झूठे मुखौटे

कई वर्षों बाद दो ‘दोस्त’ आपस में मिले। दोनों ने एक दूसरे को गले लगाया और सुख – दुःख की बातें की।
फिर एक ने पूछा, “तुम्हारे मुखौटे का क्या हाल है?”
दूसरे ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया, “उसका तो मुझे नहीं पता, लेकिन तुम्हारे मुखौटे की हर रग और हर रंग को मैं बखूबी जानता हूँ।”
पहले ने चकित होते हुए कहा,”अरे वाह! मैं भी स्वयं के नहीं बल्कि तुम्हारे मुखौटे के हर हावभाव को अच्छी तरह समझता हूँ।”
दोनों हाथ मिला कर हंसने लगे।
इतने में उन्होंने देखा कि दूर से भीड़ आ रही है, दोनों ने अपने-अपने मुखौटे पहन लिये।
अब दोनों एक दूसरे के प्रबल विरोधी और शत्रु थे, अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता।
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