दिन थका हारा गया रात मचल के आयी

दिन थका हारा गया रात मचल के आयी
नींद तब जा के इन आँखों में सँभल के आयी
उसकी आवाज़ में वो बात नहीं थी हरगिज़
मेरी ख़ामोशी से जो बात निकल के आयी
इक बदन लौट न पाया वहाँ से जाने क्यूँ
रूह जब आयी तो पोशाक बदल के आयी
इक सफ़र पूरा हुआ आज मेरे ज़ख़्मों का
आँखों से लब पे जब इक बूंद फिसल के आयी
पलकें भीगी हैं बहाओ भी है इक चेहरा भी
यानी याद उसकी रवाँ-दरिया पे चल के आयी
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