माँ के नाम की चिठ्ठी

प्रत्येक शनिवार दोपहर में वह पत्र पेटिका का ताला खोलता है | उसमें से पत्रों को बाहर निकालता है | एक-एक करके सबको पढ़ता है | सर्व प्रथम एक रजिस्टर में पत्र लिखने वालों का नाम अंकित करता है | फिर उसके नीचे संक्षिप्त में उनकी समस्यायों को | जिसमें यह लिखा होता है कि याचक देवी माँ से क्या कहना चाहता है | फिर वह सारे पत्रों को इस प्रकार फाड़ता है जैसे कोई रद्दी कागज के टुकड़े को फाड़ता है | या फिर जैसे कोई विद्यार्थी कापी के उस पन्ने को निकालकर फाड़ देता है जिसमें लिखते समय कुछ गलतियाँ हो जाती हैं | और फाड़कर एक कोने में फेंक देता है या फिर डस्टविन में डाल देता है | जिसे सुबह कचरे वाला उठा कर ले जायेगा |
पंडित अविराम शास्त्री याचक द्वारा लिखे गये उन पत्रों को फाड़ता तो है रद्दी कागज की तरह , लेकिन उन्हें यों ही नहीं फेंकता | शाम को जब थोड़ा अँधेरा होने लगता है तो मन्दिर के पास वाले पीपल के पेड़ के पास जाता है | जो उस बड़े तालाब के एक किनारे पर है | तालाब के दो तरफ पक्के घाट बने हैं | भक्त लोग वहाँ जाकर हाथ – पैर धुलते हैं | और मन्दिर में देवी दर्शन को निकल जाते हैं | दिन में कितने लोग तो उन घाटों पर स्नान करते भी दिख जाते हैं | पीपल के पेड़ के आस पास कोई घाट नहीं है | लोग कहते हैं इधर तालाब बहुत गहरा है | यहाँ कोई गहरा कुण्ड है | इस डर से भी कोई उधर नहीं जाता | कुछ लोग यह भी कहते हैं कि इसी कुंड से देवी माँ की वह मूर्ति निकली थी जो मन्दिर में स्थापित है |
अविराम शास्त्री उसी कुण्ड के पास जाता है | फाड़े हुए सारे पत्रों को इस प्रकार फेंकता है जैसे कोई कूड़ा करकट फेंकता है | बड़बड़ाता भी है | पता नहीं कैसे–कैसे लोग हैं | भला देवी जी को पत्र लिखने से किसी समस्या का निराकरण होता है | अरे कर्म करो कर्म – काहिलो | जाओ तुम्हारी समस्या गई कुंड में | अब देवी जी ही बेड़ा पार लगाएंगी और हंसता हुआ वापस आ जाता है | उसे पत्रों को पढ़ने व फाड़कर फेकने में बड़ा मजा आता है | लेकिन रजिस्टर में लिखना बहुत अजीब सा लगता है |
किन्तु क्या करे , बाबा ने जो कहा है | तो पत्रों को रजिस्टर में चढ़ाना ही पड़ेगा | लिहाजा वह कुछ पत्रों को नाम और समस्या के साथ रजिस्टर में चढ़ा भी देता है | और अधिकतर यों ही फाड़कर फेंक देता है | हालाँकि बाबा को यही पता है कि अविराम पत्र पेटिका में आये सारे पत्र रजिस्टर में अंकित करता है |
इस मंदिर के देवी माँ के प्रति लोगों में अटूट विश्वास है | सबसे बड़ी बात तो ये है कि लोगों में यह भी एक धारणा दूर-दूर तक प्रचलित है कि इस मन्दिर में देवी माँ के नाम चिट्ठी लिख देने से समस्या का निराकरण हो जाता है | लेकिन अविराम शास्त्री में ये विश्वास अभी तक जागृत न हुआ था | लिहाजा वह सारे पत्रों को रजिस्टर में अंकित नहीं करता | कुछ पत्रों को तो यों ही पढ़कर फाड़ देता है | जैसे कोई विद्यार्थी परीक्षा में पास होने के लिए देवी जी से याचना करता है या फिर प्रेमी-प्रेमिका के पत्रों को भी वह बड़े चाव से पढता है | फिर उन्हें रजिस्टर पर बिना अंकित किये ही फाड़ कर फेंक देता है |
फाड़ते समय कुछ न कुछ बोलता रहता है, “बस अब देवी जी को और कोई काम नहीं बचा है | तुम्हारी जगह परीक्षा में बैठ जाएँगी और तुम उत्तीर्ण हो जाओगे | तुमको तो पढने-लिखने की कोई आवश्यकता है नहीं | और इनको देखो अपने प्रेमिका से शादी करनी है | अरे तो करो न भाई | उसमें देवी जी को क्या करना है | क्या चाहते हो देवी जी दोनों घर वालों के बीच बैठ कर पंचायत करें | छोटी-छोटी समस्या भी देवी जी के सिर पर डालकर ये लोग ऐसे चले जाते हैं जैसे देवी जी हमेशा इन्हीं के लिए फुरसत से बैठी रहती हैं | तुम्हारे घर में भी तो एक माँ है | कभी उससे भी बात करो | पिताजी से बात करो | जिसने तुमको पाल- पोषकर इतना बड़ा बनाया है | ऐसे याचकों के प्रार्थना पत्र वह रजिस्टर में कभी नोट नहीं करता और फाड़ कर फेंक देता है |
उसने अन्य मन्दिरों में भी लोगों को लाल कपड़े में नारियल बांधकर लटकाते देखा है | कहीं – कहीं तो धागा बांधते भी देखा है | लोगों का मानना है इससे मन्नत पूरी हो जाती है | लेकिन वह इन सब को हमेशा आडंबर ही मानता रहा | कभी – कभी उसे लगता है जितनी समस्या रजिस्टर में नोट हो जाएगी | उन सबको देवी जी को देखना ही पड़ेगा | देवी जी को और भी तो बहुत कार्य रहता होगा | लिहाजा जैसे मंत्री या नेता के पर्सनल असिस्टेंट आधी समस्यायों को मंत्री तक पहुँचने ही नहीं देते | वैसे ही अविराम शास्त्री चयन करता है कि कौन से पत्र देवी जी के लिए रजिस्टर में चढाने हैं या फिर कौन से नहीं |
विश्वास तो उसे उन पत्रों पर भी नहीं होता , जिसे उसने रजिस्टर पर चढ़ाया है कि देवी जी कुछ करेंगी | लेकिन बाबा का आदेश है कि पत्रों को रजिस्टर में चढ़ा कर कुण्ड की ओर प्रवाहित कर दो | तो पालन करना ही है | बाबा यानी बड़े पुजारी जी | पुजारी जी को देवी माँ पर अटूट विश्वास है | उनके सपने में प्राय: देवी जी आती हैं | सरल हृदय के पुजारी जी किसी को भी निराश नहीं करते | वे जितनी देर तक मन्दिर में रहते हैं | भक्तों से कहते रहते हैं , “निराश मत होना , माता जी सबका भला करेंगी | बहुत कष्ट है तो देवी माँ को लिख कर दे दो , समय आने पर माता सब कार्य पूर्ण करती हैं |”
किन्तु अविराम शास्त्री जबसे यहाँ आया है | उसके भीतर अभी तक पूर्ण विश्वास नहीं जगा | उसका जीवन एक बहुरुपिया सा हो गया है | वह सुबह चार बजे उठकर दैनिक क्रिया से निवृत हो , नहा धोकर मन्दिर पहुँच जाता है और अपने कार्यों में जुट जाता है | जैसे कल के चढ़े हुए पुष्पों को हटाना | चढ़ावे में आये फल मिष्ठान को एक किनारे रखना | माँ की मूर्ति के आसपास सफाई करना | पानी का पाइप लेकर मन्दिर प्रांगण की सफाई करना | यहाँ तक कि माँ का श्रृंगार आदि सूर्योदय तक पूर्ण कर देना | फिर तालाब के एक ओर बने बड़े हाल में जाकर कुछ कसरत योगासन आदि करना |
तब तक बाहर सफाई वाला भी आकर झाड़ू लगा जाता है | इस बीच पूर्व की ओर से सुबह-सुबह जब सूर्य की किरणें मन्दिर का निरीक्षण करने पहुँचती हैं तो उन्हें पूरा का पूरा मन्दिर प्रांगण चमकता हुआ दिखाई पड़ता है | फिर तो वे भास्कर की सुनहरी रश्मियाँ भी माँ के चरणों को स्पर्श कर अपनी दिन चर्या में लग जाती हैं | इधर साढ़े छह बजते-बजते अविराम के बाबा जी नहा धोकर मन्दिर में प्रवेश करते हैं | तब तक भक्तों का आगमन भी प्रारम्भ हो जाता है | फिर शुरू होती है सुबह सात बजे की आरती और मन्दिर से अविराम शास्त्री का कार्य समाप्त |
घर आकर वह फल आदि के साथ जलपान ग्रहण करता है | फिर एक घंटे विश्राम | नौ बजे पैंट – शर्ट पहन कर कालेज जाना | तीन बजे तक वापस आकर भोजन और आराम | पांच बजे भगवा रंग की धोती – कुर्ता , कन्धे पर गमछा | जिस दिन सफ़ेद धोती पहनता है उस दिन पीले कुर्ते के साथ सफ़ेद गमछा | माथे पर लम्बा सा तिलक | एक बड़े मन्दिर के पुजारी की वेशभूषा में तैयार होता है | यों भी गजब का आकर्षक चेहरा लगता है उसका | शरीर का गठन भी बहुत अच्छा है | प्रथम दृष्टया तो कोई भी सम्मोहित हो जाय | दिन में एक से तीन मन्दिर बंद रहता है | तीन बजे बड़े पुजारी जी फिर वापस आ जाते हैं | पांच बजे अविराम शास्त्री सज धज कर मन्दिर पहुंचता है और बड़े पुजारी जी को अवकाश देता है | जो अब सात बजे सायं काल की आरती के ठीक पहले वापस आयेंगे | तब-तक माँ के भक्तों को प्रसाद देना , चढ़ावा लेना पं अविराम शास्त्री की जिम्मेदारी होती है |
आरती से पहले शाम साढ़े छह बजे बड़े पुजारी जी के वापस आते ही वह तेजी से भागता है | घर पहुंचकर जल्दी – जल्दी ऐसे कपड़े उतारता है जैसे नाट्य मंच के पीछे नेपथ्य में कलाकार अपने वस्त्रों को परिवर्तित करते हैं और किरदार के अनुसार दूसरा वस्त्र धारण करते हैं | वैसे ही वह धोती – कुर्ता उतार कर एक किनारे रखता है | बाहर जाकर हाथ – मुंह धुलता है | जींस – टी शर्ट पहनता है और मोटर साईकिल से पहुच जाता है कम्प्यूटर की कोचिंग में | नौ बजे तक लौटना | रात्रि भोजन , कुछ देर पाठ्यक्रम की पुस्तकें पढ़ना | कालेज में पढाये गये विषयों का अध्ययन करना और ग्यारह बजे तक सो जाना | क्योंकि उसे फिर सुबह चार बजे उठकर अपनी दिन चर्या में लगना होता है |
विगत दो वर्षों से यही दिनचर्या है उसकी | दरअसल अविराम शास्त्री एक छोटे से शहर जौनपुर का निवासी है | उसके पिता डा रमा शंकर शास्त्री एक डिग्री कालेज में संस्कृत के प्रोफेसर हैं | अविराम का एक भाई और है , साथ में दो बहन भी | वे सभी जौनपुर में ही माता-पिता के साथ रहते हैं | बारहवीं पास करने के बाद अविराम ने मेडिकल क्षेत्र में जाने के लिए परीक्षा दी | किन्तु असफल होने पर उसे बाबा ने अपने पास बुला लिया | यह एक बड़ा शहर है | यहीं से वह आगे की पढाई व मेडिकल लाइन की तैयारी भी कर रहा है | लेकिन बाबा के साथ है और वे मन्दिर के पुजारी हैं तो उसे बाबा का सहयोग तो करना ही पड़ेगा | बाबा भी उसे मन्दिर में न लगाते | लेकिन अविराम को मन्दिर का कार्य देना उनकी मज़बूरी थी |
घटना बहुत पुरानी है | अविराम के बाबा गाँव से पुरी दर्शन को गये थे | वापस आते समय इस शहर में अपने गाँव के एक परिचित से मिलने के लिए रुक गये | शाम को इसी मन्दिर में भगवती जागरण था | अविराम के बाबा भी पहुँच गये | वे बहुत अच्छा कीर्तन गाते थे | लिहाजा उस जागरण में उन्होंने भी देवी जागरण के गीत गाये | इस बहाने मन्दिर के पुजारी से उनकी जान पहचान बढ़ गई | धीरे – धीरे पता चला वहां के पुजारी तो फ़ैजाबाद में उनकी बुआ के गाँव के हैं | बस अब अविराम के बाबा ने यहाँ रहने का मन बना लिया | गाँव में भी वे पूजा-पाठ ही करते थे | अब वे इस मन्दिर में पुजारी जी के साथ रहने लगे | पुजारी जी को भी आराम हो गया कि कोई अपना परिचित साथ रहने लगा |
दो तीन महीने में वे जब पुरी से घर नहीं पहुंचे तो लोगों को चिंता हुई | उस समय मोबाईल फोन का जमाना तो था नहीं | फिर कई महीनों बाद एक चिट्ठी से घर तक खबर पहुंची कि अब वे घर नहीं जायेंगे और यहीं मन्दिर में रहेंगे | मन्दिर में रहते हुए वे घर में मनी आर्डर भी भेजने लगे | लड़का संस्कृत से परास्नातक व पीएचडी करके एक कालेज में पढ़ाने लगा | साल में एकाध बार वे अपने गाँव भी जाते थे | लड़का नौकरी करने लगा तो उसकी शादी कर दी | फिर इसी बीच पंडित जी की धर्मपत्नी अर्थात अविराम की दादी भी यहाँ आ गई | और इधर फ़ैजाबाद वाले पुजारी भी नहीं रहे तो ये ही यहाँ के मुख्य पुजारी हो गये |
अब तो यहाँ रहते तीस साल से अधिक हो गया | इनके सहायक में दो तीन पंडित भी आये लेकिन वे अधिक दिन नहीं टिके | पंडित जी को अपने विरासत की चिंता भी होने लगी थी | इधर जब से मोबाईल फोन का जमाना आया तो आये दिन पंडित जी की घर पर बातें होने लगीं | इन्हीं बातों में उन्होंने अपने बड़े बेटे से अविराम को यहाँ रहने की बात कह दी और अविराम यहाँ आ गया | जल्द ही बाबा ने उसे मन्दिर के नियम व दिनचर्या को समझा दिया | जिसे अविराम बखूबी निभाता है | दो वर्ष हो गये अब उसे मन्दिर के कार्यों में मजा भी आने लगा | मन्दिर में आने वाली कीर्तन मंडली के साथ वह हारमोनियम और ढोलक भी बजाना सीख गया था | गले में तो जैसे आवाज का जादू भरा हो | नवरात्रि में गजब का कीर्तन गाता है | एक डायरी में उसने जाने कितने भक्ति गीत लिख रखे हैं |
परन्तु विज्ञान का छात्र अविराम अवसर मिलने पर तमाम रूढ़ियों व अन्धविश्वास के विपक्ष में प्राय: खड़ा दिखाई देता है | मन्दिर ही नहीं उसे अन्य धर्मों के भी तमाम देवालय व तीर्थ के पण्डे , पुजारी , मौलाना व पादरी सबके चेहरे एक जैसे लगते हैं | सब याचक की विवशता का लाभ उठाते हैं | धर्म का भय दिखाकर अपना धंधा चलाते हैं | बलि प्रथा का तो अविराम प्रबल विरोधी है |
ऐसे ही बहुत सी प्राचीन मान्यताओं , लोककथाओं को भी वह नहीं मानता | यही कारण है पत्र को पढ़कर रजिस्टर में चढ़ाना उसे बिलकुल पसंद न था | न ही उसका सपना ही मन्दिर का स्थाई पुजारी बनने का है | उसे तो डाक्टर बनना है | लेकिन बाबा के साथ रहने का तात्पर्य है | मन्दिर के साथ जुड़ना | मन्दिर से जुड़े सारे कार्यों के साथ वह प्रत्येक शनिवार को पत्र पेटिका खोलता है और पत्रों को पढ़ता है | जो समझ में आया उसे रजिस्टर में चढ़ा भी देता है | और फिर पत्रों को फाड़ कर तालाब में फेक देता है | शनिवार को उसे कम्प्यूटर की क्लास में नहीं जाना होता है | इसलिए शाम को पर्याप्त समय रहता है |
पिछले सप्ताह सोमवार को एक आदमी अपनी पत्नी के साथ आया और अविराम शास्त्री से बोला , “ महराज ये पांच किलो लड्डू माँ के दरबार में चढ़ाकर सबको बाँट दीजिये | बड़ी कृपा है देवी माँ की | मेरी चिट्ठी को माँ ने पढ़ लिया | मैं कई साल से परेशान था | तीन ही महीने में मेरे बेटे की नौकरी भी लग गई और बिटिया की शादी भी तय हो गई | उसकी ख़ुशी देखकर अविराम ने जजमान से नाम पूछा और प्रसाद चढ़ा दिया | उन लोगों के जाने बाद उसने धीरे से रजिस्टर खोला | सचमुच उस आदमी का नाम तीन महीने पहले रजिस्टर में चढ़ा था | इस तरह का जब कोई भक्त देवी माँ के दर्शन को आता और कहता कि माँ ने मेरी चिट्ठी पढ़ ली है | तो उस दिन अविराम को अचानक देवी माँ के प्रति एक अजीब सा विश्वास जागृत हो जाता | और उस दिन अविराम तय करता कि अब वह भी एक चिट्ठी लिखेगा , अपने डाक्टर बनने के लिए | लेकिन फिर ऐसे ही रह जाता |
धीरे – धीरे काफी समय हो गया | कई घटनाएँ मन्दिर में घटती रहीं रहीं किन्तु पं अविराम शास्त्री ने अपने विषय में देवी जी को कभी कोई चिट्ठी नहीं लिखी | किन्तु आज रात अविराम ने देवी जी को चिट्ठी लिखी | हे देवी माँ आपके कमलवत चरणों में बारम्बार वंदन है | माँ मेरी चिठ्ठी को भी एक बार अवश्य पढ़ना | मैं एक डाक्टर बनकर लोगों की सेवा करना चाहता हूँ | पत्र में और भी अनुनय विनय करते हुए उसने एक लम्बा सा पत्र लिखकर कुर्ते की जेब में डाल दिया | यह तय कर कि कल सुबह जब मन्दिर जाएगा तो इस पत्र को रजिस्टर में नोट करके कुण्ड में प्रवाहित कर देगा | सुबह वह पत्र ले जाना भूल गया | तीन बजे गया तो पत्र लेकर गया | उस दिन अमावस्या की तिथि और सोमवार का दिन होने के कारण भक्तों की काफी भीड़ थी | बाबा के हटते ही वह भक्तों को प्रसाद देने , माथे पर तिलक लगाने और चढ़ावा लेने में व्यस्त हो गया |
पांच बजे के लगभग जब भीड़ कम हुई तो मन्दिर के निकट किसी आदमी के सुबकने की आवाज उसके कानों में पड़ी | वह मन्दिर से बाहर आया तो सचमुच एक आदमी मन्दिर की दीवार के सहारे बैठा सुबक रहा था | चेहरे को दोनों हाथों से छिपा कर बैठा था | अविराम उसके सामने धीरे से बैठ गया | कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा , “क्या हो गया भाई ?” आवाज सुनकर वह आदमी तेजी से रोने लगा | कुछ पल अविराम उसे आश्चर्य चकित सा देखता रहा |
फिर पूछा , “ क्या हो गया भाई ? रो क्यों रहे हो ?”
उसने कहा , “ लगता है माई ने हमारी चिट्ठी नहीं पढ़ी |”
“ पढ़ेंगी …. अवश्य पढ़ेंगी | माँ के घर देर है मगर अंधेर नहीं है | देखना तुम्हारी भी चिट्ठी माँ पढ़ेंगी |”
“ अब कब पढ़ेंगी ? अब तो मैं अनाथ हो गया |”
“ अरे ! इतना निराश मत हो भाई , माँ के रहते कोई अनाथ नहीं हो सकता |”
“ सात दिन पहले मेरे पिता जी का स्वर्गवास हो गया | हर अमावस्या को देवी माँ से बोलता था | नहीं सुना देवी जी ने | दो बार चिट्ठी भी लिखी थी |”
“ आपका क्या नाम है ? क्या हुआ था पिता जी को ?” अविराम ने जानना चाहा |
“ मेरा नाम धनाराम है | मेरे पिता जी दारु बहुत पीते थे | किडनी ख़राब हो गयी थी उनकी | बहुत दवा किया | कुछ लाभ नहीं हुआ | माँ को चिट्ठी भी लिखी | लगता है माई ने मेरी चिट्ठी नहीं पढ़ी | पंडित जी मैं तो अनाथ हो गया |” वह फिर रोने लगा |
देखो धनाराम यही तो जीवन है | किसी को मृत्यु के बारे में कुछ ज्ञात नहीं है | इस नश्वर संसार में किसी न किसी दिन सबकी मृत्यु होनी है | इसका तो नाम ही मृत्युलोक है | वह मन्दिर के अन्य पुजारियों की तरह उपदेश देने लगा | फिर कहा , “चलो उठो | हाथ मुंह धुलकर माँ का प्रसाद लो | तुम्हारा और पिता जी का साथ इतने ही दिन का था |” बहुत समझा बुझाकर पं अविराम शास्त्री ने उसे चुप कराया | प्रसाद खिलाया और घर भेज दिया |
धनाराम के जाते ही पं अविराम ने आलमारी से पहले वह रजिस्टर निकाला | एक तरफ से कई महीनों का विवरण चेक कर लिया | धनाराम का नाम तो कहीं था ही नहीं | फिर कैसे धनाराम कह रहा था | माँ को चिट्ठी लिखी थी | अब वह सोचने लगा कहीं उसने यों ही तो फाड़ कर नहीं फेंक दी उसकी चिट्ठी | अविराम को नाम तो नहीं याद आ रहा है | लेकिन यह याद आ रहा था कि कुछ माह पूर्व एक शराबी के विषय में माँ के नाम चिट्ठी तो आई थी | जिसे उसने यह कह कर फाड़ दिया था कि बाप दारू पीता है तो इसमें देवी माँ क्या करें , अपने बाप को समझाओ |
धनाराम को गये बहुत देर हो चुकी थी | शाम होते ही अविराम के बाबा भी आ गये थे | आरती का समय हो गया था | लेकिन आज अविराम का मन नहीं लग रहा था | वह घर आ गया किन्तु कम्प्यूटर कोचिंग में नहीं गया | पता नहीं क्यों आज वह जैसे एक अपराधबोध के तले दबा जा रहा था | उसे लगा यदि उसने धनाराम की चिट्ठी रजिस्टर में चढ़ाई होती तो दिखा देता | देखो तुम्हारी भी चिट्ठी माँ के समक्ष प्रस्तुत की गई थी | फिर सोचता है चिट्ठी दर्ज हो जाने पर हो सकता है माँ सुन ही लेती | जैसे बहुत लोग आकर बोलते हैं माँ ने मेरी चिट्ठी पढ़ ली |
उस रात उसे बहुत देर तक नींद नहीं आई | इसी उहापोह में जागता रहा कि क्या सचमुच देवी माँ रजिस्टर में लिखे पत्रों को पढ़तीं हैं ? लेकिन ऐसे कैसे हो सकता है ? नहीं – नहीं ये सब महज संयोग ही है | उसे नीद नहीं आ रही थी | फिर अचानक उठा | देवी माँ के नाम लिखी चिट्ठी को कुर्ते की जेब से निकाला | सावधानी पूर्वक धीरे – धीरे पढ़ा | वह बहुत सतर्कता से निरीक्षण कर रहा था कि माँ के नाम लिखी चिट्ठी में कहीं कोई त्रुटि तो नहीं है | दो बार पूरा पत्र पढ़कर अचानक फाड़ दिया | जैसे वह अनावश्यक समझे जाने वाले चिट्ठियों को फाड़ता है | साथ में बोलता है , डाक्टर तो मैं बन कर दिखा दूंगा |