहन हुआ । बच्चे के स्थान पर हमें यहीं फिर दिखे त्रिलोचन…
उस जनपद का कवि हूँ मैं जो भूखा दूखा है
नंगा है अनजान, कला नहीं जानता ।
कैसी होती है क्या है, वह नहीं जानता
वही एक पेड़ के पास बंधी गाय बैठी थी। सर्दी का मौसम था । आसमान में कहीं से थोड़ा बादल आ गये थे । किन्तु बादल बिना बरसे ही हट गये थे। तो धूप धरती को गर्माने लगी । सूर्य की सुनहरी चमकती किरणें गाय के पीठ पर भी पड़ रही थी । शायद ऐसे ही किसी दृश्य को देखकर त्रिलोचन जी ने लिखा होगा–
आँख मूंदे पेट पर सिर टेक
गाय करती है घमौनी बंधी जड़ से
हमलोग लगभग एक किलोमीटर चले गये तो लगा जैसे कोई कह रहा है, “गलत जा रहे हो आपलोग ।” मैंने चित्रेश जी से पूछा, “भाई साहब, लागत अहै हमरे सब कुछ आगे निकरत अही ।”
उन्होंने कहा, “यहीं रुका, दुई जने आवत अहें पूछ लीन जाय ।” मैं रुक गया । आते हुए दो लोगों में एक नौजवान था तो दूसरा बुजुर्ग । नौजवान ने पैंट–शर्ट पहन रखी थी । बुजुर्ग ने मटमैली सी धोती और कमीज पहन रखा था । चित्रेश जी ने उस नौजवान से जानकारी ली । पता चला हम सचमुच आगे जा रहे थे । त्रिलोचन के गाँव का रास्ता तो स्कूल से थोड़ा आगे ही बाएं से था ।
चित्रेश जी जब तक रास्ता पूछते रहे । मैं चुपचाप खड़ा उस मटमैली धोती कुर्ता वाले गांव के आदमी को देख रहा था । वहां से हम पीछे मुड़े तो लगा एक बार उस बुजुर्ग से हमें पूछना चाहिए था कि कहीं आप का नाम ‘भोरई केवट’ तो नहीं हैं । जिसका जिक्र त्रिलोचन जी (धरती काव्य संग्रह) में करते हैं ।
भोरई केवट के घर / मैं गया हुआ था बहुत दिन पर /
बाहर से बहुत दिनों बाद गाँव आया था / पहले का बसा गाँव उजड़ा-सा पाया था /
उससे बहुत-बहुत बातें हुईं / शायद कोई बात छूट नहीं सकी /
इतनी बातें हुईं / भीतर की प्राणवायु सब बाहर निकाल कर
एक बात उसने कही / जीवन की पीड़ा भरी
बाबू, इस महंगी के मारे किसी तरह अब तो / और नहीं जिया जाता
और कब तक चलेगी लड़ाई यह? / इस अकारण पीड़ा का भोरई उपचार कौन-सा करता
रास्ते में कई आम, पीपल व नीम के पेड़ मिले किन्तु जैसे ही एक बड़ी बांस की कोठ दिखी तो निगाहें खोजने लगीं ‘नगई महरा’ को । जो त्रिलोचन की एक चर्चित और लम्बी कविता का मुख्य पात्र है-
गाँव वाले इधर-उधर कहते थे / नगई भगताया है / सामना हो जाने पर कहते थे / नगई भगत /
नगई कहार था अपना गाँव छोड़कर / चिरानी पट्टी आ बसा / पूरब की ओर /
रस्सियाँ भी नगई बरा करता था सुतली को कातकर बाध भी बनाता था…
चार भाई थे—नगई, बैरागी, बित्तू और कोई और बैरागी को मैंने देखा था जब तब चिरानीपट्टी कभी-कभी आता था…
मैंने एक दिन उधर पेड़ों के सहारे एक मड़ई खड़ी देखी पास ही बँसवट थी…
नगई खाँची फाँदे बैठा था हाथों में वही काम आँखें उन हाथों का हथवट चिताती हुई खाँची में लगी एक आँख मुझे भी देखा
हाँ लेकिन आज नहीं दिखा कोई नगई, न नगई का कोई वंशज ही । क्योकि गाँव में बसवट तो दिखी । लेकिन बांस की कैनी या अरहर का रहठा लेकर खांची फंदाये नगई का कोई वंशज न दिखा । न ही रस्सियाँ बरते ही कोई दिखा । सुतली कातते भी नहीं मिला कोई । इनारा (कुंआ ) दिखा तो लेकिन उबहन के साथ छूंछ जोर लेकर इनारे की ओर पानी भरने जाते हुए कोई न दिखा । परिवर्तन प्रकृति का नियम है । लगा कि चिरानी पट्टी ही नहीं गाँव–गाँव में अब परिवर्तन हुआ है । इसी के साथ हम लोग गाँव के पीछे की ओर से पूछते-पूछते त्रिलोचन जी के घर के मुख्य द्वार पर पहुँच गये ।
नीव के पत्थर थे त्रिलोचन–
शहरी परिवेश में बड़ा सा दो भागों में लोहे का फाटक । जिसमें एक बंद था, दूसरा खुला । बाहर ही मोटर साईकिल खड़ी करके हम भीतर गये । काफी बड़ा सा दुआर, बायें बरामदे में कार, सामने दो तीन अशोक के पेड़, एक छोटा आम का भी पेड़ और फिर दो नीम के बड़े पेड़, जिसके नीचे नीले रंग की ट्रैक्टर ट्राली और चार-पांच मीटर की दूरी पर लाल रंग का एक ट्रैक्टर । दाहिनी ओर एक बड़े से शेड के नीचे स्वराज कम्पनी की कम्बाइन हार्वेस्टर मशीन (जिससे धान व गेहूं की फसल को बिना मड़ाई किये सीधे अनाज एकत्र कर लिया जाता है )। फिर एक लोहे का फाटक और बड़ा सा घर, दीवारें सलीके से सफेद चूने से पुती हुईं । हर तरफ साफ सुथरा।
मैं चकित सा देख रहा था । गाँव के एक बड़े काश्तकार का घर । एक सम्पन्न परिवार का घर । और सोच रहा था ये त्रिलोचन की कविताओं का घर कैसे हो सकता है ? यहाँ तो कदम–कदम पर सम्पन्नता झलक रही है । लेकिन नहीं त्रिलोचन ने चाहे जितनी गरीबी में जीवन बिताया हो, ये परिवार के प्रति उनकी तपस्या का प्रतिफल है कि आज गाँव में उनका एक सम्पन्न परिवार है । निश्चय ही एक आलीशान भवन की नीव बहुत सुदृढ़ होती है । नीव के पत्थर थे त्रिलोचन । हांलाकि त्रिलोचन जी की इच्छा किसी और तरह के महल बनाने की थी, वे लिखते हैं —
महल खड़ा करने की इच्छा है शब्दों की
जिसमें सब रह सके, रम सके लेकिन सांचा
ईट बनाने का मिला नहीं है, शब्दों का
समय लग गया, केवल कम चलाऊ ढांचा
किस तरह तैयार किया है । सबकी बोली-
ठोली, लाग–लपेट, टेक, भाषा, मुहावरा
घर पर हमारी मुलाकात त्रिलोचन जी के भतीजे अरुण प्रकाश सिंह जी से हुई । उन्होंने बहुत ही विनम्रता से स्वागत किया । एक दूसरे से परिचय हुआ । तमाम बातों के मध्य चाय नाश्ते का सिलसिला चला । त्रिलोचन जी के सम्बन्ध में बातें हुई । उसी बीच मैंने पूछा,“क्या त्रिलोचन जी के साहित्य को लेकर यहाँ कोई पुस्तकालय है ।”
तो अरुण जी ने कहा, “जो भी चाहिए स्कूल में ही मिल पायेगा । वैसे आज छुट्टी है । आपको यदि कोई विशेष मैटर चाहिए तो बता दीजिये । मैं फोटो कापी करा के भेज दूंगा ।” मैंने कहा, “नहीं–नहीं मैं ऐसे ही पूछ रहा था ।” अरुण जी से वहाँ की खेती–किसानी पर भी चर्चा हुई ।

त्रिलोचन जी के भतीजे अरुण प्रकाश सिंह जी
त्रिलोचन के छोटे भाई श्री भगौती सहाय जी मिलिट्री में थे । रिटायर होने पर गाँव में रहे । अपनी खेती को बहुत आगे बढाया । बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई, अच्छे संस्कार दिए । बड़े भाई के नाम से 1969 में कटघरा पट्टी में श्री त्रिलोचन शास्त्री इंटर कालेज की स्थापना की । आपके भी दो पुत्र हैं, बड़े श्री सत्यप्रकाश सिंह जनपद में वरिष्ठ एडवोकेट है । उनका परिवार सुलतानपुर शहर में रहता है । गाँव से पूरा सम्बन्ध बना हुआ है । इस समय कालेज के वर्तमान प्रबन्धक वही हैं । बाबू भगौती सहाय जी के छोटे पुत्र श्री अरुण प्रकाश सिंह जी घर पर रहते हैं जो स्वयं 1984 के एमकॉम हैं, लेकिन उन्होंने नौकरी नहीं की ।
अपनी खेती कराते हैं । उनके पास खेती के लिए ट्रैक्टर, ट्यूब बेल, कमबाइन मशीन आदि वह सब कुछ है जो अत्याधुनिक किसान के पास होता है तो अपनी सुविधा हेतु कार व मोटर साईकिल भी है । घर में विद्युत व्यवस्था के साथ सामने खड़े लोहे के खम्भे में सोलर पैनल भी दिखा । ये सब गाँव में एक बड़े काश्तकार होने की निशानी है । बहुत अच्छा लगा कटघरा व चिरानी पट्टी में आकर । हम त्रिलोचन से नहीं मिल सके लेकिन जो उनके संस्कारित परिवार द्वारा प्रेम व आवभगत हमें प्राप्त हुआ । उसके कारण हमें उस घर के कण–कण में त्रिलोचन जी दिखे ।
त्रिलोचन के गाँव का प्राकृतिक दृश्य–
चिरानी पट्टी से लौटते समय हम जिस रास्ते से लौट रहे थे । वही सही रास्ता था त्रिलोचन के घर आने-जाने का । टेढ़ी–मेढ़ी पगडंडी थी । पगडंडी क्या सीधी–सीधी बात करें तो चकरोड था । प्रकृति ने उस समय जो अनुपम छटा विखेर रखी थी । उस मनमोहक दृश्य को देखकर किसी का भी कुछ क्षण रुकने का कहेगा ही । दोनों ओर खेत में सरसों के पौधे हरे-हरे परिधानों में पीले –पीले फूलों से लदे मंद पवन के झोंको से झूम रहे थे । फागुन के माह में दूर तक खड़ी चैती की फसल से जो मादक महक हमारी सांसो से भीतर जा रही थी । उससे हमें स्वर्णिम आनन्द की अनुभूति हो रही थी ।
अचानक मुझे कुछ याद आया । मैंने उस पगडंडी के एक मोड़ पर मोटर साईकिल रोक दी । पीछे बैठे चित्रेश जी बोले पड़े, “का भा हो ?” मैंने कहा, कुछ नहीं ऐसे ही । वह भी उतर कर खड़े हो गये । तब मैंने कहा, “यहाँ पांच मिनट रुकेंगे । बहुत दिनों बाद बसंत के इस साम्राज्य में खड़ा हूँ । दूर-दूर तक सरसों के पीले खेत के अतिरिक्त कोई नहीं दिख रहा था ।
मैंने चित्रेश जी से कहा, “चलिए सरसों के साथ फोटो लेते है ।”
एक बार मैंने, फिर चित्रेश जी ने सरसों की फसल के संग कई फोटो लिये । फिर पूरे खेत के साथ सेल्फी । सेल्फी में मोबाईल कैमरे में हम दोनों के अतिरिक्त दूर-दूर तक थी सरसों की फसल ।

त्रिलोचन शास्त्री जी के गाँव में लहलहाती सरसों

सरसों के साथ सेल्फी
चित्रेश जी फोटो खिचवाने की मुद्रा में खड़े हो गये तो हमने देखा कि आस-पास सरसों के पौधे ऐसे झूम रहे थे मानों वे भी उचक-उचक कर हमारे साथ सेल्फी में शामिल होना चाहते थे । हमने कई फोटो सेल्फी के माध्यम से लिए और इसी वक्त फिर से लगा त्रिलोचन भी सरसों के बीच में धीरे से खड़े होकर हमारी सेल्फी में आ गये । और हमें याद आ गई उनकी कविता…
गेहूँ जौ के ऊपर सरसों की रंगीनी छाई है,
पछुआ आ आ कर इसे झुलाती है, / तेल से बसी लहरें कुछ भीनी भीनी,
नाक में समा जाती हैं, / सप्रेम बुलाती है मानो यह झुक-झुक कर।
समीप ही लेटी मटर खिलखिलाती है, / फूल भरा आँचल है,
लगी किचोई है, अब भी छीमी की पेटी नहीं भरी है,
बात हवा से करती, बल है कहीं नहीं इस के उभार में। यह खेती की शोभा है, समृद्धि है,
गमलों की ऐयाशी नहीं है,
वापस आने के लिए हम फिर मोटर साईकिल पर सवार हुए । जैसे चरवाहे सुबह जब जानवरों को लेकर निकलते हैं तो अपनी मर्जी से उन्हें हांक कर ले जाते हैं । लेकिन शाम को वही जानवर सरिया की ओर अपने खूंटे पर खुद ही भागकर पहुँच जाते हैं । वैसे ही मोटर साईकिल अपने आप जहाँ मुड़ना होता घूम जाती है । उसे पता है कि अब वापस सुलतानपुर अपने ठीहे पर जाना है ।
चरवाहे पर याद आयी त्रिलोचन की कविता ‘चम्पा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती’ । जिसमें कवि ने चरवाही करने वाली अनपढ़ चम्पा को पढ़ने के लिए परामर्श भी दिया है । लेकिन वह मना करती है । गाँव, स्कूल के पास खाली पड़े मैंदानों में चरवाही करती चम्पा अब भी दिखी । लेकिन अब गाँव की रुपरेखा परिवर्तित हुई है । शिक्षा का विस्तार हुआ है । तो चम्पा भी अब काले-काले अक्षर चीन्हने लगी है । उसे इन काले चिन्हों से स्वर निकलना भी आ गया है । जिस चम्पा के लिए त्रिलोचन ने लिखा था —

चम्पा भी अब काले-काले अक्षर चीन्हने लगी है
चम्पा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती
मैं जब पढने लगता हूँ वह आ जाती है
खड़ी-खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता है
इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर निकाला करते हैं
हम वापस घर की ओर जा रहे थे । मोटर साईकिल पर पीछे बैठे चित्रेश जी से बातें भी हो रहीं थीं । इसमें त्रिलोचन के कई काव्य संग्रह जैसे धरती, गुलाब और बुलबुल, दिगंत, शब्द, मैं उस जनपद का कवि हूँ, अर्घं, तुम्हें सौंपता हूँ , ताप के तये हुए दिन ( साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त ) आदि संग्रह पर बात हुई तो उनके सानेट पर भी चर्चा हुई । चित्रेश जी की त्रिलोचन जी से मुलाकात थी ।
उन्होंने बताया वे नये -नये शब्दों को खोजते थे , गढ़ते थे और बहुत सलीके से उनका प्रयोग करते थे । वे कभी भी अनावश्यक शब्दों को खर्च नहीं करते थे । या यों कहिये कि वे शब्दों के प्रति मितव्ययी थे । यही कारण है कि वे अपनी रचनाओं में कम शब्दों में अधिक बातें कह देते हैं । उन्होंने जिन्दगी में बड़े संघर्ष को बहुत करीब से देखा है । जन सामान्य की पीड़ा को समझा है । जिनके प्रति अपार संवेदनाएं उनकी काव्य धारा के साथ स्वाभाविक रूप से बहती दिखती हैं । त्रिलोचन कई भाषाओँ के ज्ञाता थे ।
वैसे जहाँ तक भाषा की बात है त्रिलोचन जी लिखते है –
तुलसी बाबा भाषा मैंने तुमसे सीखी
मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो
कह सकते थे तुम सब कड़वी मीठी तीखी
प्रखर काल की धारा पर तुम जमें हुए हो
त्रिलोचन जी अंगेजी व संस्कृत में एमए थे । जीविका हेतु उन्होंने कई प्रेस में काम किया । कई पत्रिकाओं के सम्पादक रहे । अध्यापन किया । जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे । मुक्तिबोध सृजनपीठ के अध्यक्ष रहे । उन्होंने गीत, गजल, सानेट बरवै, मुक्त छंद लिखे । उन्हें हिंदी अकादमी ने शलाका सम्मान से सम्मानित किया था । ‘ताप के ताए हुए दिन’ संग्रह हेतु साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था । मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, भवानीप्रसाद मिश्र राष्ट्रीय पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद सम्मान जैसे बहुत से पुरस्कार, सम्मान मिले । रास्ते में इस तरह की बहुत सी जानकारियाँ हम एक दूसरे से साझा करते हुए घर की ओर वापस जा रहे थे ।
त्रिलोचन ने जीवन में तमाम लोगों को अपने विपरीत खड़ा देखा । यही कारण है उन्होंने कभी साहित्य के आलोचकों को वर्तमान समय का ‘नया पुरोहित’ कहा तो प्रगतिशील कवियों की नई लिस्ट में अपना नाम न पाकर सटीक प्रतिक्रिया की । उन्होंने प्राइवेट नौकरी को ‘आरर डार’ ( जो बहुत ही जल्दी टूट जाती है, जो हवा का एक भी तेज झोंका सहन नहीं कर पाती ) से सम्बोधित करके बहुत ही बेहतर ढंग से परिभाषित किया है । आज उनके द्वारा प्रयोग किये गये तमाम शब्द अपना अस्तित्व खो रहे हैं ।
इनारा, गोहनलगुई, डांड़–बांध, ग्वैड़े, खाट, भोजपात, कलेवा, खुजड़ खोज, अनकुस, फरचाना, मड़हा, खांची, पलिहर, बारी, सिवान, छीछालेदर जैसे शब्द भी गाँव से धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे हैं । फिर भी भविष्य की पीढ़ी के लिए उनके साहित्य में ये शब्द जीवित तो रहेंगे ही ।
शाम होते–होते हम जासापारा के निकट पहुँच गये थे । आज की यात्रा बहुत ही सुखद रही । सोचता हूँ आज यदि त्रिलोचन जी गाँव में होते और चलते समय अंत में किसी वरिष्ठ साहित्यकार से जैसे एक साक्षात्कार लेने वाला अंतिम प्रश्न पूछता है कि वर्तमान युवा पीढ़ी को आप क्या संदेश देना चाहेंगे ? उसी प्रकार यदि हम त्रिलोचन जी से पूछते तो शायद वे अपनी ‘धरती’ संग्रह की कविता से ये पक्तियां दोहरा देते –
पथ पर चलते रहो
निरन्तर सूनापन हो या निर्जन हो पथ पुकारता है गत-स्वन हो पथिक, चरण-ध्वनि से दो उत्तर पथ पर चलते रहो निरन्तर
और हम दोनों ही एक साथ मिलकर कहते, “ओके थैंक यु त्रिलोचन जी । आपके गाँव में आकर और आपसे मिलकर बहुत ख़ुशी हुई ।
इस तरह हम दोनों ने त्रिलोचन जी के गाँव में भ्रमण करते और उनकी कविताओं से गुजरते हुए वर्तमान में बदलते परिवेश का अवलोकन किया । जिससे जीवन में एक नवीन अनुभव का अध्याय और जुड़ गया ।






