मदर्स डे

आख़िर आज शारदा देवी अपनी उपेक्षा का दुःख हल्का करने बेटी-दामाद के पास चली ही गयी | उसके शराबी बेटे ने वहां आकर भी उसकी बेईज्ज़ती की | बेटे को माँ का, बेटी के पास रहना सहन न हुआ तो शारदा को ओल्ड एज होम की शरण लेनी पड़ी | लाडले बेटे की बचपन की यादों के सहारे ही उसके दिन बीत रहे थे | उसकी तोतली जुबान और शरारती हरकतों को याद करके उसकी आँखों की कोर और धोती की किनार भीग जाती | वह प्रतिदिन आस लगाती पर वहां कोई नहीं आता, उसके दुखों के पैबंद पर अपनेपन का मरहम लगाने | वह सोचती, भगवान दर्द के ऐसे ज़र्द लम्हे किसी को भी ना दे | हर रोज़ की तरह आज फिर शारदा की आँखें सुबह से ही चौखट पर टकटकी लगाए हुए थी | दरवाज़ा खुलते ही आँखों में कौंधती उम्मीद की रौशनी पल भर में बुझ गयी जब शारदा का बेटा आज भी न आया | फिर आगे दिन की शुरुआत इसी शाश्वत सूनेपन से होती है | वह स्वयं बुदबुदाती है किससे शिकायत करूँ, उसकी भी मजबूरियां हैं | जहां रहे सुखी रहे | मैं तो फिर भी उम्र के आखिरी पड़ाव पर हूँ | बची हुई ज़िन्दगी भी जैसे तैसे कट ही जायेगी | बोलते बोलते उसकी बूढ़ी धुंधलाती आँखों से सूखे आंसू की बूँद टपक जाती है | तभी उसे सुनाई देता है, कोई कह रहा था – आज मदर्स डे है |













