मन की बात कोई ना समझे

मन की बात कोई ना समझे ,
मन फिर चला अकेला ।
तरुणाई फिर से है मुखरित,
कैसा अद्भुत मेला ।।
झंकृत है यौवन के स्वर ,
फिर हवा बही मधुमास की ,
अंधियारों से जीत गया रवि ,
आशा बढ़ी उजास की ।
दूर गगन में गायें पंछी ,
मंगलमय यह वेला ।।
मन फिर —
कई भाव रह-रहकर उमड़े ,
कई भाव अविछिन्न हुये ,
कई मनोहर गीत सजे फिर ,
कई सर्वथा भिन्न हुये।
आज खिलौनों , ने है जीता ,
चार दिनों का खेला ।।
मन फिर —
आज सजाए फिर से हमने ,
अपने, शीशे वाले घर ,
आज बढ़ा हिम्मत वालों में ,
जाने कैसा कल्पित डर ?
कोई बांट रहा है छिप कर ,
सबसे बड़ा झमेला ।।
मन फिर —
फिर से , सूखे ह्रदयों में ,
हमको , रसधार बहाना होगा ,
जो जीवन को पार लगाए ,
ऐसा गीत सजाना होगा ।
जान समझ कर , डूब रहा जो ,
ना वो गुरु , न चेला ।।
मन फिर —