हाइकु विन्यास में गज़ल
कभी बेकार/ की बातों को/ छोड़ देवें भी,
टूटते रिश्तों/को आपस में कभी/जोड़ देवें भी|
बड़ी जालिम/ दुनिया की रिवाजें/जिसमें बंधे,
ऐसे वैसे को/ दूरिया बनाकर/ तोड़ देवें भी|
जो हो भटके/कहीं पे हो अटके/ निकाल लाओं
जहाँ बड़ा है/ जरा हवा का रुख/ मोड़ देवें भी|
कूट-कूट के / जिनमें भरी जाती/ अज्ञानता,
उस घड़े को/ निकाल के बाहर / फोड़ देवें भी |
कड़वे शब्द/ जी को जला जाये तो /चुप होकर
शीरीं जुबाँ की/ओर जरा चलकर / मोड़ देवें भी |
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