हार गया मन,जीते-जीते

हार गया मन,जीते-जीते,
फटी जिंदगी ,सीते-सीते,
अपने ,अंधियारे बीते हैं ,
मन की मदिरा पीते-पीते।
धूप – छांव के ऊपर -नीचे,
कैसा यह कोहराम मचा है?
डोल रही धरती ने छुपकर ,
भीषणतम संत्रास रचा है ।
समिधा को है,अग्नि समर्पित,
बुझते – जलते ,नए पलीते।।
हार गया—
अनियंत्रित,विकास के साथी,
अतिरंजित इतिहास लिखेंगे ,
भीगी – गीली आंखों में भी ,
सपनों का उल्लास लिखेंगे।
विभीषिका से घायल पाहुन,
अपने-अपने, सजे सुभीते।।
हार गया —
चाक-चाक धरती का सीना,
दृष्टि से ओझल हो जाता है,
बस ,दोहन की मारामारी ,
कौन यहां किसको भाता है ?
अंतहीन , अंतरद्वन्द्वों में,
छुपा लिया है मन,मनमीते।।
हार गया —
छुद्र विषाणु ने छीन लिया है,
जीवन का सारा सुख-वैभव,
मृत्यु के भय ने डुबा दिया है,
आत्मबोध का संचित गौरव,
हार गए,सब कुछ,हम अपना,
जब-तब,हम-सब,निकले रीते।।
हार गया —