वर्तमान सन्दर्भों में समाज के पथ प्रदर्शक हैं ये सभी नाटक

प्रत्येक लेखक अपनी अभिव्यक्ति साहित्य की विभिन्न विधाओं के माध्यम से समाज के समक्ष प्रस्तुत करता है | जिसमें उसका अपना भोगा हुआ यथार्थ तो होता ही है साथ-साथ होता है कल्पना और विचारों का सुंदर तालमेल भी | उसमें होते हैं लेखक के द्वारा दिए गये तमाम समाधान भी | वह कोई भी विधा हो सकती है | कहानी , कविता , आलेख , नाटक कुछ भी | किन्तु प्रत्येक विधा का अपना विशेष महत्व है | जिसमें हमारे परिवेश के गंभीर विषयों पर जन सामान्य तक अपने विचारों को संप्रेषित करने हेतु नाटक एक बहुत सशक्त माध्यम है | ऐसे में तो और भी जब आज साहित्य के प्रति पठनीयता का संकट है | नाटक द्वारा एक समय में रंगमंच के माध्यम से किसी भी संदेश को बहुत से लोगों के मध्य सहजता से सम्प्रेषित किया जा सकता है | वैसे भी नाट्य शास्त्र में लोक चेतना को नाटक के लेखन व मंचन की मूल प्रेरणा मानते हैं |
‘वसुंधरा का कल्प वृक्ष’ नाटक संग्रह के नाटककार पं भानु प्रताप मिश्र ‘सूर्यांश’ जी यों तो अपने पेशे से एक सशक्त पत्रकार हैं | किन्तु समय – समय पर आपने अच्छी कवितायेँ लिखी और समसामयिक विषयों पर कई नाटक लिखे | जिनके टेलीफिल्म भी बने और सराहे गये | उनके द्वारा लिखे गये नाटकों का यह प्रथम संग्रह है | जिसमें संकल्प वृक्ष , शिक्षा एक व्यवसाय , जीवन का जल , अपने युग का धीमा विष , न्याय की चौखट , आधुनिक युग का संचार , बेटी है तो कल है आदि नाटक हैं | अभिनय के पूर्व आरम्भ होने वाले मंगलाचरण के साथ इस संग्रह में कुल सात नाटक संग्रहीत हैं | नाटक के शीर्षक मात्र पढ़ते ही विचारों की प्रतिध्वनि पाठक के समक्ष आने लगती है | इन नाटकों में शिक्षा , जल , न्याय , संचार , बेटी , पालीथिन आदि ऐसे गम्भीर विषय हैं जिनके मद्देनजर वर्तमान समाज में तमाम विमर्श जारी है | गोष्ठियां और सेमिनार आयोजित हो रहे हैं | निश्चय ही इन विषयों पर लिखा जाना चाहिए | हांलाकि नाटक पढ़ने से नहीं अपने मंचन से अधिक प्रभाव छोड़ता है | नाटक हेतु लेखक ने अच्छे विषयों का चयन किया है ये समाज की ज्वलन्त समस्यायें हैं | इससे लेखक के भीतर समाज के प्रति गंभीरता व उत्तरदायित्व स्पष्ट रूप से झलकता है |
प्लास्टिक के सामान आज हमारे रसोई से लेकर अध्ययन कक्ष क्या शयन कक्ष तक अपना अधिकार जमा चुके हैं | थोड़ा और गंभीरता से विचार करें तो आज प्लास्टिक मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक के सभी संस्कारों के संग ऐसा चिपक गया है कि जिससे मुक्त होना बहुत आसान नहीं दिखता | किन्तु सुविधाजनक दिखने वाले प्लास्टिक के इन तमाम उपकरणों से निकलने वाले जहरीले कण हमारे शारीरिक संरचना में घुसकर एक स्लो पोइजनिंग का काम कर रहे हैं | जिनसे निश्चय ही हम सब अनभिज्ञ हैं | इस नाटकों के लेखक श्री मिश्र जी ने नाटक ‘अपने युग का धीमा विष’ में इस भयावह स्थिति को समाज के समक्ष रखने का सफल प्रयास किया है |
15 दृश्यों के इस नाटक में मोन्टी व किशन दो साथी हैं | किशन की गाय पोलीथिन खाने से मर जाती है | ये बात मोन्टी द्वारा स्कूल तक पहुँच जाती है | और पोलिथिन के उपयोग से उपजे हानि पर चर्चा होती है | जिसमें यह बात उभर करके आती है कि पोलिथिन पेट्रोलियम पदार्थों से निकलने वाला कृतिम रेजिन से बना एक धीमा जहर है | जो हर वर्ष लाखों पशुओं के मृत्यु का कारण बनता है | और मानव को कैंसर का रोगी बना देता है | इससे बचने का एक संदेश है ये नाटक |
जीवन छीना पशुओं का जिसने , जो धरती को कर दे बंजर
पालीथिन कारक रोग कर्क का , है भू के सीने में खंजर
इसी प्रकार संग्रह का प्रथम नाटक ‘संकल्प वृक्ष’ पर्यावरण जैसे ज्वलन्त मुद्दे पर लिखा गया नाटक है | जिसमें यह भी दर्शाने का प्रयास किया गया है जहाँ प्रकृति को मानव ने अपनी सुविधानुसार दोहन किया है वहीँ अन्य जीवात्मा जैसे पशु – पक्षी इस प्रकृति को आज भी बचाने हेतु कृत संकल्प हैं | नाटक में एक गिलहरी द्वारा बीजारोपण की प्राकृतिक प्रक्रिया और बिट्टू नामक बच्चे का उसे गंभीरता से लेना तथा उसके द्वारा अनुकरण को दर्शाना बहुत ही मार्मिक है | इस नाटक के माध्यम से लोगों में पर्यावरण के प्रति सोयी हुई संवेदना जागृत होगी | बिट्टू अपने पिता से पर्यावरण सम्बन्धी कई प्रश्न करता है | उसे अनुकूल उत्तर भी प्राप्त होता है | नाटक में मिथकों का प्रयोग भी है | हमारे पौराणिक ग्रंथों में एक सन्दर्भ आता है | पंचवटी से सीताहरण के पश्चात् जब राम अपनी सेना के साथ रावण से युद्ध करने के लिए लंका जाना चाहते हैं और समुद्र पार करने के लिए जब पुल का निर्माण हो रहा था तो उसमें सबके साथ एक गिलहरी का योगदान भी वर्णित है | दरअसल लेखक का कहना है कि हमें अच्छी शिक्षा मात्र बड़ों से ही नहीं छोटे-छोटे जीव जन्तुओं से भी मिलती है | निर्भर है हमारा दृष्टिकोण कैसा है | इस नाटक में धरती माँ के दोहन पर एक गीत नाटक के प्रारम्भ में प्रस्तुत किया गया जो बहुत ही मार्मिक है संवेदना से परिपूर्ण है | जिसका कुछ अंश इस प्रकार है —
तुम्हे अपनी सुविधा याद रही
पर माँ की दुविधा भूल गये
न याद रहा माँ का आँचल
न याद रही वह गोद तुम्हे
जिस पर तूने जीवन पाया
उस धरा को कैसे भूल गये
और इसी नाटक के अंत में एक संकल्प है | जो सभी के लिए प्रेरणादायक भी है कि …..
हुई जो भूल हमसे आइये सुधर लें
खड़ा है संकट अब इसको निवार लें |
नाटककार अपने नाटक ‘शिक्षा एक व्यवसाय’ में कहता है , “ आज के आधुनिक शिक्षा प्रणाली से उत्पन्न व्यवसाय भारत जैसे समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाले देश में नैतिक मूल्यों के क्षरण का कारक है | यह हमारे समाज के लिए एक गम्भीर विषय है | इसके लिए आने वाली पीढ़ी को आधुनिक शिक्षा प्रणाली के साथ – साथ नैतिक मूल्यों से भी परिचय कराने की आवश्यकता है | जिससे हमारी सांस्कृतिक विरासत को बचाया जा सके |” इस नाटक में भी १५ अंक हैं | मंचन के समय दृश्य परिवर्तन बहुत ही शीघ्रता से करने होंगे | हाँ प्राय: नाटकों में नाटककार ने पात्रों के परिधान पर विशेष सीमा निर्धारित नहीं की है | बल्कि सीधे- सीधे कह दिया गया है कि परिधान सुविधा के अनुरूप उपयोग किया जा सकता है |
नाटक में अमन के दादा को संटी उचित सम्मान नहीं देता तो अमन को अच्छा नहीं लगता | और नाटक इसी क्रम में आगे बढ़ता है जहाँ नाटक का एक पात्र डा राजेश राय ने शिक्षा तो बहुत बड़ी प्राप्त कर ली है किन्तु संस्कार इतने परिवर्तित हो गये हैं कि गाँव व अपने माता-पिता से दूर हो गये हैं | आगे अमन के दादा से कई बार मुलाकात के पश्चात् अब डा राजेश में बहुत परिवर्तन आ गया है वे अब अपनों से भी विधिवत जुड़ गये हैं | निश्चय ही वर्तमान शिक्षा प्रणाली से नई पीढ़ी में नैतिक मूल्यों की हानि हुई है | बच्चे अपने पथ से दिगभ्रमित हुए हैं | ऐसा क्यों हो रहा है ? यह एक विचारणीय प्रश्न है |
अदालत के बारे जैसे मेरे एक साथी एक-एक अक्षर को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि अ –आओ , द – दो , ल –लड़ो और त – तबाह हो जाओ | अर्थात आज जिसे यदि किसी कारण वश न्याय हेतु अदालत जाना पड़ गया तो न्याय प्राप्त करते-करते वह तबाह हो जाता है | यह हमारी न्याय प्रणाली की भयावह सच्चाई है | दरअसल हमारी न्याय प्रणाली की जाने क्या व्यवस्था है कि साक्ष्य जुटाने व दोनों पक्षों को सुनने में अदालत में बहुत समय लग जाता है | जिसमें न चाहते हुए भी एक ईमानदार व सच्चे आदमी को भी अपराधी से समझौता करना पड़ता है | सबसे अधिक परेशान वह होता है जिसे गवाही देनी होती है | इन्हीं सब पृष्ठ भूमि पर रचा गया नाटक है ‘न्याय की चौखट’ | इस नाटक में थोड़ा हास्य – व्यंग्य भी होता तो अधिक प्रभावी होता |
‘बेटी है तो कल है’ नाटक लिखने के उद्देश्य को बताते हुए नाटककार मिश्र जी कहते हैं कि हमारे समाज के सोच में आये प्रदूषण के कारण समाज के समक्ष लिंगानुपात की भयावह समस्या है | आम धारणा है कि बेटे से वंश आगे बढ़ता है और बेटियां तो दूसरे की अमानत हैं |” इसी मिथक को तोड़ने के लिए ये नाटक रचा गया है | इसी तरह नाटक ‘जीवन का जल’ जल की महत्ता को दर्शाता है तो नाटक ‘आधुनिक युग का संचार’ में मोबाईल क्रांति के दौर में उसके दुरुपयोग का पर्दाफास है |
यों तो नाटक की कथावस्तु पौराणिक , ऐतिहासिक , सामाजिक या फिर काल्पनिक कुछ भी हो सक्ती है | किन्तु अभिनय ही नाटक का प्रमुख अंग है | क्योंकि किसी भी नाटक को श्रेष्ठतम ऊँचाई प्रदान करने में उसके पात्रों के वाक्चातुर्य और अभिनय कला का सटीक प्रदर्शन ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है | नाट्य विधा के विद्वानों का मानना है कि नाटकों में यों तो साहित्य के सभी रस का प्रयोग किया जाता है किन्तु शांत रस बहुत कम प्रयोग होता है और इसी तरह हास्य रस एक आवश्यक अंग है | प्राय: नाटकों में एक पात्र विदूषक के रूप में होता है जो हंसी – हंसी में बहुत गंभीर बाते दर्शक दीर्घा तक पहुँचाने में सफल होता है | गांवों में होने वाली नौटंकी में इसी विदूषक को ‘जोकर’ के नाम से जाना जाता रहा है | इन नाटकों में अलग से कोई ऐसा पात्र तो नहीं है लेकिन ये निर्देशक के ऊपर निर्भर है , वह इन्हीं पात्रों के माध्यम से संवाद में हास्य या व्यंग्य का पुट दे सकता है | सभी नाटक समाज की वर्तमान समस्याओं पर केन्द्रित हैं | इसलिए इनका मंचन समाज के हित में है | नाटककार भानु प्रताप मिश्र जी का यह प्रथम नाट्य संग्रह है | मेरी उन्हें ढेर सारी बधाई व हार्दिक शुभकामनायें स्वीकार हों |








