हटना है या कि बाज़ी लगानी है जान की

हटना है या कि बाज़ी लगानी है जान की
है सामने तुम्हारे घड़ी इम्तिहान की
क़ीमत नहीं घटी सर-ए- बाज़ार धान की
हाक़िम ने क़ीमतें गिरा दी हैं किसान की
छत से न बोल पाए अलग बात है मगर
दीवारें जानती हैं कहानी मकान की
कल तक जो तेरे हाथ में था औरों के लिए
है आज तेरी ओर नज़र उस कमान की
सुन के तुरंत भूल ही जाना है बेहतरी
होती है कितनी उम्र चुनावी बयान की
तीर-ओ-कमाँ लिए है शिकारी कोई बताए
आवाज़ कब तलक सुनी जाएगी म्यान की
वो क़ैद हैं किसी के सियासी ख़याल में
आज़ादी चाहते हैं जो अपनी ज़बान की
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