देश विभाजन और विस्थापना का दर्द
अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के समय भारत के दोनों बाजुओं में घाव हुए थे | पूर्व से और पश्चिम से | पश्चिम दिशा तो भारत को सदैव ही घाव देता रहा है | उसी दिशा से बाबर आया | मुगल वंश की नींव डाली तो उसके पहले भी खिलजी , गोरी , गजनवी , तैमूर , सिकंदर जैसे लोग भी पश्चिम से ही आए और भारत को गहरा घाव देकर चले गए | अंग्रेज भी पश्चिम से ही आये और पश्चिम बंगाल से व्यापार शुरू करने के साथ हमारी विनम्रता व सहनशीलता का लाभ उठाते हुए अपना अधिपत्य ही कायम कर लिए | एकता , अखंडता और आपस में भाई चारे के सौहार्द की मिशाल भारत , जिसे कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था | अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ नीति से पूरे भारत देश को अपना गुलाम बना लिया | परतंत्र हो गये थे सभी भारतवासी |
देश जब अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ और आजादी की तारीख तय हुई तो मुसलमानों ने अपना अलग देश चाहा | देश विभाजन का इतिहास बहुत बड़ा है | लेकिन अंत में यही हुआ कि हिंदुस्तान के दोनों बाजुओं को चोट पहुंचाई गई और पाकिस्तान देश का जन्म हुआ पश्चिम में पश्चिमी पाकिस्तान तो पूर्व में पूर्वी पाकिस्तान | पश्चिमी पाकिस्तान में आजादी के कुछ माह पूर्व आवाज उठी कि यहां से सारे हिंदुओं को भारत जाना होगा और नहीं जाएंगे तो मारे जाएंगे | उस विस्थापना में बहुत लोग मारे गये | लूटे गए | जिसमें मात्र धन दौलत ही नहीं स्त्रियों व बच्चियों की इज्जत भी लूटी गयी | ये जो लूटपाट का उन्माद था | उस दौरान भीषण रक्तपात भी हुआ | उस दौर में इन तमाम परिवारों में एक परिवार डॉ ऊषा उत्पल का भी था | जो उस समय मात्र ग्यारह वर्ष की थीं |
डॉ ऊषा उत्पल जिन्होंने इस विस्थापना की त्रासदी को साक्षात भोगा है | उनके द्वारा उसी दर्द का वर्णन है ये उपन्यास ‘विस्थापना का दर्द’ | जिसके मुख्य पृष्ठ पर ही शीर्षक के नीचे लिखा है ‘भारत विभाजन की त्रासदी का भोगा हुआ यथार्थ |’
यों तो ये उपन्यास डॉ ऊषा उत्पल की स्वयं की कहानी है | लेकिन पूरा उपन्यास पढ़ने के दौरान तत्कालीन समाज का पूरा इतिहास पाठक के समक्ष आकर खड़ा हो जाता है | एक ऐसा इतिहास जिसमें कुछ लोग आतंक का पर्याय बने थे तो बहुत से लोग भाई चारे के मिशल को कायम किये रहने को तत्पर थे | देश को आजाद हुए 72 वर्ष हो गए यानी आज 83 वर्ष से अधिक आयु की हैं डॉ ऊषा उत्पल | यह आंकलन उपन्यास के प्रारम्भ में दिए गये उनके ‘आत्म कथ्य’ से प्राप्त होता है | उन्होंने लिखा है , “ मैं 23 अगस्त 1947 को अपने परिवार के साथ भारत विभाजन के समय पकिस्तान से भारत की पावन धरा पर आई थी | यधपि उस समय मैं मात्र ग्यारह वर्ष की ,परन्तु वह दिन मेरी स्मृति में आज भी अंकित है |”
72 वर्ष पूर्व की घटना को उपन्यास के रूप में पढ़ते समय ऐसा प्रतीत होता था जैसे अभी कुछ दिनों की घटना हो | उपन्यास प्रारंभ होने के पूर्व डॉ ऊषा उप्पल ने आत्म कथ्य में लिखा भी है ,” मेरी इस कृति में कल्पना और असत्य कथन का तनिक भी समवेश नहीं है | जो भी इस पुस्तक में कलम बद्ध किया गया है वह एक भुक्तभोगी की आत्म कथा है |”
वे कहती हैं , “ मैं उस दौर से गुजरी हूँ जब भारत का विभाजन हुआ था | उस दर्द को मैं आज तक भोग रही हूँ | सम्भवतः आजीवन इस दर्द से छुटकारा नहीं पा सकूँगी |” इस दर्द के साथ उपन्यासकार के मन में कई प्रश्न उठते हैं | जैसे “ हम लोग जब विभाजन के पश्चात् पकिस्तान से भारत की पुण्य भूमि पर आये तो हम शरणार्थी कहलाये | अपनी विभिन्न समस्यायों से जूझते हुए विस्थापित लोग स्थापित होने कि चेष्टा में भटकते हुए लोग शरणार्थी क्यों कहलाते रहे ?
उन्हें आशा है कि विभाजन के समय स्थापना की स्थिति में जो प्रश्न उनके मन में आज तक जीवित हैं | उनके उत्तर उन्हें मिलेंगे | तभी वह कहती हैं “मुझे विश्वास है अपने प्रश्नों के उत्तर मुझे नई पीढ़ी से ही मिलेंगे | जिनके लिए विशेष रूप से मैं भोगे हुए यथार्थ के दस्तावेज प्रस्तुत कर रही हूं | मानवता की आशा यह नई कोपले ही हैं जो छायादार वृक्ष बनकर मेरे समान थकी रूपों को सुख शांति का अनुभव करा सकती हैं |”
और इस प्रश्न के हेतु स्वयं उपन्यासकार डॉ ऊषा उत्पल का सुझाव है , “कठोर परिश्रम से विभिन्न कष्ट सहते हुए सिर उठाकर समाज में अपना स्थान सुनिश्चित करने वालों को पुरुषार्थी कहना चाहिए , शरणार्थी नहीं |” पूरे उपन्यास में डा उप्पल का राष्ट्र प्रेम स्पष्ट दिखता है | वे कहती हैं कई बार जब लोग पूछते हैं, “क्या आप पाकिस्तान से आए थे तो मुझे अच्छा नहीं लगता मैं उत्तर देती हूं | नहीं हम लोग भारत से भारत में आए थे | मैं भारतीय थी भारतीय हूं और अंतिम सांस तक भारतीय ही रहूंगी |” इसके साथ डा ऊषा उप्पल का दूसरा प्रश्न भी बड़ा वाजिब है | वे कहती हैं “ धर्म के नाम पर झगड़ें फसाद आज भी होते हैं और सम्भवतः होते रहेंगे | मैं सोचने लगती हूँ घृणा का यह सैलाब कब मानव का पीछा छोड़ेगा ? क्या कभी नहीं ? क्या मानवता ऐसे ही सिसकती रहेगी ?
इस उपन्यास को पढ़ते हुए जब पाठक अतीत में विचरण करता है और वापस वर्तमान को जोड़कर तुलनात्मक अध्ययन करता है तो उसके भी मश्तिष्क में वे ढेर सारे अनुत्तरित प्रश्न स्वत: गूंजने लगते हैं | जो उपन्यासकार के भीतर आज तक मौजूद हैं | जैसे क्या इस घृणा की आंधी को रोका नहीं जा सकता ? कब तक धरती अपने ही बच्चों के रक्त से लाल होती रहेगी ? क्या धरती माँ का क्रंदन किसी को सुनाई नहीं नहीं देता ? क्या मानवता बहरी हो गई है ? क्या मानव भावना शून्य हो गया है ? कब तक माँओं की कोख उजड़ती रहेगी ? आदि- आदि |
उपन्यास पढ़ते समय जैसे – जैसे घटनाक्रम का वर्णन आगे बढ़ता है | प्रतीत होता कोई चलचित्र दिखाया जा रहा हो | सब कुछ जीवंत | उपन्यास के कुछ अंशों को पढ़ा जाए तो विस्थापना का दर्द व भारत विभाजन के समय की त्रासदी स्पष्ट होने लगती है । उपन्यास का एक अंश है “मेरे मामा जी के गैराज में एक दूधवाला रहता था | उसकी दो भैंसे थीं । जिनका दूध वह आस-पड़ोस के कई घरों में देता था । उसका नाम हंसा था | हम लोग उसे ‘हंसा मामू’ कहने लगे | क्योंकि वह मुसलमान था और उसे ‘मामू’ कहलाना अच्छा लगता था ।
एक दिन शेखपुरा से एक पत्र आया । मेरी माता जी की मौसेरी बहन जो शेखपुरा में रहती थी, को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी और उन्होंने हमारे सारे परिवार को जन्मोत्सव में भाग लेने का निमंत्रण भेजा था । उन दिनों हवाओं में धार्मिक उन्माद का जहर घुलने लगा था | अंग्रेजों के भारत छोड़ने और भारत विभाजन की बात फैलने लगी थी और भी कई प्रकार की अफवाहें फैलने लगी थी ।
हंसा मामू का एक भाई शेखपुरा में रहता था | वह फरीद को साथ लेकर वहां जाने को तत्पर हो गया और मुझे उन दोनों के साथ शेखपुरा भेज दिया गया | मुझे मौसी के घर पहुंचा कर वह दोनों अपने रिश्तेदारों के घर चले गए ।
उत्सव के बाद घर के सब लोग थक कर गहरी नींद में सो गए । रात को अचानक बहुत शोर सुनाई देने लगा और कई तरह की आवाजें आने लगी ‘अल्लाह हू अकबर’ , ‘नारा ए तकमील ‘ , ‘हर हर महादेव’ आदि । हम सब लोग डर से सहम गए । मौसा जी की पहली तीन बेटियों और मुझे लड़कियां होने के कारण पड़ोस के डॉक्टर रहमान के घर भेज दिया गया । जिन्हें हम सब चचा जान कहते थे।
रहमान चाचा की बेटी मेरी हमउम्र थी । हम सब लड़कियां बहुत भयभीत हो गई और रोने लगी । हमें डांट डपट कर चुप करा दिया गया | किसी तरह रात कटी और प्रातः सब शांत हो गया । प्रातः काल पुलिस आ गई तो पता चला कि उस रात मौसी के घर कोई जीवित नहीं बचा | सारी सजावट उजड़ चुकी थी और हवेली में सन्नाटा छा गया था | वह हंसती खेलती शानदार हवेली श्मशान में परिवर्तित हो चुकी थी । देखने वालों ने बताया कि छोटे मुन्ने को दरिंदे नेजे पर आर-पार टांग कर विजय चिन्ह की तरह ले गए थे।
शेखपुरा में उस रात कई घर तहस-नहस हो गए थे | पूरा शहर लाशों से फट गया था | तब के बाद से हंसा मामू और फरीद की कोई सूचना नहीं मिली |”
इसी उपन्यास में एक दूसरा दृश्य ,” पिताजी ने बताया कि शहर की अवस्था बहुत खराब होने के कारण मिलिट्री वाले गाड़ियां लेकर आए और जैसे जो बैठा था | उठाकर उस कैंप में ले गए जहां से लोगों को भारत भेजा जाना था | मेरी माता जी चूल्हा जलता छोड़कर चली गई थी | वहीं पास में आटा गूंथा पड़ा था | कोई वस्तु हटाने का अवसर किसी को नहीं दिया गया था | औरतें और बच्चों को मिलिट्री वाले ले गए थे और पुरुषों को ले जाने के लिए दोबारा आने वाले थे | हमें देखकर पिताजी फूट-फूट कर रोने लगे और मुझे अंत में अंक में भर लिया | हम तीनों ने मिलकर कुछ सामान घर से बटोरा | एक बड़े से बोरे में कुछ आवश्यक सामान रख लिया गया | सब कुछ शीघ्रता से किया गया और पिताजी घर को ताला लगाकर हमारे साथ तांगे में बैठ गए |”
डॉ ऊषा द्वारा वर्णित एक दृश्य को पढ़कर पाठक के रोंगटे खड़े हो जाएंगे । वे कहती हैं “अंबाला जाने वाली गाड़ी यार्ड में खड़ी थी और वह यार्ड प्लेटफार्म से बहुत आगे था | जब हम वहां तक पहुंचे तो देखा जहां गाड़ी खड़ी थी वहां की रेलवे लाइन के किनारे-किनारे 15-20 स्त्री पुरुषों के नग्न शव पड़े थे | बहुत ही वीभत्स दृश्य था | जिसका वर्णन करना किसी भी कलम के लिए असंभव है | उनकी अवस्था देखकर मृत्यु से पहले उन लोगों ने कैसी त्रासदी भोगी थी | उसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता था | मनुष्य अपना मनुष्यत्व भूल कर केवल धर्म की संकीर्ण जंजीरों में ही क्यों बना रहना चाहता है | कैसी अनबूझ पहेली है | यह धर्म जो केवल एक विश्वास है मानव और मानवता पर भी भारी पड़ जाता है |
जब लोग भारत आये कैम्पों में रहे और बाहर कुछ खाने का सामान लेने दूकानों पर गये तो वहां भी लोगों ने दहशत के कारण दुकानें नहीं खोली | जहाँ पिता जी गये थे वहाँ दुकान खोलने की बात की तो अंदर से आवाज आती है , “दरवाजा मत खोलना रिफ्यूजी है दुकान लूट लेंगे |” पाकिस्तान से वाले आने वालों को वे रिफ्यूजी कहते और डाकू लुटेरा समझते |
एक स्कूल में प्रवेश लेने के लिए हम विस्थापितों के साथ कोई सहानुभूति पूर्ण व्यवहार नहीं होता | कभी-कभी जब किसी विद्यालय से लौटाया जाता था तो मुझे वहां पढ़ने वाली छात्राओं को देखकर ऐसा लगता था कि मुझे कभी पुस्तकें लेकर किसी विद्यालय में जाने का अवसर नहीं मिलेगा | मैं हसरत भरी निगाहों से उन्हें देखती थी | कई स्थानों पर सुनने को मिलता था , “इतने सारे रिफ्यूजी आ गए हैं किस-किस को प्रवेश दे |”
एक घटना में लेखिका कहती है कि बी ए करने बाद मेरे एक सहपाठी ने अपने पिता जी से कहकर एक जगह ट्यूशन पढ़ाने की बात की । जब मेरे सहपाठी के पिताजी मुझको उनकी कोठी पर ले गए तो एक महिला दरवाजे पर आई और मुझे देख कर लौट गई | अंदर से आवाज आई, “अरे यह तो छोटी आयु की कोई रिफ्यूजी लड़की है | यह लोग ऐसे ही अच्छे घरों में घुसने की चेष्टा करते हैं | इसे मत रखियो |”
निश्चय ही विस्थापना के दर्द को लेकर निजी जीवन में डा ऊषा उप्पल ने बहुत दर्द भोगा है | किन्तु जीवन में तमाम ऐसी भी घटनाएँ हैं जहाँ वे उनके सहयोग की चर्चा ही नहीं करती बल्कि भूरि-भूरि प्रसंशा भी करती हैं | उपन्यास के अंत में ‘ एक आदर्श व्यक्तित्व’ के तहत उन्होंने लिखा है “ भारत विभाजन की त्रासदी ने मुझसे बहुत कुछ छीना और उससे मुझे अपूर्णनीय क्षति हुई | परन्तु इन कटु अनुभवों में से मुझे कतिपय अनमोल रत्नों की प्राप्ति भी हुई | मेरी इस जीवन यात्रा में मैं कुछ ऐसे आदर्श व्यक्तित्वों के सम्पर्क में आई जिन्होंने मेरे भावी जीवन के स्वरूप निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान दिया | बात 1950 की है जब उन्हें हाई स्कूल के बाद कालेज में प्रवेश लेना था और वहाँ के प्राचार्य का सहयोग मिला |
भारत विभाजन की त्रासदी को लेकर लिखे भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ को भी मैंने पढ़ा है | उसे भी पढ़ते समय पाठक इसी तरह के तमाम प्रश्नों से घिर जाता है | इस उपन्यास के पूर्व डा ऊषा की काव्य संग्रह ‘उदगार’ तथा ‘और अँधेरा छंट गया ‘ कहानी संग्रह प्रकशित हो चुकी है | समाज व साहित्य सेवा के कारण आपको कई सम्मान भी प्राप्त हो चुके हैं | उपन्यास ‘विस्थापना का दर्द’ की लेखन शैली अच्छी है | अंत तक पूर्ण पठनीयता है | मुझे लगता है कि कोई भी पाठक जब इस उपन्यास को पढ़ना शुरू करेगा तो पूरा पढ़कर ही उठेगा | यों भी उपन्यास बहुत मोटा नहीं | इसे एक लम्बी कहानी भी कह सकते हैं | भाषा अच्छी है , सरल है , स्थितियों का वर्णन सजीव है | अंत तक पूरी जीवन्तता है |
निश्चय ही इस उपन्यास को युवाओं द्वारा पढ़ा जाना चाहिए और स्वयं अपनी नजरिया से उन तमाम प्रश्नों का उत्तर खोजना चाहिए | जिन उत्तरों की अपेक्षा डा ऊषा जी को युवा पीढ़ी से है | यों तो ये एक लघु उपन्यास है लेकिन उपन्यासकार ने अपनी वे सारी बातें कह दीं ,जो उन्हें कहना था | इस त्रासदी में उनके द्वारा भोगे दर्द को बांटा तो नहीं जा सकता लेकिन आगे इस तरह के धार्मिक उन्माद न हों | इस पर सजग तो रहना ही पड़ेगा |
समीक्षित पुस्तक
विस्थापना का दर्द ( उपन्यास )
समीक्षक – श्याम नारायण श्रीवास्तव
उपन्यासकार – डा ऊषा उप्पल
प्रकाशक – नमन प्रकाशन – नई दिल्ली
-150 रूपये










