ज़ख़्म हैं उस पे ज़ख़्म के ये मंज़र

ज़ख़्म हैं उस पे ज़ख़्म के ये मंज़र
अब के तोहमत लगाएँ हम किस पर
हँसना मजबूरी थी दीवारों की
रोते रहते तो डूब जाता घर
एक ग़म के सबब दो आँखें रोईं
यानी थे इक मकान के दो दर
चाँद आया न ही सितारे आए
आसमाँ देखता रहा शब भर
सामने घर है बाहें फैलाए
थाम के हाथ बैठा है दफ़्तर
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