लता ललित बहु भांति सुहाई
जब हम किसी के बचाव , रक्षा व संरक्षण के पक्ष में वार्ता करते हैं | उसके बचाव हेतु संकल्प लेते हैं | तो चाहे वह जल हो , वायु हो या फिर सम्पूर्ण पर्यावरण , जो भी हमारे जीवन से सम्बन्धित महत्वपूर्ण घटक हैं | तत्काल ही मन में एक प्रश्न उभरता है कि हम उसकी रक्षा क्यों करें ? क्या महत्व है उस अमुक विशेष का हमारे जीवन में ? और क्यों इतना आवश्यक है उसकी रक्षा करना ? फिर हम विश्लेषण करने लगते हैं | बहस जारी करते हैं उसके महत्व एवं उपयोगिता के सन्दर्भ में |
इस लाभ हानि के विश्लेषण के मद्देनजर आज हम पर्यावरण सम्बन्धित कुछ मुद्दों पर आपसे एक आलेख के माध्यम से विचार साझा करना चाहते हैं | दरअसल ये जो आधुनिकता के नाम पर , सभ्यता के विकास की बात पर पर्यावरण की अवमानना करना हमारी आदत बन गयी है | इसके कारण भविष्य की स्थिति बहुत भयावह होने वाली है | हम सब अपने भौतिक सुख व उपभोग में इतना लिप्त हो गये हैं कि जाने – अनजाने अगली पीढ़ी के लिए बहुत बड़ा गड्ढा खोद रहे हैं |
हम सब अपनी सुख सुविधा हेतु प्रकृति का भरपूर दोहन कर रहें हैं | और किसी न किसी रूप में प्रकृति को असंतुलित कर रहे हैं | जंगल कम होते जा रहे हैं | प्रत्येक वर्ष जल स्तर नीचे गिरता जा रहा है | तमाम उद्योगों से उगलते जहरीले धुंए वायु को प्रदूषित कर रहे हैं | पृथ्वी के नीचे दबे खनिज से लाभ लेने के कुचक्र में धरा को हम खोखला कर रहे हैं | पहाड़ तक अपनी ऊंचाईयों को खो रहे हैं | और हम कहते हैं कि हमने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली है |
दरअसल मनुष्य की यह सोच कि हमने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली है | यही बहुत बड़ी भूल है | प्रकृति विजय का स्वप्न देखते- देखते मनुष्य यह भूल गया है कि वह प्रकृति पुत्र है | ये प्रकृतिे – ये पृथ्वी हमारी माँ है | जिसकी रक्षा करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है | माँ पर विजय प्राप्त करने की मूर्खता करना , अपने ही पांव में कुल्हाड़ी मारना है | प्रत्येक मनुष्य प्रकृति का एक प्रभावशाली घटक है | पर्यावरण से परे उसका कोई अस्तित्व नही है | इसलिए अपने नैतिक , सामाजिक एवं आर्थिक विकास की चरम सीमा पर मनुष्य तभी पहुंचेगा , जब वह अपनी प्राकृतिक सम्पदाओं को उचित रूप से उपयोग करते हुए जैविक व भौतिक तत्वों का संतुलन बनाये रखेगा ।
वर्तमान परिवेश में असल मुद्दा यह है कि पर्यावरण को हम किस रूप में स्वीकारते हैं और अपने स्वार्थ हेतु उसे कितना नष्ट करते हैं | और फिर बहस का विषय यह भी है कि इस पर्यावरण या फिर इस सम्पूर्ण प्रकृति को हम नष्ट क्यों कर रहे हैं ? क्यों दूषित कर रहे हैं अपने पर्यावरण को ? एक विचारणीय प्रश्न यह भी है कि क्या ये प्रकृति मानव निर्मित है ? क्या हमने निर्माण किया है इस पृथ्वी के सम्पूर्ण पर्यावरण को ? शायद नहीं | तो फिर जिसे हम बना नहीं सकते , उसे नष्ट करने का अधिकार हमें किसने दिया ? मुद्दा ये है कि आखिर हम पर्यावरण को नष्ट करने पर क्यों तुले हैं ? जबकि उन वृक्षों के मीठे फल , नदियों के स्वच्छ जल , प्रकृति माँ ने अपने बच्चों अर्थात समस्त जीव – जन्तु के लिए ही निर्मित किया है | एक कवि ने बहुत ही सहज ढंग से कहा है कि
वृक्ष कबहुँ नहि फल भखे , नदी न संचै नीर |
परमारथ के कारणे , साधुन धरा शरीर |
परमार्थ हेतु जिस प्रकार साधु जन अपने को समर्पित कर देते हैं , वैसे ही ये प्रकृति है | लेकिन वर्तमान में एक शायर मुस्तफा हुसेन बहुत दुखी मन से लिखते हैं कि –
जो बीज भी न बोये थे कभी अपनी जमीन पर
सुनते हैं वही लोग सजर बेंच रहे हैं
कल सारे आसमान का सौदा न तय करें
दीवाने अभी शम्मो कमर बेच रहे हैं
ये सब आज भौतिकवादी सुख व बाजारवाद का प्रभाव है | मनुष्य अपने सुख हेतु प्रकृति को नष्ट करता चला जा रहा है | यदि अतीत पर निगाह डालें तो हमारे पूर्वज प्रकृति से अत्यंत प्रेम करते थे | विभिन्न तिथियों में अलग – अलग वृक्षों जैसे पीपल , बरगद , नीम , आंवला का पूजन , एकादशी में गन्ने का तो धनतेरस व भईया दूज में कुछ अन्य जड़ी बूटियों का पूजन करने की परम्परा यही दर्शाती है कि हमारे पूर्वज प्रकृति से अपार प्रेम करते थे | वे इस पर्यावरण के प्रति आदिकाल से सचेत रहे हैं | हमारे ऋषि – मुनियों ने तो प्रकृति के गूढ़ रहस्यों को जानने का सदैव गंभीरता से प्रयास किया और वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यह सम्पूर्ण सृष्टि पंच महाभूतों — पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु और आकाश के सामंजस्य से निर्मित है | गोस्वामी तुलसीदास भी रामचरित मानस में लिखते हैं कि क्षिति जल पावक गगन समीरा ,पंच रचित यह अधम शरीरा |
यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने इन्हे देवी – देवताओं के समान स्थान प्रदान किया | उन्होंने अग्नि , जल , वायु व आकाश को जहाँ देवता कहा , वहीं देवी स्वरूपा पृथ्वी को माँ का पद प्रदान किया — माता भूमिः पुत्रोहं पृथिव्या | पहले आदिम से आधुनिक होते हुए भी हमारी जीवन शैली एवं लोकाचार पर्यावरण के साथ सामंजस्य बना कर रखती थी | जिसने इसका वरण किया उसने उसके आवरण को सुरक्षित रखने का भरपूर प्रयत्न भी किया | इस सत्य को देखते हुए कि ये प्रकृति जब तक स्थापित है हमारा भविष्य भी सुरक्षित है | हम अपनी रीति -रिवाज परम्परा और संस्कृति के माध्यम से इसे विरासत के रूप मे़ पीढ़ी दर पीढ़ी को सौंपते रहे | लोगों ने ससम्मान उसका निर्वाह भी किया |
गोस्वामी तुलसीदास जब अयोध्या के प्रकृति का वर्णन करते हैं तो कहते हैं कि
सुमन वाटिका सबहि लगाई । विविध भांति कर जतन बनाई
लता ललित बहु भांति सुहाई । फूलहिं सदा वसंत की नाई
गुंजत मधुकर मुखर मनोहर ,मारुत त्रिविध सदा बह सुंदर
नाना खग बालकहिं जिआए , बोलत मधुर उड़ात सुहाए
लेकिन हम सब अपने स्वार्थ में जल – जंगल – जमीन सबको प्रदूषित करते जा रहे हैं | जबकि इन पंच तत्वों में किसी एक के असन्तुलित होते ही हम अपने को काल के गाल में खड़ा हुआ पाते हैं |
आज की घटना ठीक वैसे ही है जैसे बचपन में सोने के अंडे देने वाली मुर्गी की एक कहानी सबने सुनी थी | जिसमें लालचवश उसका संरक्षक ही मुर्गी को मार डालता है | ठीक वही स्थिति आज भी है जो पर्यावरण हमारे लिए एक सोने का अंडा देने वाली मुर्गी के समान है जिसके हम संरक्षक हैं | उसी की हत्या कर रहे हैं हम सब मिलकर | हरे भरे जंगल को काटकर कंक्रीट के जंगल निर्मित कर रहे हैं |
हम अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बहुत दूर खड़े हैं | विरासत में मिली अपनी ही संस्कृति व संस्कार की अवहेलना कर रहे हैं | आज हमारी नकारात्मक सोच ने पृथ्वी ,जल , वायु , आकाश सबको प्रदूषित कर डाला है | प्रकृति प्रत्येक कोने से कराह रही है , धरती का अतिशय दोहन कर हमने उसके कई भू भाग को बाँझ बना दिया है | नदियों का जल पीने योग्य नही रहा । निरन्तर वृक्षों के कटान से जंगल कम होते जा रहे हैं | प्राणवायु आक्सीजन की प्रतिशतता कम हो रही है | विभिन्न प्रकार की घातक जहरीली गैसों के संचय से वायु मंडल प्रभावित हो रहा है , ग्लोबल वार्मिग से हिमनद पिघल रहे हैं | पर्यावरण के असंतुलन का प्रभाव ये है कि प्रति वर्ष वर्षा कम हो रही है और तापमान बढ़ता जा रहा है । जल स्तर गिरता जा रहा है | लोग बूंद – बूंद पानी और शुद्ध हवा के लिए तरस रहे हैं |
यदि समय रहते हमने प्रकृति के प्रति अपनी अवधारणा परिवर्तित नही की , तो देखना स्थिति बहुत भयावह होगी | शुद्ध जल के अभाव में जहाँ लोग डायरिया , कालरा जैसी जान लेवा बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं | बहुत से लोग शुद्ध वायु के अभाव में फेफड़े व त्वचा सम्बंधित रोगों के गिरफ्त होगें | ध्वनि प्रदूषण से मनुष्य तनावग्रस्त , अधीर , अशांत , उत्तेजित होने के साथ अंत में बहरा हो जायेगा | आने वाले समय में यह भी सच होगा कि आज जैसे शुद्ध पानी की बोतलें बिकती हैं | ऐसे ही शुद्ध हवा की बोतलें भी बाजार में बिकेगी | लोग तरस जायेंगे शुद्ध वायु हेतु |
निश्चय ही इस सम्पूर्ण पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए हम सब को अधिक से अधिक वृक्ष लगाने होंगे | तालाबों में वर्षा का जल एकत्र करना होगा | सीधे शब्दों में कहें तो पर्यावरण का संतुलन तभी संभव है जब हम उसकी प्राकृतिक संरचना को मूल रूप में लाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ होंगे । और तभी अपने आगामी पीढ़ी को एक स्वच्छ , सुन्दर वातावरण विरासत के रूप में हस्तांतरित कर सकेंगे | जिससे प्रकृति वर्णन करते हुए कवि पुन: लिखे कि –
लता ललित बहु भांति सुहाई । फूलहिं सदा वसंत की नाई