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लघु कथा
Home›साहित्य›लघु कथा›मुआवजा

मुआवजा

By डॉ.शैल चन्द्रा
February 5, 2018
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मुआवजा

उस गांव में सड़क चौड़ीकरण का कार्य तेजी से चल रहा था।फोर लेन सड़क के लिए नाप-जोख किया जा रहा था।नाप-जोख के मानक पर घर-दुकान या पेड़ जो भी आता उसे सरकारी कर्मचारी जेसीबी मशीन से तोड़ने में जुट जाते।
सड़क किनारे रहने वाले लोगों को सरकारी नोटिस दिया जा चुका था कि वे कहीं और अपना आशियाना ढूंढ लें। सारे लोग हैरान – परेशान और बेहद दुःखी थे।उनके सपनों का घर उनकी आँखों के सामने ही तोडा जा रहा था।कई लोग दिसम्बर की कड़कड़ाती ठंड में घर से बेघर होकर सड़क किनारे ही अपना गुजर -बसर करने के लिए मजबूर थे।
ऐसे में वृद्धा पार्वती अपना घर छोड़ने को बिल्कुल भी तैयार नहीं थी।सरकारी कर्मचारी उसे समझा-समझा कर थक चुके थे।
एक कर्मचारी कह रहा था-“माता जी, आप के चाहने न चाहने से कुछ नहीं हो सकता।सरकारी फरमान है।घर तो तोड़ना ही पड़ेगा।फिर आपको सरकारी मुआवजा आपके घर के मूल्य से दुगना मिल रहा है। इससे कहीं और दूसरा घर लेकर आप सुखपूर्वक रह सकतीं हैं।”
उस सरकारी कर्मचारी की बात सुनकर रोती हुई पार्वती ने कहा,”जानते हो बेटा, इस घर में दुल्हन बनकर मैंने अपने पति के साथ कितने दुःख-सुख के पल व्यतीत किये हैं।अपने प्यारे बच्चों का बचपन देखा है ।ये मेरा बगीचा देख रहे हो न?ये आम,अमरुद,केला,कटहल और जामुन के पेड़ ये मेरे एकाकी जीवन के सुख-दुःख के साथी हैं और मेरे जीवकोपार्जन के साधन भी हैं। इस घर में मेरे पति ने अंतिम साँसे ली थीं।समझ लो यह घर नहीं मेरा ह्रदय है जिसे तुम लोग तोड़ना चाहते हो।यह घर मेरे अतीत का स्मारक है। मेरे जीवन के अमूल्य क्षणों का धरोहर है। क्या तुम्हारी सरकार इस घर से जुड़े उन सभी एहसासों का भी मुआवजा दे सकती है ?”
यह कहती हुई वह वृद्धा और भी सिसक-सिसक कर रोने लगी।

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