महंत बसंत की शोभा शुभा अनंत

हमारे पाँचांग के अनुसार माघ माह की शुक्ल पंचमी से शुभारंभितह होने वाली ….छह ऋतुओं में सर्वाधिक सौंदर्यमयी और सुहावन -मनभावन बसंत ऋतु सिर्फ़ साहित्यकारों की ही नहीं अपितु जन साधारण की भी सर्वप्रिय ऋतु है ,जिसे कोई ऋतुराज कहता है तो कोई ऋतुओं की रानी…. जो भी कह लो पर यह है अत्यंत सुहानी और नुरानी ,जो बाग़- बगीचों में रंगारंग सुरभित फूलों कलियों की भीनी -झीना महकती बहार बन कर खिलखिलाती है , खेतों में सरसों के वासंती दुपट्टे लहराती है , धरा पर हरियाली के मखमली क़ालीन बिछाती है और वृक्षों के वस्त्र बदलती है अर्थात सकल तरू-पाप जीर्ण हुए पीत पत्तों को तज कर हरे चमकीले किसलय धारण करते हैं।मलयानिल और पुरवाई साँसों में जैसे नव रवानी भर देती हैं। मौसम समशितोषण हो कर मुस्कुरा उठता है। माघ,फाल्गुन तथा चैत्र … ये तीन माह ही मधुमास कहाते हैं। कितनी प्यारी बात है न कि हमारे पांचांग में फाल्गुन वर्ष का अंतिम माह है और चैत्र पहला और इन दोनों को क्रमश: बिदा होते और आते बसंत ऋतु भीगे और हँसते नैनों से देखती है । माघ की पंचमी सरस्वती- पूजा पर्व के रूप में मनाई जाती है और हम क़लमकार इस तिथि को महाप्राण निराला जी का शुभ जन्मदिवस भी श्रद्धापूर्वक मनाते हैं। धरा पर स्वर्ग उतार लाने वाली इस विश्व सुंदरी की महिमा और गरिमा को मैंने चंद दोहों में समेटने का प्रयास किया है…….,,
१-
महके महुआ माधवी, खिले जूही गुलाब।
मधुबन सारे देखते,मधुमास के ख़्वाब।।
२-
पवन बसंती चल रही, वासंती है धूप।
धरा पल-पल बदल रही, कैसे अपना रूप।।
३-
अमराई बौरा उठी, कोकिल गाये गीत।
वापस घर को आ गये ,सबके रूठे मीत।।
४-
फूली सरसों खेत में, छेड़े बुलबुल राग।
ऋतुराज जी आ गये, बाँध बसंती पाग।।
५-
सरस्वती की वीणा के, सकल बज उठे तार।
बोध-खिड़कियाँ खुल गईं, सुन मीठी झंकार।।
६-
बसंती बाना रंगा, फिर वीरों ने आज।
भारत माँ के हो गये , जैसे पूरे काज।।
७-
फूलों पर कविता ग़ज़ल, वासंती इतिहास।
बिरह-मिलन के गीत भी, लिखता है मधुमास।।
८-
बसंत ऋतु हरती सदा, सारे रोग विकार।
सबसे मीठी रुत यही, कहता है संसार।।
९-
फूल मगन हो झूमते, सुन बसंत का राग।
मिल आपस में खेलते, शबनम-जल से फाग।।
१०-
टेसू और पलाश कुसुम, जैसे हों अंगार।
वन-उपवन दहका रही, शोभा अपरम्पार।।
११-
वाणी वीणावादिनी, तेरा बहु उपकार।
दिया ‘ निराला ‘ का हमें,वासंती उपहार।।
१२-
परी बसंती फिर उतर, धरती पर एक बार।
कई ‘ निराला ‘ हैं खड़े, करने द्वाराचार।।
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