जादुई अंगूठी

मजमें के खंडित वृत के अन्दर उस नौजवान ने एक बार फिर डुगडुगी बजाई। तत्पश्चात् बोला, ‘‘हिन्दू
भाइयों को राम-राम, मुसलमान भाइयों को सलाम। भाइयों मेरे पास हुआ करती है एक जादुई अंगूठी, जो
चमत्कार में है बड़ी अनूठी। झूठ साबित करने वाले को पाँच सौ रूपया नकद इनाम। न पसन्द आने पर दाम
वापसी की गारण्टी…..’’
एक क्षण के लिए वह रुका, उसका दायाँ हाथ हरकत में आया और डुगडुगी से ‘‘ड्रिम’’ की आवाज
निकालकर फिजा में तैर गयी। उसने आगे कहना शुरू किया, ‘‘यह अंगूठी लाटरी, सट्टा और मुकदमा जितायेगी।
बिछुड़े यार से मिलायेगी। जिस स्त्री को याद करोगे फौरन दौड़ी चली आयेगी। पुराने से पुराना रोग भगायेगी।
सोई किस्मत को जगाने वाली इस अंगूठी की कीमत सिर्फ दस रूपया…….’’
एक साहब ने मजमें में सवाल उछाला, ‘‘जब तुम्हारे पास ऐसी चमत्कारी चीज है तो क्यों मजमा
लगाते फिरते हो ? इससे खुद क्यों नहीं लाभ उठाते ?’’
सवाल नया नहीं था। इसलिए चट जवाब हाजिर हो गया, ‘‘साहबान, सवाल अपनी जगह ठीक है। मगर
गौर करें- अपने इल्म का सारा फायदा मैं खुद लेने लगूँगा तो यह नष्ट हो जायेगा। हाँ, दाल में नमक बराबर
की बात दीगर है। इसलिए ……………’’
उसे अपनी बात बीच में ही रोक देनी पड़ी। क्योंकि कई कद्रदान जादुई अंगूठी के लिए पैसा बढ़ाने लगे
थे…… और वह तीन रूपया प्रति अंगूठी के रेट से बनवाई गई अंगूठियाँ धड़ाधड़ दस रूपये में बेचने लगा।













