वे मिट गए और मिट गया शमशीर का लिक्खा
वे मिट गए और मिट गया शमशीर का लिक्खा
लेकिन अभी तक चल रहा है ‘मीर’ का लिक्खा
ऊपर से ख़ुदा उतरा न उतरी थी ख़ुदाई
है मील का पत्थर किसी रहगीर का लिक्खा
औक़ात ही क्या है किसी और की जो यूँ लिक्खे
है मेरे मुक़द्दर में सुख़न पीर का लिक्खा
थे ज़ख़्म परिंदों के बदन पे कई लेकिन
उन हौसलों पर कुछ न मिला तीर का लिक्खा
वह फूल बचानी है जिसे आबरू ख़ुद से
कश्मीर पे बन आई है कश्मीर का लिक्खा
अपना लिखा अब वह नहीं आएगा बदलने
बदलेगा तुझी से तेरे तक़दीर का लिक्खा
हर एक निशाँ मिट चुका पाँवों का मेरे पर
मिटता ही नहीं ज़हन से ज़ंजीर का लिक्खा
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