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Home›समीक्षा›समाज के अतीत व वर्तमान को उजागर करती हैं ये कहानियां -अँधेरे के बीच

समाज के अतीत व वर्तमान को उजागर करती हैं ये कहानियां -अँधेरे के बीच

By श्याम नारायण श्रीवास्तव
April 12, 2020
175
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‘अँधेरे के बीच’ जनपद सुल्तानपुर के कहानीकार दिनेश प्रताप सिंह ‘चित्रेश’ की चर्चित कहानियों का एक संग्रह है | जिसमें कुल 14  कहानियां संग्रहीत हैं | संग्रह की कई कहानियां विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं | इसलिए संग्रह के प्राप्त होने के पूर्व ही कुछ कहानियों को पढ़ने का अवसर मिला था | जैसे संग्रह की प्रथम कहानी बच्चा या फिर किस्सों वाली काकी , सपना , ओवरकोट , मूल्यांकन , वारदात , श्मशान ज्ञान आदि | फिर भी कहानी संग्रह ‘अँधेरे के बीच’ को पुन: पढ़ा | संग्रह की सभी कहानियां समय और समाज के यथार्थ को उजागर करतीं हैं | प्रत्येक कहानी में सम्पूर्ण पठनीयता है | यही कारण है कि कहानी के घटनाक्रम को जानने की जिज्ञासा अंत तक बनी रही रहती है |

चित्रेश जी ग्रामीण अंचल से जुड़े हुए रचनाकार हैं | शायद इसीलिए देशज भाषा का उन्हें बखूबी ज्ञान है और उनके पास आंचलिक शब्दों का अपार भंडार है | आज विज्ञान युग में गाँव या नगर दोनों ही क्षेत्रों में व्यापक पैमाने पर परिवर्तन हो रहा है | कृषि के अत्याधुनिक संयंत्रों ने सदियों से चले आ रहे हल बैल को गाँव से गायब कर दिया | आज ट्रैक्टर ने सब अपने हाथों में लिया | बैल हटे तो हरवाही खत्म हुई और फिर उससे जुड़े कितने औजार भी अपना अस्तित्व खो बैठे | जब औजार नहीं रहे तो उसकी उपयोगिता भी नहीं रही | ऐसे में भला वर्तमान पीढ़ी उनके नाम कहाँ से जान पायेगी | किन्तु ऐसे ही समय में एक रचनाकार  प्रचलन से दूर होते जा रहे हैं शब्दों को अपनी रचनाओं में यथा संभव प्रयोग करके उसे भावी पीढ़ी हेतु सुरक्षित कर देता है | निश्चय ही ये दायित्व कहानीकार चित्रेश ने वखूबी निभाया है |

जैसे ‘बच्चा’ कहानी का एक उदाहरण देखें | “देने वाले की मर्जी नहीं हो रही थी तो मैं कहाँ से लाता बच्चा , जिसके आने की ख़ुशी में शालिनी अपनी सखियों को बुलाकर सोहर गवा सकती | माँ उसे दुलारती , तेल बुकवा करके आँखों में काजल और माथे पर डिठौना लगाकर गोतिनों के बीच पंच बराबर की हैसियत से बैठ सकती |” इस एक बड़े से वाक्य में गाँव के आंचलिक शब्द ही नहीं बल्कि बच्चे के जन्म के पश्चात् होने वाली कई परम्पराओं का भी वर्णन मिल जाता है | इसी में जब उसकी पत्नी बच्चे की लालसा में किसी साधू फकीर का दिया हुआ गंडा तावीज कपड़े की पोटली बनाकर गले में पहन लेती है तो कहानी का नायक बोल पड़ता है , “यार ये क्या दुनिया भर का चीकट लटका रखा है |” चित्रेश द्वारा कहानी में प्रयोग किये गये बुकवा , डिठौना , चीकट , जंचगी ,सोंठउरा , सोहर आदि शब्दों की अपनी एक पूरी परिभाषा है जो हमारी लोक परंपरा व संस्कृति को आगे बढाने में सहायक है |

दुखद है कि अब जाने कितनी परम्पराएँ , रीति – रिवाज गाँव से लुप्त हो गईं | स्थिति ये है कि आज आदमीं न गाँव का रह गया न ही ठीक से शहर का हो पाया | एकल परिवार व महानगरीय संस्कृति की होड़ में लुप्त होते जा रहे हैं बहुत से महत्वपूर्ण शब्द | लेकिन चित्रेश के व्यक्तिगत शब्दकोश में देशज शब्दों का जो भंडार है उसे अपनी कहानियों के माध्यम से उन्होंने आज तक जीवित रखा है |

इसी तरह एक कहानी है ‘किस्सों वाली काकी’ | गाँव में बच्चों को किस्से कहानी के द्वारा मनोरंजन व सामाजिक ज्ञान दादी – काकी के माध्यम से सदैव मिलता रहा है | रीति रिवाज व हमारी परंपराएँ इन्ही के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी पहचान बनाये रखती हैं | ‘किस्सों वाली काकी’ को उदहारण के तौर पर देखें तो एक वाकया है , “हम जैसे – तैसे एक दो सवाल हल करके पढ़ने का सगुन पूरा करते और चुपचाप काकी के ओसारे में पहुँच जाते | काकी मचिया पर बैठी हुक्की गुड़गुडाती रही होतीं | ….. वे मचिया खिसका के आराम से दीवाल का टेका लगा लेती | हम पुआल का बीड़ा , बोरा , ईट जो भी मिलता उसी पर बैठकर काकी को घेरकर बैठ जाते |” बहुत ही मार्मिक ढंग से वर्णित है | कहानी पढ़ते ही इर्दगिर्द बचपन घूमने लगता है |

लेकिन ये जो कहानी सुनने की ललक थी | वह अब समाप्त हो रही हैं | आज बस्ते के बोझ तले बच्चों को खेलने तक का समय नहीं मिल पाता , दादी के पास बैठकर कहानी सुनना तो दूर की बात है | लेकिन तत्कालीन यथार्थ का अच्छा वर्णन है चित्रेश की कहानियों में | कहानी में प्रयोग हुए ग्रामीण अंचल से अब हुक्का , मचिया तो गायब हो ही गये | जब से मकान पक्की ईट से बनने लगे ओसारा ने भी अपना नाम परिवर्तित करके ‘वरामदा’ रख लिया | मचिया की जगह अब प्लास्टिक के स्टूल व कुर्सी ने ले ली | और सबसे बड़ी खास बात ये कि अब किस्सों वाली काकी भी गांवों नहीं रहीं | अत: ये कहानियां हमारे अतीत के इतिहास के लिए दस्तावेज हैं |

कहानी संग्रह ‘अंधेरे के बीच’ की लगभग सभी कहानियों का परिवेश ग्रामीण अंचल का है | ओवरकोट का नायक विरजू एक गोदाम में चौकीदारी करता है | तो ग्रामीण क्षेत्र का रहने वाला ‘अँधेरे के बीच’ का सतीश एक सीदा सदा आदमी है | जो डीजल को ब्लैक में बेचने पर फंस जाता है | जैसे प्रत्येक गाँव में कुछ सयाने और कुछ धूर्त किस्म के लोग होते हैं वैसे है ‘श्मशान ज्ञान’ का मास्टर हनुमंत है | कहानी में  लिखा है “हनुमंत सिंह की हैसियत अपने गाँव में नारद किस्म के व्यक्ति की थी |” कहानी जारी है , सपना , वारदात , मुहीम जारी है आदि कहानियां रोचक हैं | एक कहानी है ‘उसकी तरक्की’ | बहुत मार्मिक कथा है दसुआ का बाप भीख मांगता था और दसुआ भीख नहीं मांगता | दसुआ कहता है ,” बाबू आपसे क्या छिपाना ? बाप दस दुआरी था | भीख मांगते हुए उसने सारी जिन्दगी गुजार दी | लेकिन बाबू मैंने किसी आगे हाथ नहीं फैलाया … हमारे ये बन्दर – बंदरिया मेरे लिए हाथ फैलाते हैं | मेरे जैसे बनजारे के लिए यही क्या कम तरक्की है |” कहानी ‘शिवेन्दर मास्टर’ में होली जैसे पावन पर्व का बहुत जीवन्तता के वर्णन के साथ किया गया है |

हमारा देश प्रजातांत्रिक देश है | अतीत से वर्तमान की राजनीति में बहुत बदलाव आया है राजनेताओं के छल प्रपंच से आम जनता प्राय: ठगी जाती रही है | कथाकार ने एक घटना का बहुत वारीकी से अध्ययन किया है | जिसका परिणाम है संग्रह की सबसे लम्बी कहानी ‘पोस्टर’ | जो एक साधारण नागरिक की  राजनीति में उसके हैसियत को विस्तार से पर्दाफास करती है | संग्रह की कई कहानियां समाज में व्याप्त विसंगति को उजागर करती हैं | कहानीकार चित्रेश निश्चय ही बधाई के पात्र हैं | ढेर सारी शुभकामनायें |

समीक्षक – श्याम नारायण श्रीवास्तव

समीक्षित पुस्तक – अँधेरे के बीच ( कहानी संग्रह )

कथाकार – दिनेश प्रताप सिंह ‘चित्रेश’

प्रकाशक – अंजुमन प्रकाशन इलाहाबाद

मूल्य – 150 रूपये

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