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Home›रपट›बाल साहित्य लेखन में आवश्यक है बालमन का होना – डॉ प्रभात त्रिपाठी

बाल साहित्य लेखन में आवश्यक है बालमन का होना – डॉ प्रभात त्रिपाठी

By श्याम नारायण श्रीवास्तव
April 12, 2020
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साहित्य कला व संस्कृति एवं उद्योग के क्षेत्र में अग्रणी शहर रायगढ़ के ख्यातिलब्ध बाल साहित्यकार शंभूलाल शर्मा ‘वसंत’ जी के चर्चित बालगीतों का संग्रह “मेरे प्रिय बालगीत”  का विमोचन  साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार समीक्षक डॉ प्रभात त्रिपाठी  व अन्य वरिष्ठ साहित्यकारों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ | विमोचन कार्यक्रम का प्रारम्भ माँ सरस्वती की पूजा – अर्चना के एवम् अतिथियों के सम्मान के साथ पश्चात् प्रारम्भ हुआ |

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ प्रभात त्रिपाठी  ने अपने वक्तव्य में शुभकामनाएं देते हुए शर्मा जी के कुछ चुनिंदा कविताओं की चर्चा करते हुए बाल साहित्य लेखन शैली को अनूठा  व रोचक बताया । उन्होंने आगे कहा कि बाल साहित्यकार अपनी रचनाओं में जो मार्मिकता प्रस्तुत करता है | निश्चय ही वह बच्चों की मानवीय संवेदनाओं की गहराई में डूबकर जो अनुभव प्राप्त करता है उसे ही बाल कविता का स्वरूप प्रदान करता है । बालकवि बालमन होकर सुकोमल जिज्ञासाओं को शांत करता है | उसे कल्पना के पंखों के सहारे उड़ना सिखाता है | जो बालमन कभी चंदामामा व तारों से बात करते हैं | तो कभी उड़न खटोला में उड़ने लगते है | कभी कोयल की बारात आती है तो कभी हाथी क्रिकेट का कैप्टन बन जाता है । दरअसल बिना अच्छा बाल साहित्य लिखे, कोई लेखक अपने में पूर्ण नहीं हो सकता । बच्चे कल के भविष्य होते हैं । और बाल साहित्य बच्चे के मन को रंजित करते हुए, उसके सर्वांगीण विकास की आधार-भूमि तैयार करता है । बाल साहित्य खेल-खेल में उसे आसपास की दुनिया से परिचित कराता है । डॉ विनोद कुमार वर्मा  ने उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर गहरा  प्रकाश डालते हुए शुभकामनाएं प्रेषित किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि बाल कवि के सामने तो बस बालक का प्रत्यक्ष चेहरा होता है । जिस तक वह स्वतः अपने मन की भावनाएं सम्प्रेषित करना चाहता है । वह एक गहरी डुबकी लगाकर अपने बचपन में उतरता है तो उसकी भाषा, संवेदना और अभिव्यक्ति खुद-ब-खुद ऐसी चपल-चंचल हो जाती है, जो हर बच्चे को आकर्षित करती है | इस तरह की रची कवितायेँ खेल-खेल में जीवन की बड़ी से बड़ी बातों को बच्चे के जिज्ञासु मन तक पहुंचा देती हैं ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कवि अंजनी कुमार ‘अंकुर’ ने अपने उदबोधन में कहा कि शम्भु शर्मा वसन्त जी  की जितनी तारीफ की जाए वह कम है । उनके दवारा मुझ अकिंचन को छत्तीसगढ़ी कविता के लेखन के लिए अपना प्रेरणास्रोत मानना मेरा परम सौभाग्य है | जब  इनके साहित्य लेखन का आंकलन होगा तब इनके द्वारा बाल साहित्य में अवदान पद्मश्री  सम्मान  के हकदार होंगे । प्रोफेसर कान्ति कुमार तिवारी ने भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का उदाहरण दे कर वसन्त जी के कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए काव्य पंक्तियो से अपनी बात रखीं । इसी क्रम में गजलकार केवलकृष्ण पाठक ने बधाई देते बाल साहित्य पर उनके अनूँठे योगदान को सराहा । संगीत कलागुरु वेदमणि सिंह ठाकुर  ने अपनी गजलों से गुनगुना कर भूरि – भूरि प्रशंसा की । वरिष्ठ साहित्यकार गोपीनाथ बेहरा जी ने भी बाल साहित्य के चितेरे शर्मा जी को कोटिशः शुभकामनाएं प्रेषित की । वरिष्ठ साहित्यकार विजय राठौर ने इस अवसर पर महत्वपूर्ण विचार रखते हुए कहा कि अच्छा बाल साहित्य बच्चों की संवेदना का विस्तार करता है | उसे अधिक समझदार और जिम्मेदार बनाता है | उसमें सकारात्मक संवाद की क्षमता विकसित करता है ।

उक्त कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार मनहरण सिंह ठाकुर,प्रदीप उपाध्याय, नन्दलाल त्रिपाठी, गणेश कछवाहा, बयार अखबार के प्रमुख सम्पादक सुभाष त्रिपाठी, साहित्य अभियान पत्रिका के संपादक व बाल साहित्यकार सनत ने आज के दौर में बाल साहित्य की चुनौतियां और संभावनाएं क्या-क्या होनी चाहिये | इस पर विस्तार से प्रकाश डाला। उनका मानना है कि बाल साहित्य की सबसे बड़ी चुनौती है सुदूर गांव के बच्चों, गरीब सर्वहारा परिवारों के बालकों और आदिवासी बालकों तक पहुंचकर, उनके अंदर जीवन का हर्ष-उल्लास, आत्मविश्वास और कुछ करने की धुन पैदा करना, ताकि आगे आकर वे भी अपने जीवन के अधूरे सपनों को पूरा करें ।

आज हिंदी का बाल साहित्य बच्चों तक नहीं पहुंच रहा है । इस काम में बच्चों के माता-पिता और अध्यापकों की बड़ी भूमिका हो सकती है । अगर वे स्वंय इसका संवाहक बन कर अच्छा बाल साहित्य पढ़ें और उसे बच्चों के लिए उपलब्ध कराएँ । ‘नयी पीढ़ी की आवाज’ पत्रिका के सम्पादक भानुप्रताप मिश्रा,बाल साहित्यकार हेमन्त चावड़ा,गीतकार शुकदेव पटनायक , मनमोहन सिंह ठाकुर, हरप्रसाद ढेंढे, गुलाब सिंह कंवर,आशा मेहर ,आनन्द सिघनपुरी , कमलेश पाठक ,मिलन मलरिहा,बसन्त साव,प्रमोद सोनवानी, रामरतन मिश्रा,जयंत पटेल,पत्रकार लक्ष्मी नारायण लहरे,सुनील एक्सरे , दिनेश रोहित चतुर्वेदी,सोनू बरेठ,ओमप्रकाश शर्मा आदि ने इस अवसर पर  शुभकामनाएं प्रेषित दी | वही कोरबा से आई सुप्रसिद्ध लोक गायिका व संगीत शिक्षिका ने शंभूलाल शर्मा ‘वसन्त’  द्वारा रचित छत्तीसगढ़ महतारी की महिमा को बखान करती गीत की मनमोहक प्रस्तुति दी । साथ में अरपा पैरी की धार सुंदर गीत की प्रस्तुति सभी के अन्तस मन को हिलोर गया । छत्तीसगढ़ साहित्य परिवार की ओर से सुश्री कामिनी निषाद को प्रतीक चिन्ह,शाल,श्रीफल व सम्मान राशि  से सम्मानित भी किया गया। सफल मंच संचालन व संयोजन आनन्द सिंघनपुरी ने किया । सिंघनपुरी ने शर्मा जी के साहित्यिक योगदान की चर्चा की । उन्होंने बताया कि देश की सभी चर्चित बाल साहित्य की पत्रिका में शर्मा जी की कवितायेँ प्रकाशित हुई हैं | जिसमें नन्दन , मधुमुस्कान ,बाल वाटिका , लोटपोट , बाल भारती आदि के साथ अन्य सभी पत्रिकाएँ व प्रमुख समाचार पत्रों के परिशिष्ट शामिल हैं |

इस अनूठे  कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रीय कवि संगम के जिलाध्यक्ष अंजनी कुमार ‘अंकुर’ जी ने किया । विशिष्ट अतिथि कृषि वैज्ञानिक,सम्पादक व संरक्षक डॉ विनोद कुमार वर्मा,वरिष्ठ साहित्यकार केवलकृष्ण पाठक ,कलागुरु वेदमणि सिंह ठाकुर,शिक्षाविद प्रो.के.के. तिवारी,संरक्षक छत्तीसगढ़ महतारी संस्कृति संवर्धन  सेवा समिति के हरिश्चंद्र निषाद ,वरिष्ठ साहित्यकार गोपीनाथ बेहरा,वरिष्ठ साहित्यकार विजय राठौर रहें । शंभुलाल शर्मा’वसन्त’ ने अपने लेखकीय उदबोधन में सभी के प्रति आभार प्रकट कर धन्यवाद ज्ञापित किया तथा शताक्षी प्रकाशन रायपुर के अथक प्रयास की भी सराहना की । जिन्होंने बालगीत संग्रह को  मूर्त रूप देकर पठनीय बनाया । शर्मा जी ने अपनी प्रतिनिधि कविता रोना आया,  कैप्टन हाथी , सपने में तथा एक छत्तीसगढ़ी शिशु गीत को अपने अनूठे अंदाज में अभिनय व वाक शैली से सुना कर सभी का मन मोह लिया | बाल साहित्य और बच्चों में साहित्य की अभिरुचियां कैसे बढ़ें, इस पर बाल साहित्यकार शंभूलाल शर्मा का छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से अनूठा व सर्वोपरि योगदान है | इस सम्पूर्ण आयोजन पर बधाई देते हुए साहित्यकार श्याम नारायण श्रीवास्तव का मानना है कि इस तरह के आयोजन स्कूलों में जाकर बच्चों के बीच होते रहना चाहिए | जिससे बच्चों से सीधा संवाद बने |

 

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