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Home›साहित्य›लेख›आलेख›साहित्य संवाहक हरकिशोर दास का रचनाकर्म

साहित्य संवाहक हरकिशोर दास का रचनाकर्म

By श्याम नारायण श्रीवास्तव
February 5, 2018
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मै जल – जल निज तप के बल से
प्रभु तेरे उर के सागर से
उमड़ा लाऊंगा जग के हित
चिर शीतल घन मेघ – दया
यह पृथ्वी चिंता से जर्जर
देखेगी नव स्वप्न मनोहर
उसको फल – फूलों से भर कर
मैं रच दूंगा स्वर्ग नया , मैं न अभी हूँ हार गया |
“मैं रच दूंगा स्वर्ग नया”, यह एक संकल्प है | आत्मविश्वास है |

एक ऐसे विलक्षण प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का | जिनका साहित्य के क्षेत्र में उड़िया , हिंदी ,
संस्कृत व अंग्रेजी जैसी बहुचर्चित भाषाओँ में सदैव समान अधिकार रहा है | जिन्होंने इन
भाषाओँ में साहित्य समाज को मात्र अपनी रचनाएँ ही नहीं दी | बल्कि तमाम उच्चतम
ग्रन्थों का इन भाषाओँ में अनुवाद करके पाठक और लेखक के मध्य पुल का कार्य किया | मै
बात कर रहा हूँ , कला साहित्य व संस्कृति की नगरी रायगढ़ के साहित्यकार पं चिरंजीव
दास के सम्बन्ध में | जो अपनी कविता के माध्यम से कहते हैं “ मैं न अभी हूँ हार गया” |
निश्चय ही साहित्यकार कभी हारता नहीं है | वह तो जीवन पर्यन्त संघर्ष करता
है समाज की तमाम विसंगतियो से , जूझता है तमाम विषमताओं से | जनवादी तेवर व
मानवीय संवेदनाओं के साथ , प्रगतिशीलता की पक्षधरता में गढ़ता है कहानी, कविता नाटक ,
आलेख आदि | जिसके पात्र सर्वहारा , मछुआरा , किसान , लकड़हारा , चरवाहा नाविक ,
श्रमिक आदि तो होते ही हैं साथ –साथ प्रकृति के वे सभी अवयव शामिल होते हैं जिनसे
साहित्यकार की असीम संवेदना जुडी होती है |

छत्तीसगढ़ के जनपद रायगढ़ में बूड़ी अंचल में स्थित ग्राम मोहदी में 21 जनवरी 1921
को पं चिरंजीव दास जी का जन्म हुआ था | पत्नी श्रीमती इंदुमती के साथ –साथ अपने चार
पुत्र व दो पुत्रियों से भरे पूरे परिवार का दायित्व निर्वाह करते हुए मध्यप्रदेश शासन की
शासकीय सेवा में कार्यरत पं चिरंजीव दास रायगढ़ , विलासपुर , रायपुर , शिवनी , शहडोल ,
अंबिकापुर आदि स्थानों में पदस्थ रहे | और 1979 में वे लेखाधिकारी पद से सेवानिवृत हुए |
इस बीच साहित्य अभिरुचि के चिरंजीव दास ने विभिन्न भाषाओँ के साहित्य को पढ़ा और
मौलिक लेखन के साथ-साथ तमाम चर्चित ग्रंथो का अनुवाद भी किया | साहित्य सेवा करते
हुए आपने जनचेतना एवं प्रगतिशीलता के केंद्र में 32 पुस्तकों का सृजन किया | जीवन पर्यन्त
साहित्य में संलग्न पं चिरंजीव दास ने 26 नवम्वर 1998 को इस नश्वर शरीर को त्यागकर
अंतिम साँस ली |
हमारे देश या विदेश में भी यह एक अजीव विडम्बना है कि साहित्यकार के दिवंगत
होने के साथ ही उनका साहित्य भी समाप्त हो जाता है | उनके वरिशों को न तो साहित्य के
प्रति लगाव रहा, न ही उन्होंने अपने माता या पिता के द्वारा रचे साहित्य को समाज तक
लाने की आवश्यकता समझी | अन्य साहित्यकार व शासन की भूमिका भी उक्त साहित्यकारों
के प्रति कभी भी बहुत संतोषजनक नही रही | परिणाम स्वरूप तमाम अप्रकाशित साहित्य
डायरी के पन्नों में कैद होकर रह जाता है और किस्से कहानियों की भांति समय अन्तराल के
पश्चात् वह साहित्य , काल के गाल में समा जाता है |
यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है | साहित्यकारों के अतीत को
झाँका जाय तो प्राय: प्राप्त होता है कि उनके साहित्य का संवाहक उनके परिवार का सदस्य
नहीं होता | सदस्य कहने का मेरा सीधा आशय उनके पुत्र व पुत्री से है | जिन्हें या तो अपने
पिता के साहित्य से लगाव नहीं है , या फिर स्वयं में साहित्य की समझ नही है ,या फिर
रोजी रोटी के भंवर में फंसने के पश्चात उनके पास समय ही नही होता कि माता या पिता
द्वारा रचे गये साहित्य को पढ़े | प्रकाशित कराये , वितरित करें या उसे महत्व दे, या फिर
उसे समाज में प्रतिष्ठित करे | सच तो ये है कि कितने परिवार के सदस्य साहित्य रचना कर्म
को अच्छी दृष्टि से देखते ही नहीं ,फालतू समझते हैं ऐसे लोगों को | और कोसते हैं कि कुछ
नहीं किया जिन्दगी भर , किताबों में अटके रहे बस | लोग तो ये भी कहते हैं जहाँ सरस्वती
हैं वहाँ लक्ष्मी नही टिकती | तो भला आज बाजारवाद के दौर में कौन वारिश पिता के ऐसे
साहित्य का संवाहक बनेगा जिसमें उसे कुछ अर्थ लाभ न हो | किन्तु इन वारिशों को कौन
बताये कि साहित्यकार कभी भी लक्ष्मी के लिए समझौता नहीं करता | वह अपने वसूलों में

जीता है | बाजार तन्त्र से तटस्थ रखता है अपने को | भले ही वह जीवनपर्यन्त अभावों में
जीता रहे |
हांलाकि एक साहित्यकार की दुनिया बहुत बड़ी होती है | ऐसे में किसी भी कर्मठ ,
सृजनशील व संवेदनशील व्यक्ति के सृजन कर्म द्वारा प्राप्त धरोहर को आगे की पीढ़ी तक
पहुचने का दायित्व समाज का भी है न कि उनके परिवार का ही | लेकिन ये मात्र कहने भर
की बात है आदर्शवादी बातों की तरह | जो कहने में ही अच्छी लगती हैं | अनुसरण कोई
नही करना चाहता |
वैसे भी कहते हैं कि – शैले-शैले न माणिक्यं मौक्तिकम न गजे-गजे
साधवो न हि सर्वत्र , चन्दनम न वने – वने
परन्तु इस मामले में पं चिरंजीव दास जी बहुत ही भाग्यशाली है कि उन्हें साहित्य
संवाहक के रूप में एक योग्य सुपुत्र हरकिशोर दास जी के रूप में मिला है | जिन्होंने अपने
पिताश्री की स्मृति में “चिरंजीव दास स्मृति एवम अध्ययन संस्थान” की स्थापना की |
जिसके अंतर्गत हरकिशोर जी विगत 2003 से पिताश्री के साहित्यकर्म को समाज के समक्ष
प्रस्तुत करते हुए उनके जन्म दिन को एक साहित्यिक उत्सव का स्वरूप प्रदान करते आ रहे
हैं | इस श्रृंखला में वर्ष 2017 साहित्य समारोह का पंद्रहवां वर्ष होगा | जिसमें प्रत्येक वर्ष हिंदी
के एक महत्वपूर्ण कवि का एकल काव्य पाठ होता है और फिर संस्कृत के एक विद्वान्
द्वारा किसी पूर्व निर्धारित विषय पर व्याख्यान माला | दरअसल 2003 में पहले संस्कृत में
ही कार्यक्रम प्रारंभ किया गया था | तत्पश्चात 2005 से हिंदी में एकल कविता पाठ का
सुभारम्भ हुआ |
यह एक सुखद संयोग ही है कि रायगढ़ के जिंदल स्टील में मैं 2005 से ही आया
हूँ | और हरकिशोर दास जी के संस्थान से जुड़े प्राय: सभी आयोजनों में सम्मिलित होता रहा
| मन में विचार आया कि क्यों न कार्यक्रम से हटकर किसी दिन हरकिशोर जी से कुछ और
बातें करूँ तो शायद पं चिरंजीव दास को कुछ अधिक जान पाऊंगा | जानना यह भी चाहता
था कि स्वयं हरकिशोर जी का अपना रचना संसार क्या है ? क्यों कि राम किशन डालमिया
जी द्वारा आयोजित गोष्ठी में उन्होंने जो कवितायेँ पढ़ी थीं , वे आज भी मुझे अपील करती
हैं | कवितायेँ नष्ट होते पर्यावरण के संरक्षण व आदिवासियों के पक्ष में थी | और उनके
द्वारा प्रत्येक वर्ष किये जा रहे एक बड़े साहित्यिक आयोजन से भी यह बात स्पष्ट होकर
सामने आ जाती है कि कहीं न कहीं हरकिशोर दास जी के भीतर साहित्य के प्रति घोर लगाव

है , साहित्य की समझ है | तभी इतना बड़ा आयोजन सम्भव हो पा रहा है | बस फिर क्या
था | मैंने फोन किया , समय लिया और पहुंच गये हरकिशोर दास जी के घर , रायगढ़ के
नयागंज मुहल्ले में , समलेश्वरी मन्दिर के सामने ,एक रविवार के दिन |
आपस के हालचाल जानने के बाद मैं असली मुद्दे पर आ गया | मैंने कहा यह
आयोजन का पंद्रहवां वर्ष है पहले तो इस निरंतर सफल आयोजन हेतु आपको हार्दिक बधाई
देना चाहता हूँ और फिर यह जानना चाहता हूँ कि इस संस्थान की भविष्य में क्या कुछ और
योजनायें हैं ? इस पर हरकिशोर दास जी ने कहा , “ प्रत्येक वर्ष किसी महत्वपूर्ण कवि का
एकल काव्य पाठ और संस्कृत के विद्वान् द्वारा व्याख्यान माला तो एक शुरुआत है | अभी
इस संस्था द्वारा भविष्य में बहुत सी योजनायें फलीभूत होनी हैं |”
क्या आप कुछ विस्तार से बताना चाहेंगे ? मेरे पूछने पर उन्होंने कहा , “हाँ – हाँ
क्यों नहीं ? आने वाले समय में इस संस्था की ओर से मेरी योजना है कि समकालीन हिंदी
कविता को प्रश्रय और प्रोत्साहन देने के लिए नई पीढ़ी के मध्य कुछ कार्यक्रम करें | साहित्य
की कार्यशाला हो | विमर्श हो , सेमिनार हो | जिसमें तमाम युवा वर्ग की भागीदारी हो , वे
इसका लाभ उठायें | युवा दलित एवं आदिवासी जन जाति समाज के युवा रचनाकारों को मंच
देने की योजना है | जो उन्हें साहित्य की एक सार्थक दिशा प्रदान करे | सरकार इस वर्ग को
रोजगार देने का अवसर तो देती है लेकिन आधुनिक साहित्य व संस्कृति के प्रति लगाव
विकसित करने हेतु भी कुछ कार्यक्रम होना चाहिए |
रायगढ़ अंचल के कुछ ऐसे कवि हैं जो किसी एक दौर में बहुत सक्रिय रहे , किन्तु
एक समय अन्तराल के पश्चात उन्हें विस्मृति कर दिया गया , यदि उनका साहित्य उपलब्ध
हो जाय | तो उनकी अप्रकाशित रचनाओं को प्रकाशित कर केन्द्रित रूप में लाने का विचार है
| जैसे महादेव प्रसाद मिश्र , राम मूर्ति तिवारी , कुंजविहारी चौबे आदि | कुछ रचनाकारों की
अप्रकाशित रचनाएँ भी उन्होंने दिखाई | जिसे फ़ाइल में बहुत सहेज कर रखा गया है |
उन्होंने बताया , “ बहुत सी लघुपत्रिकाएं मेरे पास संकलित हैं जिनकी प्रदर्शनी भी लगानी है
और लघु पत्रिकाओं की सार्थकता पर गोष्ठी करनी है | और भी कई योजनाओं पर चर्चा हुई |
अब तक के आयोजन में सम्मिलित हुए कुछ साहित्यकारों पर भी चर्चा हुई |
उन्होंने बताया कि अब तक हिंदी के चर्चित साहित्यकारों में जहाँ श्री विनोद कुमार
शुक्ल , लीलाधर जगूड़ी , आलोक धन्वा , असद जैदी , एकांत श्रीवास्तव , वीरेन डंगवाल ,
हरीश चन्द्र पाण्डेय , नरेंद्र जैन , केदार नाथ , राजेश जोशी , रमेश चन्द्र शाह , अनामिका

जैसे विद्वानों ने एकल काव्य में अपनी सहभागिता दर्ज करायी है वहीं संस्कृत भाषा के
मर्मज्ञ डा कमलेश दत्त त्रिपाठी , वागीश शुक्ल , अभिराज राजेन्द्र मिश्र , विश्वनाथ त्रिपाठी ,
राधा बल्लभ त्रिपाठी , प्रो शिव जी उपाध्याय , रमाकांत शुक्ल , इला घोष आदि विद्वानों ने
संस्कृत भाषा के विभिन्न विषयों पर सारगर्भित व्याख्यान दिये |
मैंने कहा , भाई साहब आप साहित्य के लिए निश्चय ही बहुत सराहनीय कार्य
कर रहे हैं | रायगढ़ जैसे छोटे शहर में इतने महान साहित्यकारों का आगमन ही बहुत
महत्वपूर्ण है | आपने संस्थान के तहत आगामी योजना की जानकारी भी दी | मैंने
डालमिया जी के यहाँ गोष्ठी में आपकी कविताएँ सुनी थीं | कवितायेँ मुझे बहुत लगी थीं |
लेकिन आपके रचना कर्म के विषय में मुझे विशेष जानकारी नहीं मिल सकी है | लिहाजा
आज आप मुझे कुछ अपने बारे में बताएं |
अधिकतर गम्भीर मुद्रा में रहने वाले हरकिशोर दास जी धीरे से मुस्कराए फिर बोले
, “मै बहुत दिनों से लिख रहा हूँ | कहानी , कविता , समसामयिक विषयों पर बहुत से आलेख
लिखा और अधिकतर रचनाएँ देश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओ में प्रकाशित हुई | इसी के
साथ उन्होंने आलमारी में सलीके से रखी हुई कई फ़ाइलें निकाल लीं | वे बोलते रहे और
बतौर साक्ष्य प्रकाशित रचनाओं की पत्रिकाएं , अख़बारों की प्रतियाँ दिखाते भी रहे | बड़े
साहित्यिक आयोजनों में अपनी भागीदारी भी बताई | जिनके आमन्त्रण कार्ड फ़ाइल में आज
भी सुरक्षित है | वरिष्ठ साहित्यकारों के मध्य हुए पत्राचार एवम् उनके पत्र सब कुछ फ़ाइल
में मिलते गये |
कुछ जानकारी तो मै तुरंत अपनी डायरी में नोट करता जा रहा था | लेकिन बहुत
सी ऐसी सामग्री थी जिन्हें समय निकल कर ही पढना होगा | ऐसी सामग्रियों की मै फोटो
खींचता जा रहा था कि बाद में फुर्सत से पढूगा | हरकिशोर दास जी ने बताया कि अप्रेल 82
में साहित्य अकादमी , मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद की मासिक पत्रिका साक्षात्कार में 9
कवितायेँ तथा जुलाई 94 में 7 कविताएँ प्रकाशित हुई थीं | साम्य , जारी , उन्नयन , नव
भारत टाइम्स , समकालीन भारतीय साहित्य जैसी साहित्य की श्रेष्ठ पत्रिकाओं में रचनाएँ
प्रकाशित हुई | तो उत्तरगाथा , जनयुग में कहानी प्रकाशित हुई है | फिल्मों व अन्य विषयों
पर भी लेख प्रकाशित हुए |
हरकिशोर दास जी ने साहित्य के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों के विषय में जानकारी
देते हुए आगे बताया कि वे वर्ष 1987 में मध्यप्रदेश साहित्य परिषद द्वारा युवा रचना

संगोष्ठी में कवि के रूप में चयनित किये गये थे | मध्य प्रदेश साहित्य परिषद् तथा
प्रगतिशील लेखक संघ के अनेक आयोजनों में उन्होंने शिरकत की | म.प्र.साहित्य परिषद् से
सम्बद्ध पाठक मंच रायगढ़ इकाई के संयोजक रहे तो इसी साहित्य परिषद् द्वारा रायगढ़ में
पं लोचन प्रसाद पाण्डेय व मुकुटधर पाण्डेय जन्मशती समारोह का उन्होंने संयोजन भी किया
| आकाशवाणी रीवा ,रायपुर , अंबिकापुर से उन्होंने कविता पाठ किया | जेलवार्ता के नाम से
दो वर्षों तक एक बुलेटिन का सम्पादन व प्रकाशन किया |
मध्य प्रदेश साहित्य परिषद ने 1987 में रायपुर में जो युवा रचनाकारों की गोष्ठी
आयोजित की थी | उसमें रचनाकारों द्वारा पढ़ी गई कहानियो व प्रशंसित कविताओं को
देशबन्धु समाचार पत्र ने वरिष्ठ साहित्यकारों द्वारा दी गई टिपण्णी के साथ प्रमुखता से
प्रकाशित किया था | उन युवा साहित्यकारों में अमिताभ मिश्र , आलोक वर्मा , कुमार अंबुज
, नवलकिशोर शुक्ल के साथ एक नाम रायगढ़ के हरकिशोर दास का भी था |
वरिष्ठ साहित्यकार डा राजेन्द्र मिश्र ने हरकिशोर दास की कविता की समीक्षा करते
कहा था , “ हरकिशोर दास की कविताओं का अनुभव संसार भिन्न है | ये अपनी निजी और
आत्मीय दुनिया की पहचान को गहरा करने वाली कवितायें हैं | संस्कार ग्रस्त धीरे-धीरे
आहत करने वाला जो समय है उनकी चिंता का निर्णायक नहीं है | कविता में दृष्टि और
संवेदना का जो झगड़ा होता है वे उसका अतिक्रमण करना चाहते हैं | डा मिश्र ने आगे कहा है
कि किसी भी पीढ़ी के लिए अहम मुद्दा यह होता है कि वह भाषा के साथ किस तरह का
सलूक करती है और अपने अनुभव संसार को कैसे खोजती है | मै निश्चित ही यह कह
सकता हूँ | इस दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है कि इनमें वह संघर्ष दिखाई देता है जो नये कवि
अपने शब्द , अपनी भाषा , अपने मुहावरे को पाने के लिए करना चाहते हैं | समाचार पत्र में
इस टिप्पणी के साथ प्रकाशित हरकिशोर दास की कविता नदी शीर्षक से है —
नदी
हो क्यों कर आज खामोश तुम
राह में तुम्हें
कहा है कुछ क्या पहाड़ों ने
या जंगलों से

हुई है कुछ कहा सुनी , कहो
साफ़ साफ़ कहो
कतई मुझे मंजूर नहीं
तुम्हारी ये उदासी
यह बरताव तुम्हारा
दर्द पिरो देगा
खेत खलिहान में
और फिर मेरी आत्मा में
कविता और बड़ी है | कविता में प्रकृति के प्रति कवि का दर्द है | निश्चित ही मैं
उस दिन हरकिशोर दास जी के पास पं चिरंजीव दास के विषय में कुछ और जानने हेतु गया
था लेकिन उस बहाने रायगढ़ के एक ऐसे रचनाकार के बारे बहुत कुछ जानकर लौटा | जो
साहित्य की तमाम गतिविधियों से जुड़े हुए अपने स्वयं के रचनाकर्म को धीरे- धीरे सुदृढ़ कर
रहा है |
वापस आकर मैंने हरकिशोर दास की रचनाओं के फोटोग्राफ्स को गौर देखा | एक
पुराने आमन्त्रण कार्ड के अनुसार – मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ का एक सम्मेलन
१९७६ में सतना में आयोजित हुआ था | जिसके अध्यक्ष चर्चित व्यंगकार हरिशंकर परसाई जी
थे और संयोजन समिति में थे पहल के सम्पादक ज्ञान रंजन , डा कमला प्रसाद , श्याम
कश्यप , डा श्याम सुंदर मिश्र , डा जगदीश सलिल और जिसका उद्घाटन होना था
त्रिलोचन शास्त्री जी के कर कमलो से | इस त्रिदिवसीय आयोजन में एक सत्र में समकालीन
“कथा साहित्य और सामाजिक यथार्थ” पर पर्चे पढ़े गये और बहस हुई | बहस में शामिल हुए
साहित्यकारों में भीष्म साहनी , तकी हैदर , अजित पुष्कल , धनंजय वर्मा , रवीन्द्र कालिया
, काशीनाथ सिह के साथ हरकिशोर दास जी का नाम भी प्रकाशित है जो विशेष उल्लेखनीय
है | साक्षात्कार पत्रिका में प्रकाशित एक कविता है — –
पूर्वजों की याद में
मैं भूल जरुर गया हूँ रास्ता

पर महक मौजूद है अब भी
मेरे अंदर
जिनके सहारे मै लौट सकता हूँ
वहाँ तक
जहाँ से हुई थी शुरू
सुबह की बातचीत
उन तालाबों ,पहाड़ों , नदी और नालों से भी आगे
लौटकर
मै चाहता हूँ पहुचंना वहाँ
जिसके आगे और कोई शुरुआत नहीं
— — — — — — –
एक दूसरी कविता है– –
देवों ने पलट कर नहीं देखा
संतों ने भी उच्छ्वास नहीं लिया
इस सदी से उस सदी में
छलांग लगाते
कई दिव्य आत्माओं से किया मैंने
घोर शास्त्रार्थ
फिर अचानक / सौर मंडल की
इंद्र धनुषी हंसी के बीच
कई थपेड़ों और आघातों को झेलते

वर्षा की बूंदों से सरोकार
मै बहा / एक नदी के साथ- साथ
निश्चय ही हरकिशोर दास जी में बहुत संभावनाएं हैं | वे साहित्य के सजग हैं |
उनके द्वारा स्थापित संस्थान की योजनाएं भविष्य में अवश्य ही रायगढ़ को सुदृढ़ और
सार्थक दिशा प्रदान करेंगी | यह बहुत ही प्रसंशनीय है कि रायगढ़ जैसे छोटे से शहर में
तमाम वरिष्ठ साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों की उन्होंने भीड़ लगा दी | लेकिन अपने
साथ कार्यकर्ताओं की भीड़ कभी नहीं रखी | जो किया चुपचाप अपने दम पर किया | वैसे ही
साहित्य में भी वे योजनाबद्ध तरीके से निरंतर लिख रहे हैं , नियोजित ढंग से कार्य कर रहे
हैं | मशहूर शायर मजरुह सुल्तानपुरी की दो लाइनें याद आती हैं कि –
मै अकेला ही चला था जानिवे मंजिल मगर , लोग आते गए और कारवां बनता गया

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