बरसों बदरा

आओ बदरा घिर आओ,
नैन तके हो आकुल।
घटा बनके उतर आओं
चित्त हैं व्याकुल।।
सांझ,सँवरें नित तुम्हरें
राह तके विकल मनवा।
अब की बदरिया में
घूम आओ अँगनवां।।
क्यों रूठे हो हमसे,
हमको जरा राज बता दो।
तुम्हें मनाने का कोई तो,
होगा उपाय जरा बता दो।।
कर सकते हैं संगीत से स्वागत,
चाहे मेघ हो या मल्हार।।
तपन की अग्नि से देह जले,
कर दो जरा हम पर उपकार।।
सिरजाएँगे धरा को जगा वृक्ष,
उजड़ी लगे तुम्हरे बिन बाग,उपवन।।
खग,वनचर,मानव सब हैं प्यासे,
सुख रहे बिन तुम्हारे तनमन।
गागर,सागर सब सुख रहे,
दिनोदिन पानी से हो तरस।
गिरते पानी का जलस्तर ,
सोंचें क्या होगा अगले बरस।।
भरी दुपहरी अग्नि बरसे,
बरखा ग्रीष्म बन क्यों तपे।
नित जल का संकट बढ़ते,
ऐसे में जीवन को भाँपें।।
सोंचे जल नही तो कल नही,
बचा किया करें उपयोग।।
बरखा की आस में चातक तरसे,
“आनन्द” करें निशदिन ध्यान,मनोयोग।।












