सार्थकता

अचार से उसने सूखी रोटी जैसे-तैसे खाई और उठ गई। आज एक सप्ताह हो गए उसके पति को दौरे पर गए हुए। वह प्रतिदिन सुबह-शाम दो-चार रोटियां बेमन से बना लेती और अचार या दही से खा लेती।
पति के बिना पूरी रसोई बनाना वह निरर्थक समझती। मुन्ने को वह दूध-रोटी खिला देती। साल भर का मुन्ना बिस्किट या रोटी खाकर खुश होकर खेलता रहता।
आज उसकी रसोई में कचौरी, पूड़ी और गोभी मटर की सब्जी बन रही थी। वह गुनगुनाती हुई प्रसन्नता से रसोई बनाने में व्यस्त थी।तभी पड़ोसन ने उससे पूछा,-“क्या बात है भई? तुम्हारी रसोई से बड़ी अच्छी-अच्छी खुशबू आ रही है। लगता है तेरे पति दौरे से आ गए हैं तभी तो आज पूरी रसोई महक उठी है।”
उसने मुस्कुराते हुए कहा-“हां, बड़े दिनों बाद आज मैं भी भर पेट खाऊँगी । मेरे पति जो आ गये हैं। इनके खाने से ही मेरी रसोई सार्थक होती है।”
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