फीलिंग का टाइमिंग……

फीलिंग का टाइमिंग……
एक बार बहुत पहले भूकंप आने वाला था, फिर जब आया तो तीन दोस्त थे उन्होंने भी एक दूसरे से पूछा,क्या आपको भूकंप फील हुआ? तो सबने अपने अपने अनुभव बताए।हाँ मुझे हुआ था मैं छत पे था सीढ़ियों से उतर रहा था कि अचानक कई सीढियां एक साथ उतर आया। दूसरे ने कहा मैं तो फोल्डिंग वाले बेड पे बैठा था अचानक चूं चूं की आवाज आने लगी। अच्छा…मैंने तो पानी पीकर ग्लास बगल की आलमारी पर रखा था वो झनझनाता हुआ फर्श पर जा गिरा। मतलब हम सबने भूकंप को फील किया था। ऐसे ही आजकल कुछ लोगों को फीलिंग आ रहा है, लेकिन ये फीलिंग कुछ ऐसा है कि जैसे लुंगी पहनने वाले मद्रासी को पंजाबी होने और सर पे पगड़ी होने का फीलिंग आ रहा हो। वैसे फीलिंग आता सबको है बस सबका फील अलग अलग होता है। अब जैसे सत्ताधारी और गैरसत्ताधारी को ही ले लो, फील दोनों को होता है बस फीलिंग का इंग तो सबका एक ही होता है बस फील अलग अलग हो पाता है। अब कुछ यूँ समझो कि जो एकबार कुर्सी पे बैठ जाता है और जो कभी नही बैठा होता मतलब बैठने के प्रयास में लगा होता है, दोनों का फीलिंग अलग होता है। बस ऐसे ही जानों कि जो लात खाया होता है हाल ही में और जो खाने वाला होता है दोनों का फीलिंग अलग होता है। अपना अपना फील है कोई बिना खाए ही फील कर लेता है कोई खाने के बाद भी नही फील कर पाता। अब ऐसा भी नही है कि लोग फील नही करते अब दिल्ली की सीलिंग को ही ले लो “आप” “तुम” और “गुमशुम” तीनों पार्टियों को फील हो रहा है। “आप” तो जबर्जश्त फीलिंग के जरिए सीलिंग को “तुम” को फील करा रही,यहाँ तक कि वो “तुम” को फील कराने के चक्कर में “गुमशुम” को भी फील करा दे रही। अब “गुमशुम”को ही ले लो फील हुआ कि न्याय साहब की मौत स्वभाविक नही है तो “आप” ने लाइक मारते हुए रीट्वीट मारकर एहसास करा दिया कि हमको भी फीलिंग आ रहा है कुछ ऐसा ही।2019 आ रहा है संभव है कइयों का फीलिंग अब कामन हो जाय, जाहिर है थोड़ा और समय गुजरने दो नई सरकार के जन्म से पहले कइयों को एक साथ ही प्रसव पीड़ा की फीलिंग आएगी, उसके बाद ही जाकर नई सरकार का जन्म होगा। राजनीति में फीलिंग का बहुत महत्व होता है, पास पड़ोस में अगर चुनाव न हो तो सत्ता पक्ष को पाँचवे साल में फील होता है और विपक्ष को रह रह के फील होता है। ई ससुरा फीलिंग भी न गजब का चीज होता है, किसी की मौत पर भी अलग अलग फीलिंग आता है। सरदार के मरने पर अलग, मुसलमान के मरने पर अलग और हिन्दू के मरने पर अलग होता है। भगवान न करे अगर कोई दलित मर जाय, तब देखो कैसा फीलिंग आता है।बस कुछ ऐसा ही जैसे साफा बांध के माथा टेकने का अलग, जालीदार टोपी का फीलिंग अलग और जनेऊ धारण करने का अलग।वैसे फीलिंग तो अलग अलग आता ही है इससे तो कोई इनकार नही कर सकता अब कायदे से कूंटे हुए आदमी के शरीर के दर्द का फीलिंग और क्लास में मुर्गा बना देंने का फीलिंग अलग ही होगा न। हँसते हँसते रोने का और रोते रोते हँसने का फीलिंग जिसके पास होता है वही जानता है कि वास्तव में फीलिंग होता क्या है, एक बात ये भी है कि अगर टाइम से फीलिंग आ जाय तो अच्छी बात वरना तो बचपन और बुढ़ापे की तरह अगर गलती हुई और फीलिंग जरा देर से आई तो पजामा गीला होने का पूरा अंदेशा रहता है,वैसे फीलिंग का बना रहना भी जरूरी है नेता लोगन का वरना अगर जनता फील कर गई कि तुम्हारा फीलिंग सीलिंग के फीलिंग जैसा है तो कभी फील न कर पाओगे कि कुर्सी पर बैठने पर कैसा फील होता है।