पागल

देर रात को
जब सारा शहर
शीत लहर के क़हर से
बंद चौखटों में आग ताप रहा
उस बियाबाँन में
निडरता से अडिग
दुर्बल श्याम वर्णा
खुले आकाश के नीचे
गलन वाली सर्दी में भी
बिना शाल,स्वेटर,लिहाफ़ के
अपने अंश को सीने से लगाए
फटे मलिन वस्त्रों को
उढ़ाती हुई
उलझे बालों से शीत को भगाती
साँसों से गर्माहट देती
फटी हथेलियों को गर्म करके
पैरों को तापती
अपने अंदर की बूँद-बूँद गर्माहट को निचोड़
उसकी ठिठुरन मिटाती
लोग उसे पागल और विक्षिप्त बुलाते
हाँ,वो पागल ही तो है
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