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Home›साहित्य›लेख›ललित निबंध›स्वतंत्रता प्राप्ति में महिलाओं का योगदान -रानी अवंतीबाई जी

स्वतंत्रता प्राप्ति में महिलाओं का योगदान -रानी अवंतीबाई जी

By लाडो कटारिया
December 3, 2022
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रानी अवंतीबाई

रानी अवंतीबाई भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली वीरांगना थीं। 1857 की क्रांति में रामगढ़ की रानी अवंतीबाई रेवांचल में मुक्ति आंदोलन की सूत्रधार थी। 1857 के मुक्ति आंदोलन में इस राज्य की अहम भूमिका थी, जिससे इतिहास जगत अनभिज्ञ है।

1817 से 1851 तक रामगढ़ राज्य के शासक लक्ष्मण सिंह थे।उनके निधन के बाद राजकुमार विक्रमादित्य सिंह ने राजगद्दी संभाली। उनका विवाह बाल्यावस्था में ही मनकेहणी के जमींदार राव जुझार सिंह की कन्या अवंती बाई से हुआ। विक्रमादित्य सिंह बचपन से ही वीतरागी प्रवृत्ति के थे और पूजा-पाठ एवं धार्मिक अनुष्ठानों में लगे रहते। अत: राज्य संचालन का काम उनकी पत्नी रानी अवंतीबाई ही करती रहीं। उनके दो पुत्र हुए-अमान सिंह और शेर सिंह।

अंग्रेजों ने तब तक भारत के अनेक भागों में अपने पैर जमा लिए थे।अंग्रेजों ने इनके पति को मानसिक रूप से बीमार और बच्चों को नाबालिग बताकर इनका राज्य हड़पना चाहा।रानी ने राज्य के आस-पास के राजाओं, परगनादारों, जमींदारों और बड़े मालगुजारों का विशाल सम्मेलन रामगढ़ में आयोजित किया, जिसकी अध्यक्षता गढ़ पुरवा के राजा शंकरशाह ने की।

इस गुप्त सम्मेलन के बारे में जबलपुर के कमिश्नर मेजर इस्काइन और मण्डला के डिप्टी कमिश्नर वाडिंग्टन को भी पता नहीं था। गुप्त सम्मेलन में लिए गए निर्णय के अनुसार प्रचार का दायित्व रानी पर था। एक पत्र और दो काली चूड़ियों की एक पुड़िया बनाकर प्रसाद के रूप में वितरित करना। पत्र में लिखा गया- “अंग्रेजों से संघर्ष के लिए तैयार रहो या चूड़ियां पहनकर घर में बैठो।” पत्र सौहार्द और एकजुटता का प्रतीक था तो चूड़ियां पुरुषार्थ जागृत करने का सशक्त माध्यम बनी। पुड़िया लेने का अर्थ था अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति में अपना समर्थन देना।

मार्च 1858 में निर्णायक लड़ाई हुई ।रामगढ का किला अंग्रेजों ने तहस नहस कर दिया। रानी को वहां से निकलना पड़ा ।रानी युद्ध में बुरी तरह घायल हो गई थी और सैनिकों की संख्या भी बहुत कम रह गई थी। 20 मार्च 1858 को अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए घुनसी नाले के निकट खुद ही कटार घोंप कर रानी ने आत्मबलिदान कर दिया । हम रानी अवंतीबाई को कोटि कोटि नमन करते हैं| आज अवंनतीबाई जैसी वीरांगनाओं की बहुत जरुरत है| अवंनतीबाई के शौर्य, स्वतंत्रता में योगदान, देश प्रेम और राष्ट्रभक्ति को सलाम|

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