छायावाद के गाँव में एक दिन

(पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय जी का गाँव)
निश्चय ही किसी प्रसिद्ध साहित्यकार का गाँव एक तीर्थ स्थान के समान होता है – एक साहित्यिक तीर्थ | साहित्य साधकों व साहित्य पुजारियों के लिए | जैसे – जैसे लोग साहित्यकार की रचनाओं , उनकी चर्चित कृतियों से रूबरू होते हैं | वैसे ही धीरे-धीरे वह स्थान , गाँव या फिर नगर अमुक साहित्यकार के नाम से अपनी पहचान बना लेता है | जैसे लमही नाम लेते ही उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद मानस पटल पर छा जाते
हैं | जैसे बोलपुर अर्थात शांतिनिकेतन पर्याय है कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर का, तो मगहर कबीर दास का | वैसे ही एक गाँव है बालपुर |
छत्तीसगढ़ राज्य के एक जिले रायगढ़ में | इस गाँव से ही शुरू होती है हिंदी साहित्य में छायावाद की चर्चा | निश्चय ही यह उस महत्वपूर्ण साहित्यकार का गाँव है , जिसके लिए प्रख्यात आलोचक व समीक्षक डा नामवर सिंह अपनी चर्चित पुस्तक ‘छायावाद’ के भूमिका में लिखते हैं “निबन्ध के प्रथम अध्याय में छायावाद का इतिहास बतलाते समय कुछ नई सामग्री दी गई है , जिसमें मुकुटधर पाण्डेय का लेख ‘हिंदी में छायावाद’ (1920) बहुत महत्वपूर्ण है |” जी हाँ छायावाद के प्रवर्तक पद्मश्री पं मुकुटधर पाण्डेय जी का गाँव बालपुर रायगढ़ शहर से लगभग 30 किलोमीटर दूर महानदी के तट पर स्थित है और उनके अग्रज पुरातत्ववेत्ता व इतिहासकार पं लोचन प्रसाद पाण्डेय का भी |
रायगढ़ जो कला साहित्य – संस्कृति एवं ओधोगिक क्षेत्र में सदैव अग्रणी रहा है जहाँ संगीत प्रेमी राजा चक्रधर के जन्मदिन पर प्रति वर्ष छत्तीसगढ़ शासन द्वारा “चक्रधर समारोह” नामक भव्य आयोजन कई दिनों में सम्पन्न होता है | जिसमें प्रत्येक दिन के निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों के कलाकार सादर आमंत्रित किये जाते हैं और यदि सहभागिता की बात की जाय तो अब तक शहनाई वादक विस्मिल्ला खां , कत्थक सम्राट विरजू महाराज , नृत्यांगना व फिल्म अभिनेत्री हेमामालिनी , भोजपुरी गायिका मालिनी अवस्थी , पांडवानी गायिका तीजनबाई , वासुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया , सोनल मान सिंह , गजल गायक जगजीत सिंह, अनूप जलोटा जैसे बहुत से सम्मानित कलाकार अपनी प्रस्तुति इस मंच से दे चुके हैं | हाँ वही रायगढ़ जहाँ संस्कृत , उड़िया व हिंदी के साहित्यकार पं चिरंजीव दास की स्मृति में हरकिशोर दास जी के नेतृत्व में प्रत्येक वर्ष होने वाले साहित्यिक आयोजन में प्रो राजेन्द्र मिश्र , वागीश शुक्ल , विनोद कुमार शुक्ल , अरुण कमल ,
रमेश चन्द्र शाह , मंगलेश डबराल , केदारनाथ सिंह , लीलाधर जगूड़ी , ऋतुराज , सुधीर सक्सेना , असद जैदी , एकांत श्रीवास्तव , हरीश चन्द्र पाण्डेय , अष्टभुजा शुक्ल , अनामिका , राजेश जोशी जैसे वरिष्ठ एवं ख्याति लब्ध साहित्यकार अपनी साहित्यिक छटा विखेर चुके हैं | वही रायगढ़ जहाँ रंगकर्मी अजय आठले व उषा आठले के नेतृत्व में इप्टा के कलाकार प्रति वर्ष बेहतरीन नाटकों का मंचन करते हैं |
छायावादी कवि पं मुकुटधर पाण्डेय इसी रायगढ़ के थे | मुझे रायगढ़ में रहते और जिंदल स्टील में कार्य करते हुए ग्यारह वर्ष से अधिक हो रहे हैं | इस बीच छत्तीसगढ़ के विभिन्न अंचलों के तमाम साहित्यिक आयोजनों में सम्मिलित होने के साथ –साथ , नगर व नगर से बाहर कई वरिष्ठ साहित्यकारों , पत्रकारों बुद्धिजीवियों से परिचय हुआ | जिसमें डा बलदेव जी , डा प्रभात त्रिपाठी , डा विहारी लाल साहू , आनंदी सहाय शुक्ल , विश्वरंजन , ललित सुरजन , जय प्रकाश मानस , रवि श्रीवास्तव , शम्भु शर्मा बसंत ,गणेश कछवाहा , रमेश शर्मा आदि के साथ-साथ अन्य साहित्यकारों से परिचय की एक लम्बी सूची है | इसी क्रम में परिचय हुआ पं मुकुटधर पाण्डेय जी के परिवार के एक सम्मानित सदस्य श्री शिव कुमार पाण्डेय जी से | जो स्वयं एक वरिष्ठ रचनाकार हैं | शिव कुमार पाण्डेय जी की युगाक्षर , लाली परसा के फूल , अनुभूति , युग-परिचय जैसी महत्व पूर्ण कविता संग्रह हैं | जिसमें संग्रहीत कवितायेँ समाज की तमाम विसंगतियों व अव्यवस्थाओं पर सीधा प्रहार करती हैं |
मैं अपने साहित्यिक मित्र अंजनी कुमार ‘अंकुर’ के साथ एक दिन श्री शिव कुमार पाण्डेय जी से बैकुंठपुर मोहल्ले में उनके आवास पर मिलने गया तो अपने मन की बात भी उनसे कह दी | सर , “ मै आपके दादा जी पं मुकुटधर पाण्डेय जी का गाँव अर्थात आपका गाँव देखना चाहता हूँ | मुझे उस पावन धरती को नमन करना है | जहाँ से छायावाद की चर्चा प्रारम्भ होती है |” पहले तो उन्होंने कहा , “ श्रीवास्तव जी , अब वहाँ बचा ही क्या है ? सब लोग तो शहर में आकर बस गये | हमारा आधा से ज्यादा गाँव महानदी के आगोश में समा गया| बालपुर में तो अब हमारी डेहरी भी नहीं बची | जहाँ हम आप सब पाहुन का स्वागत कर सकें |” फिर भी उन्होंने हमारे निवेदन को स्वीकार किया | उनकी ओर से यह भी प्रस्ताव आया कि कुछ लोग और भी हैं जो बालपुर चलना चाहते हैं | उन्हें भी अपने साथ ले लेते हैं | फिर वहीं सब मिलकर एक कवि गोष्ठी भी कर लेगें | मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती थी | मेरे लिए तो ये और भी सोने में सोहागा जैसी बात थी | अंत में हुआ ये कि कुछ को आमंत्रित किया गया तो कुछ सुनकर स्वयं ही जाने को तैयार हो गये | शासकीय डिग्री कालेज के प्रो मीनकेतन प्रधान जी ने जब सुना तो उन्होंने पाण्डेय जी को फोन पर बताया कि हिंदी साहित्य के कुछ शोधकर्ता छात्र-छात्राएं भी आपके साथ बालपुर जाना चाहते हैं | पाण्डेय जी ने उन्हें भी स्वीकृति दे दी | रविवार का दिन निर्धारित किया गया |
१० अप्रैल , सुबह नौ बजे बैकुंठपुर मुहल्ले में शिव कुमार पाण्डेय जी के निवास पर सभी को एकत्र होने की सूचना दे दी गई | सारी आर्थिक व्यवस्था का दायित्व स्वयं पाण्डेय जी ने ले लिया | आने – जाने का साधन , पहुचने पर जलपान , दोपहर का भोजन , गोष्ठी समापन के पश्चात् गर्म चाय के साथ गर्म भजिया ही नहीं , बल्कि वहाँ पर पहुचने वाले साहित्यकारों को उपहार देने तक की योजना भी बन गई | जिला ग्रन्थालय के पूर्व संचालक रवि मिश्रा जी को कह कर उन्होंने डायरी , पेन , फूल माला भी मंगा लिया | पं मुकुटधर पाण्डेय जी द्वारा कालिदास के मेघदूत को छत्तीसगढ़ी भाषा में किये गये अनुवाद की पच्चीस प्रतियाँ डा विहारी लाल साहू जी ने वितरण हेतु प्रदान की , तो संकल्प रथ व साहित्य
अभियान पत्रिका की प्रतियाँ भी आ गईं | तैयारी ऐसे शुरू हो गई जैसे सावन में कांवरिये बाबा धाम दर्शन के लिए जाते हैं | जैसे स्कूल के बच्चे किसी पिकनिक में जा रहे हों | किसी ने फोटोग्राफी का दायित्व ले लिया, तो किसी को वैनर की व्यवस्था का दायित्व दे दिया गया | कार्यक्रम की रूपरेखा व संचालन का सम्पूर्ण दायित्व मुझे दे दिया गया था | फूल माला , उपहार , पत्रिकाएँ व अन्य उपयोगी सामग्री एक दिन पूर्व ही एकत्र कर ली गई | उधर बालपुर में गोष्ठी स्थल , माइक , जलपान , भोजन आदि की समुचित व्यवस्था का दायित्व सुनील पाण्डेय जी ने ले रखा था | जो शिव कुमार पाण्डेय जी के बड़े सुपुत्र व टपरदा गाँव के सरपंच हैं | वे पूरी टीम के स्वागत में पहले ही गाँव पहुँच चुके थे |
आखिरकार वह पल आ ही गया | एक निश्चित समय पर रायगढ़ शहर से साहित्यकारों की टोली निकल पड़ी | उस बालपुर गाँव की ओर , उस पावन धरती को नमन करने | जहाँ चित्रोत्पला ( महानदी का दूसरा नाम ) की निर्मल जल धारा अबाध गति से बहती है | जहाँ पलाश के घने वन में रक्त वर्णित पुष्पों से बाते करते छायावादी कवि मुकुटधर पाण्डेय “किंशुक कुसुम” जैसी कविता रचते हैं- “ किंशुक कुसुम आज शाखा पर फूला देख, मेरा मन हर्ष से ये फूला न समाता है , पूरे एक वर्ष पीछे आया फिर देखने में , इतने दिवस भला कहाँ तू विताता है |”
जहाँ साक्षी के रूप में वह पीपल का पुरातन पेड़ आज भी विद्यमान है , जिसकी शीतल छांव में पं मुकुटधर पाण्डेय चर्चित कविता ‘कुररी के प्रति’ लिखते हैं — —
बता मुझे ये विहग विदेशी अपने जी की बात / पिछड़ा था तू कहाँ , आ रहा जो कर इतनी रात ? और फिर इस कविता में कवि मुकुटधर पाण्डेय प्रवासी पक्षी कुररी से हालचाल जानने हेतु प्रश्नों की झड़ी लगा देते हैं | जिसके लिए एक पुस्तक में तो मैंने इतना तक पढ़ा है कि साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल वख्शी ने पाण्डेय जी की इस रचना को छायावाद की प्रथम रचना माना है | खैर…. | ये एक अलग विषय है | सम्भव है गोष्ठी
में इस पर चर्चा हो |
दरअसल हम सब प्राकृतिक वैभव से परिपूर्ण परिवेश , महानदी के कलकल निनाद , घाट पर नाव के आवागमन , आम्र कुञ्ज में कोयल के मधुर सांगीतिक वातावरण के उस बालपुर को देखना चाहते थे | जिसके लिए पं मुकुटधर पाण्डेय ने ‘हिंदी में छायावाद’ आलेख में लिखा है “ सूर्य , चन्द्र आदि नक्षत्र समूह , बसन्तानिल , शारदाकाश , ज्योत्स्ना -रात्रि , संध्या और प्रभात की अरुणिमा , सरिता का कलरव , मेघों का गर्जन तथा पुष्पित कानन आदि प्राकृतिक दृश्य और घटनाएँ “छायावाद” की प्रिय सामग्री है |” और आज सब की यही जिज्ञासा है कि क्या वे छायावाद की प्रिय सामग्रियां वर्तमान में भी बालपुर में उपस्थित है ?
उस बालपुर साहित्यिक धाम के दर्शन हेतु हम लोग रायगढ़ से अलग – अलग कई गाड़ियों में बैठकर चल पड़े | कुछ साहित्यकारों ने अपने साधन से स्वयं सीधा बालपुर पहुँचने की बात की थी | उन्हें मोबाईल फोन से सम्पर्क किया जाने लगा | हमारी टीम में कुछ ने पहले भी बालपुर को देखा था | लेकिन मेरे जैसे कई लोग थे जिनकी यह पहली यात्रा थी | सबमें गजब का उत्साह था | ग्यारह बजते – बजते हम सब उस धरती पर पहुँच गए | गाड़ियों से उतरकर लोग ऐसा ताक -झांक करने लगे , जैसे उन्हें अभी यहीं – कहीं पं मुकुटधर पाण्डेय जी अगवानी करते दिख जायेंगे | यहाँ से महानदी किधर है ? पाण्डेय जी का घर किधर था ? उनके समय में यहाँ एक पुस्तकालय भी तो था ,? कालेज के विद्यार्थी उन्हीं से पूछने लगते , जिन्हें भी वे बालपुर का निवासी समझते | तभी जीर्ण –शीर्ण काया में पं मुकुटधर पाण्डेय के समय का एक साक्षी सामने खड़ा दिख गया | लोग उस ओर भागे | उसके साथ खड़े होकर फोटो खिचाना शुरू कर दिए | तो कोई अकेले ही मोबाईल से सेल्फी लेने लगा | वह कोई और नहीं वही प्राचीन पीपल का वृक्ष था , जिसकी छांव में बैठ कर मुकुटधर पाण्डेय जी साहित्य रचते थे | जिसकी अब नई शाखाएँ भले ही न बढ़ रही हों किन्तु जड़ें आज भी धरती को सुदृढ़ता से वैसे ही पकड़ रखी हैं जैसे तमाम नई कविताओं के आगमन के पश्चात् भी छायावाद की जड़े साहित्य के भीतर गहराई में समाई हुई हैं |
इस साहित्यिक यात्रा के आयोजक शिव कुमार पाण्डेय जी ने तभी उस ओर चलने का संकेत दिया, जिधर एक बड़ा सा मन्दिर था | ज्ञात हुआ कि ये जगन्नाथ जी का मन्दिर है | जिसका निर्माण पाण्डेय परिवार ने ही कराया है और इसी मन्दिर के हाल में गोष्ठी की व्यवस्था भी है | भीतर जाने से स्वत: ही बात समझ में आ गई | पूरे हाल में सलीके से दरी बिछी थी | माइक भी दिख रहा था | मन्दिर के पुजारी को भी लोगों के आने
की सूचना थी | तभी तो इतने लोगों के लिए गेहूं के आंटे की पंजीरी , बेसन की बूंदी , केले आदि पर्याप्त मात्रा में ‘प्रसाद’ के रूप में थाल में रखे थे | लोगों ने जगन्नाथ जी को हाथ जोड़े , प्रसाद खाये ,पानी पिया और दरी पर बैठ गये | आयोजक , अध्यक्ष व कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों के लिये कुर्सियां भी थीं | इसी के साथ माइक संचालक अर्थात मेरे हाथ में आ गया | निश्चय ही हमारे लिए यह एक महत्वपूर्ण दिवस था | जानकारी देते हुए मैने इस आयोजन को तीन भागों में विभक्त कर दिया | पहले विचार गोष्ठी जिसमें डा विहारी लाल साहू जी , डा बलदेव जी , शिव कुमार पाण्डेय जी व प्रो के के तिवारी चर्चा करेगे मुकुटधर पाण्डेय व लोचन प्रसाद पाण्डेय के साहित्यिक अवदान पर , यहाँ के भोगोलिक परिवेश पर और पाण्डेय जी के पारिवारिक इतिहास पर | दूसरा हम सब महानदी के तट पर जायेगे , जहाँ अवशेषों के माध्यम से उनकी बखरी , पुस्तकालय , स्कूल आदि को देखने व जानने का प्रयास करेंगे | तीसरा यहाँ से कुछ ही दूर पर स्थित टपरदा गाँव चलेंगे | वहाँ पर होगा दोपहर का भोजन और फिर कवि गोष्ठी |
इस सत्र की अध्यक्षता का पद भार वरिष्ठ साहित्यकार डा बलदेव जी से संभाला | मन्दिर परिसर का हाल भरा हुआ था | सर्वप्रथम पं मुकुटधर पाण्डेय जी के परिवार का परिचय देते हुए डा विहारी लाल साहू जी ने बताया कि पाण्डेय परिवार उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में पामपुरा गाँव के मूल निवासी थे | एक बार वे जगन्नाथपुरी दर्शन हेतु जाते समय सम्बलपुर के एक बगीचे में ठहरे थे | वहां के राजा ने इन लोगों की विद्वता सुनकर इन्हें राजमहल में आमंत्रित किया | लौटने पर इन्हें राज्य में बसने का आग्रह किया और कई गाँव दिए | जिसमें उन्हें लांती नामक ग्राम मिला जो संबलपुर फुलझर में पड़ता था | जलवायु अनुकूल नहीं होने पर ये कोर्रा , तत्पश्चात सोमनाथ पाण्डेय जी वहां से बालपुर आये | इनकी व्यवहार कुशलता और पांडित्य से प्रभावित होकर नारायण सिंह चन्देल ने इन्हें पांच गाँव दिए , यह सन् 1847 की बात है | बालपुर पुरी के मार्ग पर पड़ता है | सोमनाथ जी आत्मज भोलाराम पाण्डेय बड़े परिश्रमी व्यक्ति थे | उनके पुत्र शालिग्राम जी और उनकी पत्नी कुसुम देवी थीं | वे लोग धार्मिक स्वभाव के थे | इसी परिवार में 4 जनवरी 1986 को लोचन प्रसाद पाण्डेय जी का और 30 सितम्वर 1895 को मुकुटधर पाण्डेय जी का जन्म हुआ था | बहुत आगे चलकर पाण्डेय परिवार यहाँ के बड़े गौटिया व मालगुजार हो गये | महानदी के तट बसे इस सुरम्य गाँव , उपवन, विदेशी पक्षियों के आगमन से निर्मित परिवेश में जो रचनाएँ बनी | वे हिंदी साहित्य जगत में ध्रुव तारे की तरह स्थापित हो गईं | 18 नवम्बर 1959 को लोचन प्रसाद पाण्डेय जी एवं 94 वर्ष की लम्बी आयु तक साहित्य साधना में रत छायावादी कवि मुकुटधर पाण्डेय जी का 6 नवम्बर 1989 को स्वर्गवास हुआ |
इसी के साथ डा बलदेव जी ने मुकुटधर पाण्डेय के साहित्यिक अवदान पर चर्चा करते हुए बताया कि आज हमारे लिए यह एक महत्वपूर्ण दिवस है | क्योकि हम सब एक साहित्यिक तीर्थ पर उपस्थित हैं | मुकुटधर पाण्डेय जी सरस्वती , माधुरी , सुधा जैसी श्रेष्ठ पत्रिकाओं में कम उम्र में ही प्रकाशित होकर प्रसिद्ध हो गये थे | 1920 में श्री शारदा के चार अंको में उनकी ‘छायावाद’ शीर्षक लेखमाला छपी | 1921 में सरस्वती में उनकी ‘कुररी’ के प्रति जैसी छायावाद की दिशा निर्दिष्ट करने वाली कविता प्रकाशित हुई | कहानी संग्रह ‘हृदय दान’ (1918) प्रथम काव्य संकलन ‘पूजा फूल’ ( 1916 ) , विश्वबोध ( महत्व पूर्ण कविताओं का संग्रह) , परिश्रम ( निबन्ध संग्रह ) छायावाद एवं अन्य निबन्ध पाण्डेय जी की चर्चित पुस्तकें हैं | इसी के साथ लच्छमा , शैलबाला , मामा , आदि उपन्यास का हिंदी अनुवाद एवं कालिदास के मेघदूत का छत्तीसगढ़ी में
अनुवाद भी महत्वपूर्ण है |
उन्होंने आगे बताया कि पुरातात्विक और साहित्यिक वर्चस्व के पर्याय साहित्य वाचस्पति पं लोचन प्रसाद पाण्डेय और उनके अनुज छायावाद के प्रवर्तक कवि पं मुकुटधर पाण्डेय के कारण अर्ध शताब्दी तक रायगढ़ , साहित्यकारों का तीर्थ रहा | मात्र 23-24 वर्ष की उम्र में उनके द्वारा सम्पादित कविता कुसुम माला जैसे ऐतिहासिक महत्व का काव्य संकलन इसका प्रमाण है | लोचन प्रसाद जी ने हिंदी , उड़िया , संस्कृत , अंग्रेजी और छत्तीसगढ़ी में लगभग ४४ ग्रथों की रचना की थी | जिसमें मेवाड़ गाथा , पद्म पुष्पांजली , कलिकाल , दो मित्र , प्रवासी , बालिका विनोद , प्रेम प्रसंशा , छात्र दुर्दशा अत्याधिक प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं | अंग्रेजी में ‘लेटर्स टू माई ब्रदर्स’ , ‘द वे टू बी हैप्पी एंड गे’ उनकी चर्चित पुस्तक है | इसी के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण अनुवाद भी हैं |
गोष्ठी में उपस्थित शोधकर्ता छात्र-छात्राओं को परामर्श देते हुए डा बलदेव जी ने कहा कि यदि आप लोगों को छायावाद पर विशेष जानकारी चाहिए तो हमारी किताब ‘छायावाद और मुकुटधर पाण्डेय’ अवश्य पढ़ें | दूसरी ‘छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबन्ध’ भी देखें , जिसका सम्पादन मैंने ( डा बलदेव ) किया था | इस प्रकार डा बलदेव जी द्रारा दिए गए महत्वपूर्ण जानकारी के पश्चात् प्रो के के तिवारी ने भी लोचन प्रसाद पाण्डेय के द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य के पुरातात्विक स्थलों की खोज व उन पर लिखे आलेखों एवं मुकुटधर जी के साहित्यिक अवदान की विस्तृत चर्चा की | इसी क्रम में अंजनी कुमार ‘अंकुर’ ने पाण्डेय परिवार पर लिखी एक कविता प्रस्तुत की | तत्पश्चात पाण्डेय परिवार के वंशज शिवकुमार पाण्डेय जी ने उन ऐतिहासिक स्थानों को दिखाया | जिसे देखने को सभी लालायित थे | महानदी के तट पर बसे उस बालपुर गाँव को सभी ने वारीकी से देखने की कोशिश की | गाँव व क्षेत्र की परिक्रमा करते समय शिव कुमार पाण्डेय जी इशारा करके बताते रहे | यहाँ एक स्कूल हुआ करता था | इधर पुस्तकालय था जिसका नाम पार्वती पुस्तकालय था | जहाँ देश की तमाम भाषाओ में छपने वाली सारी पत्रिकाएँ आती थीं | उधर 19 एकड़ में पलाश वन था | अभी तो महानदी का चौड़ा पाट यहाँ तक आ गया है ….. पहले ये बहुत पीछे था ……. आधा गाँव तो नदी के आँचल में
छुप गया | उस समय पाण्डेय परिवार इस क्षेत्र के बड़े मालगुजार थे | इधर हमारी बहुत बड़ी बखरी हुआ करती थी ……… खेती व अन्य कारोबार के लिए बहुत से नौकर – चाकर थे | उन्हें कार्य या अल्पाहार हेतु मोर्रा ( धान से बनी लाई ) , गुड़ व पीने की तम्बाकू आदि बाँटने के लिए जब बुलाना होता तो घंटी बजाई जाती थी |
पाण्डेय परिवार की महिलाओं को कहीं बाहर आने-जाने के लिए पालकी की व्यवस्था थी | जिन पालकी को उठाने के लिए गाँव के उस ओर धांगर जाति के लोग बसाये गये थे | आज वे धांगर लोग बहुत पढ़े लिखे और बड़े-बड़े पद पर कार्यरत हैं | छात्र-छात्राएं बीच–बीच में शिवकुमार जी से तरह –तरह के प्रश्न पूछते , जिनका समुचित उत्तर पाते हुए सभी गाँव के भ्रमण का आनन्द ले रहे थे | यह तो पहले से ही ज्ञात था कि बालपुर में कोई बहुत बड़े सेमिनार का आयोजन नहीं हैं | हम लोग मात्र बालपुर गाँव देखने जा रहे हैं | उस धरती को नमन करने जहाँ से छायावाद के चर्चा की शुरुआत हुई | फिर भी थोड़ी देर में ही इतनी महत्वपूर्ण बातें हुई , इतनी अधिक नई जानकारियाँ प्राप्त हुईं कि एक रपट के बहाने सबका वर्णन करना सम्भव नहीं है | भोजनोपरांत टपरदा में कवि गोष्ठी आयोजित की गई | जिसमें डा बलदेव जी , शिव कुमार पाण्डेय जी , प्रो के के तिवारी , मनोहर लाल चौबे जी , अंजनी कुमार “अंकुर” , सनत चौहान , नन्द लाल त्रिपाठी , अजय सन्नाड , मिलन मलरिहा , शम्भु शर्मा ‘वसंत’ , शिव शरण पाण्डेय , राम गोपाल शुक्ल , गुलाब सिह ‘कंवर” , श्याम नारायण श्रीवास्तव , मनहरन सिंह ठाकुर , उर्मिला सिदार , निमाई प्रधान , राम विजय शर्मा , रामेश्वर राठौर ने काव्य पाठ किया | काव्य गोष्ठी में साहित्यकारों के साथ किरोड़ीमल डिग्री कालेज के छात्र –छात्राएं और टपरदा गाँव के बहुत से सम्मानित निवासी उपस्थिति थे , सभी ने काव्य पाठ का भरपूर आनंद लिया | कवि गोष्ठी का संचालन श्याम नारायण श्रीवास्तव अर्थात मैंने किया और अंत में सरपंच अध्यक्ष सुनील पाण्डेय ने सबके प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया |
लोग विदाई के क्षण में कुछ चाय-वाय ले रहे थे और मै एक किनारे बैठा सोच रहा था बालपुर के विषय में | निश्चय ही परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है | अतीत की तुलना में वर्तमान बहुत परिवर्तित हो चुका है | महानदी का कटाव गाँव की ओर बढ़ने से आधा गाँव नदी के आगोश समा चुका है | दूर-दूर तक न कहीं पलाश वन दिखते है , न ही पाण्डेय जी की बखरी | स्कूल व पुस्तकालय भी नहीं दिखे | बालपुर में स्थापित जगन्नाथ मन्दिर से सड़क उस पार छोटा सा गाँव , गिरी हुई दीवारों के नीव का अवशेष और महानदी का चौड़ा पाट तो है | हाँ उस बूढ़े पीपल के सम्मान में ही कुछ आम , जामुन ,बेल ,बबूल ,नीम , बांस की कोठ जंगली झुरमुट के साथ आज भी जीवित मिले | किन्तु छायावाद को एक स्वरूप देने में मुकुटधर पाण्डेय जी का साहित्य के प्रति व पं लोचन प्रसाद पाण्डेय जी का इतिहास और पुरातात्विक क्षेत्र में जो अवदान है , उसके कारण अब ये मात्र पाण्डेय परिवार के पूर्वज ही नहीं रहे | बल्कि पूरे देश के लिए एक अमूल्य धरोहर से हो गये हैं | इसलिए भारत सरकार व सामाजिक संस्थाओं का भी दायित्व बनता है कि इस स्थल में कुछ कार्य करें | कम से कम एक सार्वजानिक पुस्तकालय इनके नाम से स्थापित करें | जहाँ पाण्डेय परिवार के साथ-साथ अन्य साहित्यकारों की श्रेष्ठ कृतियाँ उपलब्ध हों | जगन्नाथ मन्दिर के बाहर दीवार पर शिलालेख द्वारा भी पाण्डेय परिवार के विषय में आगंतुक हेतु विशेष जानकारी दी जा सकती है | हर सम्भव बालपुर को स्मारक स्थल का स्वरूप प्रदान किया जाना चाहिए | वैसे यदि चाहें तो इस कार्य हेतु स्वयं पाण्डेय परिवार भी सक्षम है |
तभी किसी साथी ने कहा , ‘चलिए श्रीवास्तव जी चला जाय |’
मैं अचानक विचारों से बाहर आ गया | देखा , गोधूलि बेला दस्तक दे रही है | पशु – पक्षी , किसान , मजूर सबके अपने नीड़ में वापस जाने की बेला हो गई है | अल्प समय में ही बालपुर व टपरदा में आयोजको ने कल्पना से अधिक अपार प्यार व सम्मान दिया | बहुत अच्छा लगा | बहुत अच्छी रही ये साहित्यिक यात्रा | सभी अपनी –अपनी गाड़ियों में वापसी हेतु बैठने लगे | न जाने क्यों ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे अभी मन भरा नहीं , कुछ पल और ठहरने का मन था | मैंने मन ही मन तय किया | फिर आऊंगा एक बार बालपुर , और फिर विचार उठे कि — — –
छायावादी फिर आऊंगा, गाँव तुम्हारे मिलने को
लाल दहकते अंगारों सा, जब पलाश वन खिला रहेगा
विहग विदेशी कुररी जब भी, नीड़ में अपने लौटेगा
कहीं दूर से अमराई में , कोयल सुर में गाएगी
महानदी हो जब उफान पर, नाव लगी हो चलने को
ऐसे ही परिवेश में आकर , उस पीपल की छाँव में
कविवर तुम बैठे मिल जाओ , कोई कविता लिखने को
छायावादी फिर आऊंगा , गाँव तुम्हारे मिलने को










