त्रिशंकु

त्रिशंकु
रमेश को नौकरी मिल गयी। अब सिर्फ माँ की एक इच्छा रह गई थी, जल्द से जल्द बहू लाने की।
रमेश स्वयं इस मामले में संवेदनशील था। बहू आ जाए और माँ को चूल्हे-चैके से भी फुर्सत मिल जाए। पिछले
पन्द्रह वर्षों के बीच थोड़ी-सी गुजारे की पेंशन और कोचिंग सेन्टर की मास्टरी करके माँ ने कैसी-कैसी परेशानियाँ
झेलकर उसे पैरों पर खड़ा किया था- वह इसे भूला नहीं था। इसलिए वह चाहता था-माँ का बाकी जीवन आराम
से बीते।
एक दिन वह भी आया, जब रमेश की शादी हो गई। बहू सुन्दर होने के साथ-साथ सेवाशील भी थी।
माँ को एकदम आराम मिल गया। रमेश खुद भी जितनी देर घर रहता, माँ की सेवा में लगा रहता। एक दिन माँ
ने ही समझाया-‘‘बेटा, तू मेरे पीछे क्यों परेशान रहता है ? जरा बहू का भी ख्याल रखा कर।’’
उसने माँ का कहना मान लिया। एक-एक करके कई महीने बीत गये। पत्नी का रंग-रूप तो और भी
निखर आया। लेकिन इसी बीच माँ काफी आत्मकेन्द्रित और थकी-सी रहने लगी थी। वे न तो किसी मामले में
सुझाव देती थीं और न शिकायत करती। उनकी दिनचर्या तटस्थ-सी हो गयी थी, सुबह स्नान के बाद दो-ढाई
घंटा पूजा-पाठ, भोजन करके दोपहर से तीसरे पहर तक अपनी कोठरी में धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन और शाम
को पिछवाड़े वाली बाग में बैठकर चुपचाप खाली-खाली आँखों से डूबते सूरज को निहारना जैसे अपनी जीवन
सन्ध्या का अन्त ढूँढ़ रही हो।
यह सब देखकर रमेश के मर्म पर चोट लगी। कृतघ्नता के अपराध बोध से वह ग्रस्त हो उठा। उसने
पुनः माँ पर अपना सारा स्नेह उड़ेलना शुरू कर दिया। माँ के जीवन की जड़ता का स्थान धीरे-धीरे एक
अधिकार-सम्पन्न सक्रियता ने ले लिया। रमेश को प्रसन्नता तो हुई, लेकिन इन्हीं दिनों उसने यह भी लक्ष्य
किया कि अब पत्नी कुम्हलायी-सी रहने लगी थी।














