बदकिस्मत

सवेरे की सैर पर दो वरिष्ठ नागरिक सज्जन एक उद्यान में मिले | 60 वर्षीय विदुर रायसिंह ने कहा – क्या बात है दीन दयाल? बहुत दिनों बाद मिले, घर में सब ठीक तो है ना, और बताओ कैसी कट रही है? दीन दयाल बोला – मत पूछो दोस्त, मेरे तीन बेटे हैं | एक से बढ़कर एक निकम्मे, स्वार्थी और जाहिल | बड़ा कहता है तेरे और भी बेटे हैं, उनके साथ रह ले, मैंने ठेका नहीं ले रखा तेरा | मंझला कहता है तूने अपना कर्तव्य पूरा किया, फ़र्ज़ निभाया, तो क्या एहसान किया? मगर सबसे छोटा तो मेरा मज़ाक उड़ाता है, हँसता है मुझ पर और दो रोटी देना तो दूर, मेरे मरने का इंतज़ार करता है | उसने तो मरणोपरांत का मेरा फोटो भी फ्रेम करा लिया है, कहता है ना जाने कब ये बुढ्ढा मरेगा, 2000 रु के किराए के कमरे पर कब्ज़ा किये बैठा है | इस सूखे पत्तेहीन, फलहीन ठूंठ का अब क्या काम |
यह सुन दूसरे सज्जन ने माथा पीट लिया और बोला – मैं सोचता था की एक मैं ही ऐसा बदकिस्मत हूँ जो मेरे बेटे ऐसे हैं | लेकिन लगता है तुम भी मेरी तरह ही हो – बदकिस्मत !













