पारिवारिक संवेदनाओं को उजागर करती हैं नि:शब्द की कहानियां

नि:शब्द कहानी संग्रह डा अनीता श्रीवास्तव की दूसरी कहानी संग्रह है | पन्द्रह कहानियों के इस गुलदस्ते की कहानियां पारिवारिक संवेदनाओ, आपस के तर्क-वितर्क , स्त्री व पुरुष के मध्य सम्बन्धों में तीखापन का अहसास ,वृद्धावस्था का एकाकीपन , यौन शोषण के गिरफ्त में आती बच्चियों , दहेज या फिर स्वार्थ सिद्धि हेतु बेमेल विवाह, असामाजिक तत्वों द्वारा दंगा – फसाद , जीवन के भागमभाग में दिन-प्रतिदिन असुरक्षित होती जिन्दगी, यातायात की दुर्घटनाएं व विद्यालयों में असुरक्षित बच्चों के प्रति अनुभव आदि से जन्मी हैं| परिवार की परिवर्तित होती परिभाषा अब पति पत्नी और एक-दो बच्चे तक सीमित रह गयी है | ऐसे में पति के आफिस व बच्चों के स्कूल जाने की तैयारी में एक स्त्री भाग-भागकर कभी पत्नी का धर्म निभाती है तो कभी माँ का | ‘धूपछांव’ की अपर्णा के लिए सुबह होते ही आवाज आने लगती है “ अपर्णा मेरी नीली वाली शर्ट नहीं मिल रही है , मम्मी मेरे मोज़े कहाँ हैं या मम्मी मेरी चप्पल पता नहीं कहाँ रखी है |” और इसी में आपसी टकराव फिर प्रायश्चित यानि कभी ख़ुशी कभी गम की धूपछांव के बीच अपर्णा जैसी अनगिनत महिलाओं के विवाह पूर्व देखे गये अपने सपने , सपने ही बन कर रह जाते हैं | ‘धूपछांव’ महानगरीय संस्कृति में पल रहे परिवार के घर –घर की कहानी है | तो दिन-प्रतिदिन बढती आवश्यकताओं और शानोशौकत की होड़ और फिर पैसे की चाहत में जब पति पत्नी दोनों ही रोजगार करते हैं तो बच्चे के प्रति स्नेह व समय उनकी नजरों से ओझल होते परिदृश्य को प्रक्षेपित करती है कहानी ‘मुरझाये हुए फूल’ | एक बेटी को अपना समय न दे सकने के कारण बेटी के मन में उपजे प्रश्न को उजागर करती कहानी ‘मुरझाया हुआ फूल ‘ एक जीवंत कहानी है | बेटी एक दिन सोचती है , “पैसा ! पैसा ! पैसा ! मम्मी पापा को केवल यही दिखाई देता है , तभी तो पापा बिजनेस के काम से कभी कलकत्ता कभी बम्बई तो कभी दिल्ली जाते रहते है | मम्मी सर्विस करती हैं साथ में बॉस की चमचागिरी |” एक दिन आफिस जाते समय उसकी मम्मी माली को डांटती है , “अभी तक अंदर रखे हुए गुलदस्तों से मुरझाये हुए फूल उठाकर उनमें ताजे फूल क्यों नहीं
लगाए ? क्या तुम्हे पता नहीं है कि मुझे मुरझाये हुए फूल मुझे ज़रा भी अच्छे नहीं लगते |”
तो उसकी बेटी बुदबुदा उठती है “ नहीं मम्मी , तुम झूठ बोलती हो कि तुम्हें मुरझाये हुए फूल जरा भी अच्छे नहीं लगते |” जीवन और मृत्यु सत्य है इसमें मनुष्य का कोई वश नहीं चलता | सब जानते हैं फिर भी मोह एक ऐसा मानवीय गुण है कि वह स्मृतियों में ही जीता रहता है | संग्रह की प्रथम कहानी ‘स्मृतियाँ’ की मानसी जब बहुत छोटी होती है तभी उसके पापा की मृत्युअचानक हार्ट अटैक आने से हो जाती है | वह अपने पापा को बहुत प्यार करती थी तब वह प्यार का अर्थ नहीं जानती थी , मृत्यु का अर्थ भी नहीं जानती थी | अब दोनों का अर्थ जान चुकी है | अब का तात्पर्य है मानसी बड़ी हो चुकी है , नितिन उसका पति है | उसकी एक बेटी है रिचा है , स्कूल में एक दिन खेलते हुए गिर पड़ती है | बहुत प्रयासों के पश्चात् भी डाक्टर उसे बचा नहीं पाते | और अब मानसी की स्मृतियों में है उसकी बेटी | तभी तो
नितिन कहता है स्मृतियाँ कितनी अच्छी होती हैं जो मनुष्य को जिन्दा रखने में सहायता करतीं हैं | इन स्मृतियों को भला कौन छोड़ सकता है , यही तो उसकी धरोहर है | कूट- कूटकर माँ की ममता से भरी एक अत्यंत मार्मिक कहानी है | जिसे डा अनीता श्रीवास्तव ने बहुत मन से रचा हैं |
साम्प्रदायिक उन्माद में भटके दो गुटों के मध्य हो रहे दंगे फसाद का अंत निश्चय ही बहुत ही भयावह है | लोगों के आपसी कारनामे के परिणाम से बुनी गई ‘फूल मर जायेगा’ भी बहुत ही मार्मिक कहानी है | जिसमें एक बस्ती दंगाइयो द्वारा जला दी जाती | दंगे में अचानक कई परिवार उसके चपेट में आ जाते हैं और वह बच्ची भी उस दंगे का शिकार हो जाती जिसकी आवाज बाग़ में टहलते समय विशाल के कान में पड़ी थी | “पंखुड़ी मत तोडना, फूल मर जायगा |” विशाल से उसका परिचय अभी नया ही था | विशाल की बेटी निधि की मृत्यु कुछ ही समय पूर्व एक दुर्घटना के कारण हो गई थी | वह उस बच्ची छुटकी में अपनी निधि को देखने लगता है किन्तु वह छुटकी भी इस दंगे की शिकार हो जाती है | दंगे के पश्चात् छुटकी का शव देखकर विशाल कह उठता है , “ पंखुड़ी को किसी ने तोड़ दिया है ,
फूल मर गया है | न मै पंखुड़ी बचा पाया ,न फूल |”
बदलते परिवेश के बावजूद आज प्राचीन संस्कृति व संस्कार में दबी नारी का यथार्थ चित्रण है कहानी ‘एक छत के नीचे’ | कहानी दर्शाती है कि तमाम नारी जागरण आन्दोलन व नारी विमर्श के बाद भी ‘कविता’ जैसी स्त्रियाँ अपने चरित्रहीन पति के विरोध की स्थिति नहीं बना पाती और मात्र अपने बच्चों का वास्ता देते हुए इतना ही कह कर चुप हो जाती है,
”अगर निधि और मनीष न होते तो मैं सब कुछ छोड़कर चली जाती और पीछे मुडकर भी न देखती | प्रकाश , तुम पुरुष हो , इसलिए आजाद हो | मैं नारी हूँ , इसलिए मैं अन्य कई बन्धनों में बंधी हुई हूँ | ममता की बेड़ियाँ मेरे पैरों में पड़ी हुई हैं , जिन्हें तोड़ कर मैं इस घर की घुटन से आजाद नहीं हो सकती |” फिर भी वह प्रश्न उठाती है ,”मैं नारी हूँ , इसलिए सारा गरल मेरे हिस्से में आया | पर गरल तो शिव ने पिया था , यानी एक पुरुष ने| मुझे आज के पुरुष में न तो शिव दिखाई देता है न राम | लेकिन नारी में पार्वती और सीता सब ढूढ़ते हैं |” निरंतर बढती हुई जरूरतों के मध्य घटते आपसी स्नेह के कारण वस्तुओं के संग रिश्तों का विक्रय भी अनवरत जारी है एक दूसरे की सम्पत्ति पर निगाह गड़ाये बैठे लोग पारिवारिक सम्बन्धों की वास्तविकता से बहुत दूर निकलते जा रहे हैं | इसी ताने बाने में बुनी संग्रह की नवीं कहानी ‘जरूरतें’ एक अच्छी कहानी हैं | तो संग्रह की शीर्षक कहानी ‘नि:शब्द’ दहेज के कारण अपने प्रिय को पति के रूप न प्राप्त कर पाने की एक मार्मिक
व्यथा की कथा है |
माता-पिता के जीवित रहते ही एक पुत्र द्वारा घर – जायदाद में अपना हिस्सा मांगना कोई नयी घटना जैसी नहीं रह गई | इसके बावजूद उनका का पुत्र स्नेह जीवन के
अंत तक बन ही रहता है, यह एक बड़ी बात है | ‘प्रतीक्षा ‘ कहानी कुछ इन्हीं सन्दर्भों के बीच गढ़ी हुई कहानी है | बेटा छुटकू अकेली सन्तान होने के कारण पुरखों की जमीन बेचकर रेडीमेड गारमेंट का व्यवसाय करने के लिए अपना हिस्सा मांगता है तो एक बार माँ पार्वती कह उठती है ,”छुटकू कैसा हिस्सा ? हमारे बाद तो सब कुछ तेरा ही है |’ किन्तु जमीन बिकती है कलकत्ते में बहुत बड़ी दुकान भी हो जाती है लेकिन माँ-बाप के प्रति दिल छोटा हो
जाता है | बीमार माँ अंत तक प्रतीक्षा करती है किन्तु छुटकू नहीं आता तो नहीं आता | तभी तो उसका पिता अर्थात पार्वती का पति पार्वती के मृत्यु के बाद कहता है, “अब तो शरीर में कुछ भी नहीं बचा पार्वती फिर भी तेरी आँखे छुटकू की प्रतीक्षा कर रहीं हैं | अब तो प्रतीक्षा मत कर बावली |” वृद्धापन का अहसास कराती तमाम सम्वेदनाओं से ओत-प्रोत कहानी ‘प्रतीक्षा’ संग्रह की एक बहुत अच्छी कहानी बन गई है |
संग्रह की सारी पन्द्रह कहानियों को गौर से पढ़ते हुए लेखिका की समाज व परिवार के पूर्ण सम्वेदना स्पष्ट झलकती है | एक छोटे परिवार के रिश्ते को सघनता से अध्ययन किया गया है | कहानी ‘सबसे बड़ा मन्दिर’ की गुड्डी अपनी माँ के आंचल को सबसे बड़ा मन्दिर
मानती है तो ‘ये आंसू नही मोती हैं’ की अनु का पिता के प्रति उतना ही अपार प्रेम है | एक गरीब परिवार की आर्थिक मदद हेतु आगे आये नवयुवक की प्रेरणा दायक कहानी ‘अंधेरो से मुक्ति’ युवा वर्ग के लिए प्रेरणा स्रोत है | तो ‘घर’ कहानी से उभरती समस्या , अर्थ के आभाव में होते बेमेल विवाह से भी निजात पाने के लिए रश्मि को बचाने किशन को आगे आना ही पड़ेगा | सरकार के बेटी बचाओ और बेटी पढाओ के नारे के बावजूद बेटियां कदम- कदम पर छली जा रही है चाहे वह “आखिर क्यों ‘ की ख़ुशी हो या फिर ‘फूल मर जायेगा’ की छुटकी | कोई दंगे की शिकार होती है तो कोई किसी बलात्कारियों का शिकार | माँ बेटी के स्नेहिल सम्बन्धों के मध्य कितनी ही बड़ी दीवार खड़ी करने का प्रयास कोई करे लेकिन सफल नहीं होता ‘दायरा’ कहानी दिल को छू जाती है | निश्चय ही संग्रह की सारी कहानियां
समाज एवं रिश्तों की कटु सच्चाइयों से सीधा साक्षात्कार कराती हैं | हाँ संग्रह की कुछ कहानियां यों लिखी गईं हैं कि कभी – कभी ऐसा
प्रतीत होता है ये संग्रह जैसे कोई खण्ड – खण्ड में एक उपन्यास तो नही है | कहानी ‘स्मृतियाँ’ में मानसी का पति नितिन है तो ‘धूपछांव’ में अपर्णा के पति का नाम भी नितिन है | स्मृतियाँ में मानसी व नितिन की बेटी रितु की स्कूल में एक दुर्घटना के कारण मृत्यु हो जाती है तो वैसे ही कहानी ‘फूल मर जायेगा’ में विशाल और मानसी की बेटी निधि की मृत्यु भी स्कूल से वापस आते समय एक दुर्घटना में हो जाती है | ऐसे और भी कहानी के पात्र हैं जो अन्य कहानियो में भी आये हैं खैर | जो भी हो ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं है | बड़ी बात यह है की सारी कहानियां बहुत ही मनोवैज्ञानिक ढंग से रचीं गई हैं | भाषा शैली अच्छी
है और अंत तक पठनीयता बनी रहती है | दो तीन कहानियों को छोड़ दें तो प्रत्येक कहानी को पढने के पश्चात् ये कहानियां पाठक को बहुत देर तक सोचने को विवश करती हैं | मैं समझता हूँ यह लेखिका की सफलता को दर्शाता है |









