विरोधाभास

विज्ञान के
निरन्तर बढ़ते कदम
नित नये तकनीकों की
खोज व प्रयोग
सूचना तंत्र का
घना होता अंतरजाल
सब कुछ समेट रहा है दुनिया को
दिखने लगे हैं छोटे
वे दूर के तारे
सूर्य- चन्द्र व मंगल
आकाश गंगा ही नहीं
सम्पूर्ण ब्रह्मांड को भी
कैद कर रहा है मानव
अपनी मुट्ठी में
नित नये उपलब्ध
यातायात के साधन से
कम हो रही हैं दूरियां
समय के अनुपात में
मोबाइल फोन से
पल पल स्थानान्तरित होते संवाद
छोटी होती दिख रही है ये धरती
सिमटती जा रही है दुनिया
और साथ-साथ ……
एक जटिल आश्चर्य
सिमटने की इस
प्रक्रिया के मध्य
वे भी सिमट रहे हैं
जिनका होना चाहिए विस्तार
इस प्रगतिवादी दौर में
सिमट रहे हैं आपसी रिश्ते
सिमट रहा है प्यार
सिमट रहे हैं संस्कार
सिमट रहा है व्यवहार
है अजीब सा विरोधाभास
जितनी ही सिमट रही है
ये दुनिया ….. ये धरती
उतना ही दूर हो रहा है
आदमी से आदमी













