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Home›समीक्षा›पुस्तक समीक्षा›समाज के हर पहलू को स्पर्श करती हैं ‘काव्य तरंग’ संग्रह की कवितायेँ

समाज के हर पहलू को स्पर्श करती हैं ‘काव्य तरंग’ संग्रह की कवितायेँ

By श्याम नारायण श्रीवास्तव
April 12, 2020
247
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यह सुखद है कि रायगढ़ में बहुत से युवा साहित्य के प्रति समर्पित हैं | वे नियमित साहित्य का अध्ययन करते हुए सुधी पाठकों के समक्ष अच्छी- अच्छी रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं | विभिन्न विषयों के केन्द्र में रची गई कवि आनन्द सिंघनपुरी की कविता संग्रह ‘काव्य तरंग अनुपम’ पढ़ने को प्राप्त हुई | काव्य संग्रह में सत्तर से अधिक कवितायेँ संकलित हैं |

तेरे बिना अधूरा है मिलना ज्ञान

तेरे नाम अनुकरण से मिटे अज्ञान

मिले प्रसाद बहुत तरनि तपिश से

पाए विद्या तेरे सद्बुद्धि आशीष से

माँ वीणा वादिनी की वन्दना से प्रारम्भ यह संग्रह विभिन्न विषयों को समेटे हुए है | संग्रह में जीवन से सम्बन्धित जीवन राग , जीवन साधना , जीवन संघर्ष , इच्छा रूपी जीवन व वेदना से लड़ता जीवन आदि कवितायेँ हैं तो प्रेम अनुभूति व ख़ुशी की लहर जैसी कविता भी है | संग्रह को पढ़ने से ज्ञात होता है कि कवि को प्रकृति से अगाध प्रेम है | वह जहाँ कहता है ‘जल ही जीवन है ‘ वहीं रंग बिरंगे पक्षियों’ को अपने बगीचे में निवास करने हेतु सादर आमंत्रित भी करता है |

वो रंग विरंगे पंछी

कहाँ उड़े तू सुनसानों में

मेरा दिल कह रहा

आ जाओ मेरे बागानों में

पक्षी उड़ते हैं आसमानों में

हिमांचल शीर्षक की कविता में तो जब कवि प्रकृति का यथार्थ चित्रण करता है तो स्वत: ही हिमाचल का एक दृश्य पाठक के समक्ष आकर खड़ा हो जाता है | कविता की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं —–

बहती प्रबल वेग से शीतल जल कल-कल

चट्टानों को तरास निकला करती चंचल जल

शेषनाग की फुहार भांति ले बहती धारा

शीतल जल छूने से कतराता अंग-अंग हमारा

रूप समेट लिए हैं अम्बर छोर व बादल

प्रकृति का अलौकिक वरदान है हिमांचल

यह कवि के काव्य साधना की एक बड़ी उपलब्धि होती है कि वह जो कुछ कहना चाहता है | वेवाकी से कह जाता है और कविता के भाव पाठक के मन पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं | हमारा देश विभिन्न जाति व धर्मों का देश है | यहाँ तरह – तरह पर्व व त्यौहार समय – समय पर मनाये जाते हैं | ये त्यौहार कुछ ऋतुओं  से जुड़े हैं तो कुछ पौराणिक मिथकों , लोक कथाओं पर आधारित हैं | फिर समाज के बीच रहने वाला प्राणी कवि कहाँ इनसे अछूता रह सकता है | दीप पर्व , रंगोली , रक्षा बंधन , पावन पर्व जैसी कवितायेँ इन्हीं के प्रभाव का परिणाम हैं | जिसमे कवि कहता है —-

तरंग लिए झंकृत हुआ मन का अलंकार

घोर तिमिर लिए बेला में दीपों से सजा द्वार

आलोकित चहुँ ओर दिशा , चहुँ ओर प्रकाशित मन बगिया का हर छोर

नित प्रतिदिन प्रज्वलित दीपों की थार

सुख समृद्धि धन वैभव सद्भाव की बहती धार

ऐसी कामना की बहती निशदिन नदियाँ , दीपमाला से उजागर हो घर संसार चहुँ ओर

वर्षा ऋतु किसी भी कवि का एक प्रिय माह होता है | उसमें भी आषाढ़ – सावन का महीना अपना अलग ही विशेष स्थान रखता है | जहाँ सावन माह में कांवरिये भगवान शिव की पूजा हेतु जल चढाने निकल पड़ते हैं , वहीँ वर्षा के घनघोर घटा के मध्य प्रेमी – प्रेमिका का मन भी व्याकुल हो उठता है | एक दूसरे से मिलन हेतु | ऐसे में तमाम प्रतीकों , बिम्बों के माध्यम से कवि की कविता के लय फूट पड़ते हैं | अपनी कविता ‘सावन बदली; में कवि आनन्द सिंघनपुरी कहते हैं

घनी सांवली सी सुंदर काया

रुपहले लटों सी बिखरी साया

ले पुरवाई भरी मतवाली चाल

हल्की – फुलकी सी दबी ताल

बलखाते , मटकाते आते सर-सरसे

सावन बदली रिमझिम बरसे

हमारे जीवन में समय का बहुत महत्व है | दरअसल जन्म और मृत्यु दोनों ही सत्य है | दोनों का अपना-अपना समय निर्धारित है | पहले जन्म फिर मृत्यु | अध्यात्म के मनीषियों का मानना है कि इसी जन्म व मृत्यु के मध्य का समय ही जीवन है | इस जीवन काल में आत्माएं जिस शरीर में होती हैं | परिवार , समाज व संस्कार के अनुरूप उसे व्यतीत करती हैं | अपने कर्मों को करती हैं | कवि का परामर्श है कि ऐसे समय का सदुपयोग करें | लोगों से अच्छा व्यवहार करें , मीठे बोल बोलें |

समय न आवे बार-बार , किस सोच में खड़ा है यार

अंतर्मन की गांठे खोल , कुछ तो मीठी बातें बोल

भुला दे हर रंजिशों के सफर का साया

टटोलें अंतर्मन से क्या पाया , क्या खोया

नयी तरंग , नयी मुस्कान के संग तनिक मधुर बोल

कुछ मीठी बातें बोल

कोई प्राणी चाहे मनुष्य हो या फिर जिनकी भाषा हम ठीक से नहीं समझ पाते | अर्थात हमारे पर्यावरण में रहते तमाम पशु पक्षी | सबके जीवन में माँ का स्थान सर्वोपरि है | प्रत्येक प्राणी ऋणी है माँ का | ऐसी माँ के  विषय में अपनी कविता ‘जननी’ में कवि आनन्द सिंघनपुरी लिखते हैं कि

जननी तेरे चरणों की धूलि , माथे में लेकर करता सदैव वन्दन

पग-पग पे पुष्प बिखेरूं करता सप्रेम अभिनन्दन

तेरी ममता की दामन में कर लूँ कुछ क्षण के लिए शयन

तमाम गीत – संगीत , ध्वनि – प्रतिध्वनि के मध्य जीवन राग को समझना अत्यंत आवश्यक है जिसके साथ व्यतीत अनुभव से कवि कहता है कि—

तन्हाईयों में रंग बिखेरा करती जिन्दगी

लम्हों की याद दिलाती जिन्दगी

पल-पल साज सुनाती जिन्दगी

गीतों पर ताल पिरोती जिन्दगी

जिन्दगी के विभिन्न रूपों को देखते समाज की तमाम गतिविधियों पर पैनी नजर रखते हैं कवि आनन्द सिंघनपुरी | निश्चय हिंदी साहित्य में उनसे बहुत सम्भावनाएं हैं | वे निरंतर प्रगति करें | ऐसी शुभकामनाओं के साथ बारंबार बधाई |

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