मुख़ालिफ़त के अँधेरे से लौट आ वापस

मुख़ालिफ़त के अँधेरे से लौट आ वापस
निज़ाम के बुने घेरे से लौट आ वापस
जदीद राहों पे चलने का वक़्त आ गया अब
पुरानी सोच के फेरे से लौट आ वापस
तेरा वजूद खुले आसमानों में ही है
परिन्दे रैन-बसेरे से लौट आ वापस
जहाँ की रौशनी में तीरगी के साए हों
तू ऐसे दिन के सवेरे से लौट आ वापस
वजूद-ए-दरिया बचाना है तेरा मक़सद इन
किनारों के ‘तेरे-मेरे’ से लौट आ वापस
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